महर्षि के सपनों पर नियुक्तियों का जाल!वैदिक विश्वविद्यालय में पदों की हेराफेरी, दस्तावेजों में विरोधाभास और नियमों पर गंभीर सवाल (नोट: यह समाचार विश्वविद्यालय के एक अधिकारी द्वारा की गई लिखित शिकायत और उपलब्ध दस्तावेजों पर आधारित है। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित जांच के बाद ही संभव होगी।)
कलयुग की कलम से राकेश यादव

महर्षि के सपनों पर नियुक्तियों का जाल!वैदिक विश्वविद्यालय में पदों की हेराफेरी, दस्तावेजों में विरोधाभास और नियमों पर गंभीर सवाल
(नोट: यह समाचार विश्वविद्यालय के एक अधिकारी द्वारा की गई लिखित शिकायत और उपलब्ध दस्तावेजों पर आधारित है। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित जांच के बाद ही संभव होगी।)
कटनी मध्य प्रदेश
कलयुग की कलम उमरिया पान – भारतीय संस्कृति, वेद और आधुनिक विज्ञान के समन्वय का वैश्विक संदेश देने वाले परम पूज्य महर्षि महेश योगी के नाम पर स्थापित महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय इन दिनों प्रशासनिक अनियमितताओं और विवादों के कारण चर्चा में है। विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा उच्च स्तर पर की गई शिकायत में नियुक्तियों, पदस्थापन और अभिलेखों में गंभीर विसंगतियों के आरोप लगाए गए हैं।
शिकायत में कहा गया है कि कुछ अधिकारियों की नियुक्ति तिथियों, पदनामों और सेवा अभिलेखों में ऐसे विरोधाभास सामने आए हैं, जो विश्वविद्यालय की प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते हैं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला केवल नियमों के उल्लंघन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विश्वविद्यालय की साख और हजारों छात्रों के भविष्य पर भी असर डाल सकता है।
एक ही तारीख, अलग-अलग सेवाकाल: दस्तावेजों में बड़ा अंतर
शिकायत के अनुसार विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलसचिव, परीक्षा नियंत्रक और उपकुलसचिव की नियुक्ति सरकारी रिकॉर्ड में एक ही तिथि—15 मई 2007—दर्शाई गई है।
आरोप है कि इन अधिकारियों की वास्तविक नियुक्ति तिथियां अलग-अलग वर्षों की हैं और उनमें कई वर्षों का अंतर है। यदि ऐसा है, तो सेवा निरंतरता, पदोन्नति और वेतन संबंधी प्रक्रियाओं की वैधता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
न्यायालय में अलग बयान, रिकॉर्ड में अलग तथ्य
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उपकुलसचिव बी.के. शुक्ला से जुड़ा बताया जा रहा है। शिकायत के अनुसार न्यायालय में दिए गए बयान में उन्होंने विश्वविद्यालय से अपने जुड़ाव का समय 1996 बताया, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में नियुक्ति वर्ष 2007 दर्ज है।
यदि दोनों तथ्यों में अंतर है, तो यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक होगा कि आधिकारिक रिकॉर्ड और न्यायालयीन बयान में यह विरोधाभास क्यों है।
अस्थायी नियुक्ति से वरिष्ठ पद तक पहुंचने पर सवाल
शिकायत में यह भी कहा गया है कि कुछ अधिकारियों को सीमित अवधि या कनिष्ठ पदों पर नियुक्त किया गया था, लेकिन बाद में वे उच्च प्रशासनिक पदों पर कार्यरत पाए गए।
इन मामलों में यह जांच का विषय हो सकता है कि क्या पदोन्नति और पदस्थापन नियमानुसार, पारदर्शी चयन प्रक्रिया और सक्षम स्वीकृति के आधार पर किए गए थे।
एक ही अधिकारी, अलग-अलग पदनाम
कुछ अभिलेखों में एक ही अधिकारी को अलग-अलग पदों से दर्शाए जाने का भी उल्लेख किया गया है। विभागीय दस्तावेजों और वार्षिक प्रतिवेदनों में पदनामों के अंतर ने प्रशासनिक अभिलेखों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
यक्ष प्रश्न: क्या ऐसे बचेगी विश्वविद्यालय की साख?
शिक्षाविदों का मानना है कि किसी भी विश्वविद्यालय की पहचान उसके शैक्षणिक स्तर के साथ-साथ उसकी प्रशासनिक पारदर्शिता से भी होती है। यदि नियुक्तियों और अभिलेखों में अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं, तो इससे संस्था की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
यह भी उल्लेखनीय है कि विश्वविद्यालय पूर्व में नियामकीय प्रक्रियाओं को लेकर विभिन्न स्तरों पर जांच और टिप्पणियों का सामना कर चुका है।
उच्चस्तरीय जांच और एफआईआर की मांग
शिकायतकर्ता ने पूरे प्रकरण की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने तथा दोषियों के विरुद्ध आवश्यक वैधानिक कार्रवाई की मांग की है। अब निगाहें शासन और प्रशासन पर हैं कि इस मामले में क्या कदम उठाए जाते हैं।
महर्षि के आदर्श और वर्तमान स्थिति
महर्षि महेश योगी ने शिक्षा को सत्य, अनुशासन और चेतना के विकास का माध्यम माना था। ऐसे में उनके नाम पर स्थापित संस्था में उठ रहे ये प्रश्न न केवल प्रशासनिक बल्कि नैतिक चिंता का विषय भी हैं।



