डिग्री विवाद पर विभाग की चुप्पी! महर्षि महेश योगी विश्वविद्यालय मामले में जांच से किनारा, शिकायत फाइलों में दबाने के आरोप,हजारों छात्रों के भविष्य पर सवाल, सक्षम प्राधिकारी को भेजने के बजाय जिम्मेदारी से बचने की चर्चा विश्वविद्यालय से जुड़े प्रकरण में जांच प्रक्रिया और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर उठ रहे सवाल।
कलयुग की कलम से राकेश यादव

डिग्री विवाद पर विभाग की चुप्पी! महर्षि महेश योगी विश्वविद्यालय मामले में जांच से किनारा, शिकायत फाइलों में दबाने के आरोप,हजारों छात्रों के भविष्य पर सवाल, सक्षम प्राधिकारी को भेजने के बजाय जिम्मेदारी से बचने की चर्चा विश्वविद्यालय से जुड़े प्रकरण में जांच प्रक्रिया और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर उठ रहे सवाल।
जबलपुर/कटनी
कलयुग की कलम उमरिया पान – महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय से जुड़ी अंकसूचियों और उपाधियों की मान्यता संबंधी शिकायतों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। शिकायतकर्ता द्वारा विश्वविद्यालय में कथित अनियमितताओं और दस्तावेजों की वैधता की जांच की मांग किए जाने के बाद उच्च शिक्षा विभाग के क्षेत्रीय अतिरिक्त संचालक कार्यालय, जबलपुर द्वारा अधिकार क्षेत्र का हवाला देते हुए मामले में जांच से असमर्थता जताई गई है। इस निर्णय के बाद शिकायत के निस्तारण की प्रक्रिया और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर कई सवाल उठने लगे हैं।
जानकारी के अनुसार, शिकायत में विश्वविद्यालय से जुड़े दस्तावेजों की जांच तथा मामले की निष्पक्ष पड़ताल कराने की मांग की गई थी। हालांकि क्षेत्रीय अतिरिक्त संचालक कार्यालय ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए जांच कराने में असमर्थता व्यक्त कर दी। इसके बाद यह प्रश्न उठ रहा है कि यदि संबंधित कार्यालय के पास जांच का अधिकार नहीं था, तो क्या शिकायत को सक्षम प्राधिकारी या उच्च स्तर के विभागीय अधिकारियों को अग्रेषित किया जाना चाहिए था।
प्रशासनिक प्रक्रियाओं के जानकारों का मानना है कि जनहित और छात्रहित से जुड़े मामलों में शिकायतों को उचित स्तर तक पहुंचाना शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी होती है, ताकि शिकायतकर्ता को न्यायसंगत प्रक्रिया का लाभ मिल सके। ऐसे में मामले को आगे भेजे जाने अथवा न भेजे जाने को लेकर विभिन्न स्तरों पर चर्चा शुरू हो गई है।
शिकायतकर्ता पक्ष का यह भी कहना है कि शिकायत पर हुई कार्रवाई अथवा विभागीय निर्णय की जानकारी उन्हें प्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध नहीं कराई गई। इससे पारदर्शिता और सूचना के अधिकार को लेकर भी प्रश्न खड़े हो रहे हैं। दूसरी ओर विभागीय स्तर पर अभी तक इस संबंध में कोई विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।
मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यह विषय विद्यार्थियों के शैक्षणिक अभिलेखों और भविष्य से जुड़ा बताया जा रहा है। यदि किसी प्रकार की अनियमितता के आरोपों की जांच लंबित रहती है, तो इससे संबंधित छात्रों के बीच असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि उच्च शिक्षा विभाग, राज्य शासन अथवा अन्य सक्षम संस्थाएं इस मामले में क्या रुख अपनाती हैं। छात्रहित और शैक्षणिक पारदर्शिता से जुड़े इस प्रकरण में आगे की कार्रवाई को लेकर व्यापक अपेक्षाएं बनी हुई हैं।



