ढीमरखेड़ा में गूंजा ‘आरक्षण सुधार’ का स्वर,सवर्ण समाज ने कहा—आरक्षण का विरोध नहीं, व्यवस्था की समीक्षा जरूरी; आर्थिक आधार, क्रीमीलेयर और सवर्ण आयोग की मांग,जनसभा के समापन पर समाज के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन एसडीएम ढीमरखेड़ा को सौंपा।
कलयुग की कलम से राकेश यादव

ढीमरखेड़ा में गूंजा ‘आरक्षण सुधार’ का स्वर,सवर्ण समाज ने कहा—आरक्षण का विरोध नहीं, व्यवस्था की समीक्षा जरूरी; आर्थिक आधार, क्रीमीलेयर और सवर्ण आयोग की मांग,जनसभा के समापन पर समाज के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन एसडीएम ढीमरखेड़ा को सौंपा।
कटनी/ म.प्र
कलयुग की कलम ढीमरखेड़ा – आरक्षण व्यवस्था में समयानुकूल बदलाव और व्यापक समीक्षा की मांग को लेकर मंगलवार को ढीमरखेड़ा में सवर्ण समाज की ओर से शांतिपूर्ण जनसभा आयोजित की गई। सभा के बाद राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के नाम विभिन्न मांगों से संबंधित ज्ञापन अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) ढीमरखेड़ा को सौंपा गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में समाज के लोग शामिल हुए। मुख्य वक्ता के रूप में भेड़ा वाले ब्रह्मनंद दास जी महाराज उपस्थित रहे।
सभा में वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी जाति या समुदाय का विरोध करना नहीं है। उन्होंने इसे ‘आरक्षण विरोध नहीं, आरक्षण सुधार आंदोलन’ बताते हुए कहा कि व्यवस्था की समीक्षा इस उद्देश्य से होनी चाहिए कि इसका लाभ वास्तव में जरूरतमंद और वंचित लोगों तक पहुंच सके।
आर्थिक आधार को आरक्षण का महत्वपूर्ण आधार बनाने की मांग
ज्ञापन में आरक्षण व्यवस्था की निष्पक्ष समीक्षा करते हुए आर्थिक स्थिति को भी प्रमुख आधार बनाने की मांग की गई। वक्ताओं ने कहा कि गरीबी किसी जाति की पहचान नहीं है और समाज के प्रत्येक वर्ग में आर्थिक रूप से कमजोर परिवार मौजूद हैं।
उनका कहना था कि बदलते सामाजिक और आर्थिक परिवेश में ऐसी व्यवस्था पर विचार होना चाहिए, जिसमें जरूरतमंद परिवारों के बच्चों को शिक्षा, रोजगार और आगे बढ़ने के अवसर मिल सकें। वक्ताओं ने केंद्र सरकार से सभी पक्षों से विचार-विमर्श कर पारदर्शी एवं न्यायसंगत नीति तैयार करने की अपील की।
आरक्षित वर्ग में क्रीमीलेयर व्यवस्था लागू करने पर जोर
सभा में आरक्षित वर्गों के आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों को क्रीमीलेयर के दायरे में लाने की मांग भी उठी। वक्ताओं ने कहा कि आरक्षण का लाभ उन लोगों तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचना चाहिए, जो वास्तव में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हैं।
उन्होंने सरकार से इस विषय पर व्यापक अध्ययन और सभी वर्गों के प्रतिनिधियों से चर्चा के बाद व्यावहारिक व्यवस्था बनाने की मांग की।
यूजीसी नियमों पर पुनर्विचार की मांग
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से जुड़े नियमों में हाल में हुए बदलावों को लेकर भी आपत्ति दर्ज कराई गई। समाज की ओर से संबंधित प्रावधानों पर पुनर्विचार अथवा उन्हें वापस लेने की मांग रखी गई।
वक्ताओं ने कहा कि उच्च शिक्षा में पारदर्शिता के साथ विद्यार्थियों की प्रतिभा, मेहनत और आर्थिक परिस्थितियों को भी पर्याप्त महत्व मिलना चाहिए।
एससी-एसटी एक्ट पर 2018 के सुप्रीम कोर्ट दिशा-निर्देशों का मुद्दा
ज्ञापन में एससी-एसटी एक्ट से संबंधित वर्ष 2018 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों को पुनर्स्थापित करने की मांग भी शामिल रही। वक्ताओं ने कहा कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को कानूनी संरक्षण मिलना आवश्यक है, लेकिन कानून के कथित दुरुपयोग से जुड़े मामलों पर भी सरकार को संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि कानून का उद्देश्य पीड़ित को न्याय दिलाने के साथ निर्दोष व्यक्ति के अधिकारों की सुरक्षा करना भी होना चाहिए।
गरीब सवर्णों के लिए ‘सवर्ण आयोग’ की मांग
सभा में आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण परिवारों के विद्यार्थियों और युवाओं की समस्याओं के समाधान के लिए सवर्ण आयोग के गठन की मांग प्रमुखता से रखी गई।
वक्ताओं ने कहा कि गरीब और मेधावी युवाओं को शिक्षा, छात्रवृत्ति, रोजगारपरक प्रशिक्षण तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में संस्थागत व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
‘भूख और आंसुओं की कोई जाति नहीं होती’
सभा के दौरान वक्ताओं ने कहा कि “भूख की कोई जाति नहीं होती और आंसुओं का कोई धर्म नहीं होता।” उनका कहना था कि आर्थिक संकट किसी व्यक्ति की जाति देखकर उसके घर तक नहीं पहुंचता। इसलिए गरीब और जरूरतमंद परिवारों के लिए अवसरों की व्यवस्था करते समय आर्थिक स्थिति को भी गंभीरता से देखा जाना चाहिए।
वक्ताओं ने कहा कि भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है और विज्ञान, तकनीक तथा अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में देश ने अपनी क्षमता साबित की है। ऐसे में युवाओं के लिए ऐसी व्यवस्था जरूरी है, जिसमें प्रतिभा और आवश्यकता दोनों को महत्व मिले।
डॉ. आंबेडकर के विचारों का किया उल्लेख
सभा में संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए वक्ताओं ने कहा कि आरक्षण का मूल उद्देश्य सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को आगे लाना था। उन्होंने कहा कि आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर किसी भी बदलाव का निर्णय संविधान, न्यायिक व्यवस्था, विशेषज्ञों की राय और सभी वर्गों के हितों को ध्यान में रखकर होना चाहिए।
वक्ताओं ने आरक्षण व्यवस्था के वास्तविक लाभार्थियों तक लाभ पहुंचाने के लिए समय-समय पर इसकी समीक्षा की आवश्यकता भी बताई।
प्रतिभा और अवसरों को लेकर जताई चिंता
सभा में युवाओं की प्रतिभा और उन्हें मिलने वाले अवसरों का मुद्दा भी उठाया गया। वक्ताओं ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं और उच्च शिक्षा में मेहनत करने वाले विद्यार्थियों को आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए।
उन्होंने प्रतिभाशाली युवाओं के विदेश जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में ही बेहतर शिक्षा, रोजगार और शोध के अवसर विकसित किए जाएं, ताकि युवाओं की प्रतिभा का लाभ राष्ट्र निर्माण में मिल सके।
सीमा पर सैनिकों की एकता का दिया उदाहरण
वक्ताओं ने भारतीय सैनिकों का उदाहरण देते हुए कहा कि सीमा पर देश की रक्षा करते समय जवान के लिए जाति, धर्म या वर्ग से अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्र होता है। इसी प्रकार देश के विकास में भी सामाजिक समरसता और समान अवसर की भावना मजबूत होनी चाहिए।
सभा में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के जीवन का उल्लेख करते हुए वक्ताओं ने कहा कि सामान्य पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने अपनी प्रतिभा और परिश्रम के बल पर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक का सफर तय किया। उन्होंने कहा कि देश को आगे बढ़ाने के लिए हर प्रतिभाशाली और जरूरतमंद युवा को अवसर मिलना जरूरी है।
जंतर-मंतर के आंदोलन को समर्थन
कार्यक्रम में ढीमरखेड़ा क्षेत्र के सवर्ण समाज की ओर से नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर 21 अगस्त 2026 से चल रहे राष्ट्रव्यापी आरक्षण संबंधी आंदोलन के प्रति समर्थन भी व्यक्त किया गया। वक्ताओं ने केंद्र सरकार से आरक्षण नीति, शैक्षणिक नियमों और संबंधित कानूनों पर व्यापक चर्चा कर आवश्यक सुधारों पर विचार करने की अपील की।
ज्ञापन सौंपकर शांतिपूर्ण आंदोलन का संदेश
जनसभा के समापन पर समाज के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन एसडीएम ढीमरखेड़ा को सौंपा। ज्ञापन में आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा, आर्थिक आधार को महत्व देने, आरक्षित वर्ग में क्रीमीलेयर व्यवस्था, यूजीसी नियमों पर पुनर्विचार, एससी-एसटी एक्ट से जुड़े 2018 के सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों पर विचार तथा सवर्ण आयोग के गठन सहित विभिन्न मांगें रखी गईं।
वक्ताओं ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी मांगों को शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से सरकार तक पहुंचाना नागरिकों का अधिकार है। उन्होंने केंद्र सरकार से सभी वर्गों की भावनाओं और हितों को ध्यान में रखते हुए मांगों पर गंभीरता से विचार करने की अपील की।



