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दशलक्षण पर्व में भक्ति के रंग में रंगा सिलौंडी और कछार गांव बड़ा,मंदिरों में गूंजे भक्तिमय स्वर, अभिषेक-शांतिधारा और पूजन के साथ जैन समाज ने मनाया ‘उत्तम संयम’ पर्व

कलयुग की कलम से राकेश यादव

दशलक्षण पर्व में भक्ति के रंग में रंगा सिलौंडी और कछार गांव बड़ा,मंदिरों में गूंजे भक्तिमय स्वर, अभिषेक-शांतिधारा और पूजन के साथ जैन समाज ने मनाया ‘उत्तम संयम’ पर्व

कलयुग की कलम सिलौंडी – दशलक्षण पर्व के पावन अवसर पर सिलौंडी एवं कछार गांव बड़ा में जैन समाज के श्रद्धालु सुबह से ही भगवान की भक्ति में लीन नजर आए। मंदिरों में श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से अभिषेक, शांतिधारा एवं पूजन किया और धार्मिक वातावरण के बीच दशलक्षण पर्व के छठवें धर्म ‘उत्तम संयम’ का महत्व समझा।

इंद्रियों और मन पर नियंत्रण ही उत्तम संयम

जैन दर्शन में उत्तम संयम का आशय अपनी इंद्रियों और मन को अनुशासित रखने से है। मन, वचन और शरीर को अनुचित कार्यों से रोकना ही संयम की मूल भावना मानी गई है। इंद्रियों के पांच विषय स्पर्श, रस, गंध, रूप और शब्द पर नियंत्रण रखना आत्मसंयम की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया।

धार्मिक मान्यता के अनुसार संसार में असंयम अनेक विकारों का कारण बनता है, जबकि संयम व्यक्ति को अनुशासन, मर्यादा और आत्मशुद्धि की ओर ले जाता है।

इंद्रिय संयम और प्राणी संयम का संदेश

उत्तम संयम को मुख्य रूप से इंद्रिय संयम और प्राणी संयम के रूप में समझाया गया है। इंद्रिय संयम में अपनी पांचों इंद्रियों को नियंत्रण में रखना तथा प्राणी संयम में जीवों के प्रति अहिंसा और करुणा का भाव रखना शामिल है। संयमी व्यक्ति मन, वचन और कर्म से किसी भी जीव को कष्ट पहुंचाने से बचता है।

श्रद्धालुओं ने कहा कि वास्तविक संयम केवल बाहरी आचरण तक सीमित नहीं है, बल्कि विचारों की शुद्धता और मन पर नियंत्रण भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। क्रोध, लोभ और मोह जैसी प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखना आत्मसंयम की दिशा में आवश्यक माना गया है।

आधुनिक जीवन में भी संयम की जरूरत

दशलक्षण पर्व का उत्तम संयम संदेश वर्तमान भौतिक जीवन में भी प्रासंगिक माना जा रहा है। मोबाइल और अन्य साधनों के अत्यधिक उपयोग, क्रोध, लालच तथा असंतोष से स्वयं को बचाकर जीवन में संतुलन बनाए रखने का संदेश दिया गया। जैन समाज के अनुसार संयम व्यक्ति के जीवन को अनुशासित करता है और आत्मिक शांति की दिशा में आगे बढ़ाता है।

दशलक्षण पर्व के दौरान सिलौंडी और कछार गांव बड़ा के जैन समाज में धार्मिक उत्साह और श्रद्धा का वातावरण बना हुआ है। मंदिरों में नियमित पूजा-अर्चना एवं धार्मिक कार्यक्रमों के माध्यम से श्रद्धालु आत्मचिंतन और आध्यात्मिक साधना में जुटे हैं।

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