अगर ढीमरखेड़ा में दमकल गाड़ी होती तो नहीं होती इतनी बड़ी तबाही: नरवाई की आग से 36 किसानों की फसल खाक, किसानों की खून-पसीने की कमाई राख यह आग केवल खेतों को नहीं जलाई, बल्कि किसानों के सपनों, उनकी मेहनत और उनके विश्वास को भी झकझोर गई,ढीमरखेड़ा को वह सुविधा कब मिलेगी जिसकी मांग वर्षों से की जा रही है।
कलयुग की कलम से राकेश यादव

अगर ढीमरखेड़ा में दमकल गाड़ी होती तो नहीं होती इतनी बड़ी तबाही: नरवाई की आग से 36 किसानों की फसल खाक, किसानों की खून-पसीने की कमाई राख यह आग केवल खेतों को नहीं जलाई, बल्कि किसानों के सपनों, उनकी मेहनत और उनके विश्वास को भी झकझोर गई,ढीमरखेड़ा को वह सुविधा कब मिलेगी जिसकी मांग वर्षों से की जा रही है।
कलयुग की कलम उमरिया पान – तहसील ढीमरखेड़ा के ग्राम मुरवारी में शुक्रवार का दिन किसानों के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं रहा। नरवाई में लगी एक छोटी सी आग ने अचानक विकराल रूप धारण कर लिया और देखते ही देखते 36 किसानों की सालभर की मेहनत, उम्मीदें और सपने जलकर राख हो गए। तेज हवाओं ने आग को ऐसा रौद्र रूप दिया कि खड़ी और कटी हुई फसलें कुछ ही पलों में चपेट में आ गईं। यह घटना न केवल एक बड़ी त्रासदी है, बल्कि क्षेत्र में दमकल सुविधा के अभाव की गंभीर हकीकत भी उजागर करती है।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, खेतों में नरवाई जलाने के दौरान बरती गई लापरवाही इस आग का मुख्य कारण मानी जा रही है। दोपहर के समय अचानक उठीं आग की लपटों ने आसपास के खेतों को अपनी गिरफ्त में लेना शुरू कर दिया। ग्रामीणों ने जैसे ही धुआं और आग की तेज लपटें देखीं, पूरे गांव में अफरा-तफरी मच गई। हर कोई अपने-अपने खेतों की ओर दौड़ पड़ा, क्योंकि उन खेतों में सिर्फ फसल नहीं, बल्कि उनकी पूरी जिंदगी की कमाई और परिवार का भविष्य दांव पर लगा था।
किसानों के लिए फसल केवल अनाज नहीं होती, बल्कि वह उनके खून-पसीने की कमाई, बच्चों की पढ़ाई, बेटियों की शादी और पूरे परिवार की जिम्मेदारियों का आधार होती है। कई किसानों ने कर्ज लेकर, दिन-रात मेहनत करके फसल तैयार की थी। लेकिन आग की लपटों ने पल भर में उनकी सारी मेहनत को निगल लिया। खेतों में खड़े किसान बेबस होकर अपनी फसल को जलते हुए देखते रहे—यह दृश्य इतना दर्दनाक था कि कई किसानों की आंखें नम हो गईं।
ग्रामीणों ने साहस दिखाते हुए खुद ही आग बुझाने का प्रयास शुरू किया। पानी के टैंकर, मिट्टी और ट्रैक्टरों की मदद से आग पर काबू पाने की कोशिशें की गईं। महिलाएं और बच्चे भी इस प्रयास में पीछे नहीं रहे। लेकिन तेज हवा के कारण आग लगातार फैलती रही और हालात नियंत्रण से बाहर होते चले गए।
घटना की सूचना प्रशासन और दमकल विभाग को दी गई, लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि ढीमरखेड़ा जनपद में खुद की कोई दमकल गाड़ी नहीं है। ऐसे में कटनी और सिहोरा से दमकल वाहन बुलाना पड़ा। दूरी अधिक होने के कारण दमकल के पहुंचने में काफी समय लग गया, और जब तक सहायता पहुंची, तब तक अधिकांश फसलें जलकर पूरी तरह नष्ट हो चुकी थीं। दमकल कर्मियों ने कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू तो पा लिया, लेकिन तब तक किसानों का भारी नुकसान हो चुका था।
यह घटना एक बार फिर उस लंबे समय से चली आ रही मांग को सामने लाती है, जिसमें ढीमरखेड़ा में दमकल गाड़ी की आवश्यकता जताई जाती रही है। जनपद में 73 ग्राम पंचायतें आती हैं, लेकिन आग बुझाने जैसी आपात स्थिति से निपटने के लिए कोई स्थानीय संसाधन उपलब्ध नहीं है। यदि नियमों और आपदा प्रबंधन के मानकों की बात करें, तो इतने बड़े क्षेत्र में प्राथमिक स्तर पर अग्निशमन सुविधा होना अनिवार्य माना जाता है, ताकि समय रहते आग जैसी घटनाओं पर नियंत्रण पाया जा सके।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों का कहना है कि कई बार प्रशासन को ज्ञापन देकर दमकल गाड़ी की मांग की गई, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। हर बार ऐसी घटनाओं के बाद आश्वासन तो मिलते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति जस की तस बनी रहती है। क्षेत्रीय विधायक से भी जनता ने गुहार लगाई है कि इस गंभीर समस्या को प्राथमिकता में लिया जाए।
किसानों का साफ कहना है कि यदि ढीमरखेड़ा में दमकल गाड़ी उपलब्ध होती, तो आग पर शुरुआती समय में ही काबू पाया जा सकता था और इतना बड़ा नुकसान नहीं होता। यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की कमी का परिणाम है, जिसकी कीमत किसानों को अपनी मेहनत और पूंजी गंवाकर चुकानी पड़ रही है।
राजस्व विभाग द्वारा नुकसान का आंकलन किया जा रहा है और प्रभावित किसानों को मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू होने की बात कही जा रही है। लेकिन किसानों का दर्द सिर्फ मुआवजे से खत्म नहीं होगा, क्योंकि उनकी फसल में उनकी उम्मीदें, संघर्ष और परिवार का भविष्य जुड़ा होता है।
ग्रामीणों का कहना है कि अब समय आ गया है कि प्रशासन केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित न रहे, बल्कि जमीनी स्तर पर ठोस व्यवस्था सुनिश्चित करे। ढीमरखेड़ा में स्थायी दमकल गाड़ी की व्यवस्था न केवल आवश्यक है, बल्कि यह भविष्य में होने वाली ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए बेहद जरूरी कदम भी है।
यह आग केवल खेतों को नहीं जलाई, बल्कि किसानों के सपनों, उनकी मेहनत और उनके विश्वास को भी झकझोर गई है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेता है और कब तक ढीमरखेड़ा को वह सुविधा मिल पाती है, जिसकी मांग वर्षों से की जा रही है।



