महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय में छात्र संख्या पर बड़ा सवाल,विधानसभा के आंकड़े और वार्षिक रिपोर्ट में भारी अंतर, शिकायत के बाद 87 हजार से अधिक छात्रों का रिकॉर्ड संदिग्ध,निदेशक ने राष्ट्रपति, मुख्य न्यायाधीश, राज्यपाल, UGC और डीजीपी तक भेजी शिकायत; करोड़ों रुपये के वित्तीय अनियमितताओं की आशंका
कलयुग की कलम से राकेश यादव

महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय में छात्र संख्या पर बड़ा सवाल,विधानसभा के आंकड़े और वार्षिक रिपोर्ट में भारी अंतर, शिकायत के बाद 87 हजार से अधिक छात्रों का रिकॉर्ड संदिग्ध,निदेशक ने राष्ट्रपति, मुख्य न्यायाधीश, राज्यपाल, UGC और डीजीपी तक भेजी शिकायत; करोड़ों रुपये के वित्तीय अनियमितताओं की आशंका
कटनी (म.प्र)
कलयुग की कलम उमरिया पान करौंदी – महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय में छात्र संख्या के आंकड़ों को लेकर गंभीर विवाद सामने आया है। विश्वविद्यालय के निदेशक सुधाकर सिंह राजपूत द्वारा 23 अप्रैल 2026 को भेजी गई विस्तृत शिकायत ने विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि वर्तमान प्रबंधन द्वारा प्रस्तुत छात्र आंकड़ों में भारी विसंगतियां हैं, जिससे न केवल संस्थान की विश्वसनीयता प्रभावित हुई है, बल्कि करोड़ों रुपये के शुल्क और अनुदान के उपयोग पर भी संदेह उत्पन्न हुआ है।
शिकायत में कहा गया है कि पूज्य महर्षि महेश योगी ने जिस उद्देश्य से इस विश्वविद्यालय की स्थापना की थी, वर्तमान प्रबंधन की कार्यशैली उससे विपरीत दिखाई देती है। आरोप है कि संस्थान के उच्च आदर्शों को दरकिनार कर प्रशासनिक अनियमितताओं और भ्रामक सूचनाओं के माध्यम से विश्वविद्यालय की गरिमा को ठेस पहुंचाई जा रही है।
राष्ट्रपति से लेकर UGC तक पहुंची शिकायत
निदेशक राजपूत ने निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग करते हुए भारत की राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के मुख्य न्यायाधीश, मध्यप्रदेश के राज्यपाल, मुख्य सचिव, मध्य प्रदेश पुलिस के पुलिस महानिदेशक, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) तथा उच्च शिक्षा विभाग को ईमेल के माध्यम से विस्तृत दस्तावेज भेजे हैं।
विधानसभा और वार्षिक प्रतिवेदन में अलग-अलग आंकड़े
शिकायत के अनुसार, फरवरी 2024 में मध्यप्रदेश विधानसभा के तारांकित प्रश्न क्रमांक 1780 के उत्तर में शैक्षणिक सत्र 2023-24 के लिए विश्वविद्यालय में 12,325 नियमित छात्र और 60,399 दूरस्थ शिक्षा के छात्र बताए गए। इस प्रकार कुल छात्र संख्या 72,724 दर्शाई गई।
इसके विपरीत, उसी सत्र की विश्वविद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट में 10,818 नियमित और 79,326 स्वाध्यायी छात्रों का उल्लेख किया गया, जिससे कुल संख्या 90,144 हो गई। एक ही शैक्षणिक सत्र के लिए दो आधिकारिक दस्तावेजों में लगभग 17,420 छात्रों का अंतर दर्ज होना गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
87 हजार से अधिक छात्रों का रिकॉर्ड संदिग्ध
सबसे चौंकाने वाला तथ्य जुलाई 2025 में सामने आया, जब विधानसभा के प्रश्न क्रमांक 505 और 506 के उत्तर में कुल छात्र संख्या मात्र 1,417 और 1,924 बताई गई। यदि पूर्व में दर्ज आंकड़ों से तुलना की जाए, तो 87,000 से अधिक छात्रों का रिकॉर्ड अचानक अनुपस्थित दिखाई देता है। शिकायतकर्ता ने पूछा है कि क्या यह प्रशासनिक त्रुटि है, डेटा प्रबंधन की गंभीर कमी है या फिर जानबूझकर प्रस्तुत किए गए भ्रामक आंकड़ों का मामला।
कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की मांग
शिकायत में कहा गया है कि यदि जानबूझकर गलत जानकारी प्रस्तुत की गई है, तो यह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988, भारतीय न्याय संहिता (पूर्व भारतीय दंड संहिता की समकक्ष धाराएं), तथा सरकारी अभिलेखों में मिथ्या सूचना देने से संबंधित प्रावधानों के तहत जांच योग्य विषय हो सकता है। साथ ही विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियामकीय मानकों और सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत अभिलेखीय पारदर्शिता की आवश्यकता भी रेखांकित की गई है।
विश्वविद्यालय की साख पर असर
शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि छात्र संख्या के आंकड़ों में वास्तविक विसंगति पाई जाती है, तो इससे विश्वविद्यालय की शैक्षणिक साख, नियामकीय अनुपालन और वित्तीय पारदर्शिता पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। शिकायतकर्ता ने मांग की है कि भौतिक सत्यापन, अभिलेख परीक्षण और वित्तीय ऑडिट कराकर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।
अब निगाहें उच्च शिक्षा विभाग, UGC और संबंधित संवैधानिक संस्थाओं पर हैं कि वे इस मामले की जांच कर तथ्य सामने लाते हैं या नहीं। फिलहाल विश्वविद्यालय प्रबंधन की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं हुई है।



