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जब बेटियां स्कूल नहीं पहुंचीं, तो शिक्षक जंगल की पगडंडी तक पहुंच गए! फीस और ड्रेस बनी पढ़ाई की राह में बाधा, नैगवा के शिक्षकों ने घर से तीन किलोमीटर दूर पहुंचकर खोज निकाला बेटियों का पता प्राचार्य विपिन तिवारी ने कहा—“तुम बस स्कूल आओ, बाकी हम देख लेंगे”शिक्षकों की इस पहल को सैल्यूट—क्योंकि जब शिक्षक बच्चों तक पहुंचते हैं, तभी शिक्षा सच में बच्चों के जीवन तक पहुंचती है।

कलयुग की कलम से राकेश यादव

जब बेटियां स्कूल नहीं पहुंचीं, तो शिक्षक जंगल की पगडंडी तक पहुंच गए! फीस और ड्रेस बनी पढ़ाई की राह में बाधा, नैगवा के शिक्षकों ने घर से तीन किलोमीटर दूर पहुंचकर खोज निकाला बेटियों का पता प्राचार्य विपिन तिवारी ने कहा—“तुम बस स्कूल आओ, बाकी हम देख लेंगे”शिक्षकों की इस पहल को सैल्यूट—क्योंकि जब शिक्षक बच्चों तक पहुंचते हैं, तभी शिक्षा सच में बच्चों के जीवन तक पहुंचती है।

कलयुग की कलम कटनी – शिक्षा केवल किताबों और कक्षाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि जरूरत पड़ने पर विद्यार्थी तक पहुंचना भी एक शिक्षक की जिम्मेदारी है। इसी सोच की प्रेरक मिसाल नैगवा के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में देखने को मिली, जहां कक्षा 10वीं की दो छात्राओं के स्कूल नहीं आने पर शिक्षकों ने उनकी अनुपस्थिति को सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं किया। प्राचार्य विपिन तिवारी के नेतृत्व में विद्यालय का स्टाफ छात्राओं को तलाशते हुए करीब तीन किलोमीटर दूर खुसरा महादेव तक पहुंच गया।

दरअसल, रोज की तरह विद्यालय में कक्षाएं संचालित हो रही थीं, लेकिन कक्षा 10वीं की छात्राएं अंकिता और सरिता लगातार स्कूल नहीं पहुंच रही थीं। दोनों की खाली कुर्सियों ने शिक्षकों का ध्यान खींचा। शिक्षकों ने यह जानने का प्रयास किया कि आखिर छात्राएं विद्यालय से दूर क्यों हैं और कहीं कोई ऐसी परेशानी तो नहीं, जो उनकी पढ़ाई के रास्ते में बाधा बन रही है।

जब घर पर नहीं मिलीं छात्राएं, तो शिक्षक निकल पड़े तलाश में

प्राचार्य विपिन तिवारी और विद्यालय के स्टाफ ने छात्राओं के घर पहुंचकर जानकारी ली। पता चला कि दोनों छात्राएं खुसरा महादेव गई हुई हैं। इसके बाद शिक्षकों ने इंतजार करने के बजाय स्वयं वहां पहुंचकर छात्राओं से मिलने का निर्णय लिया। प्राचार्य, अतिथि शिक्षक और विद्यालय के अन्य स्टाफ ने करीब तीन किलोमीटर की राह तय की और दोनों छात्राओं तक पहुंचे।

बातचीत के दौरान सामने आया कि विद्यालय से उनकी दूरी किसी उदासीनता की वजह से नहीं, बल्कि आर्थिक और व्यक्तिगत परिस्थितियों के कारण बनी थी।

एक के पास फीस नहीं थी, दूसरी ड्रेस के अभाव में नहीं आ रही थी

छात्रा सरिता ने शिक्षकों को बताया कि आर्थिक परेशानी के कारण वह स्कूल की फीस जमा नहीं कर पा रही थी। फीस की चिंता के चलते उसने विद्यालय आना बंद कर दिया था। इस पर प्राचार्य विपिन तिवारी ने उसे भरोसा दिलाया कि वह फीस की चिंता न करे और नियमित रूप से विद्यालय आए। विद्यालय स्तर से उसकी समस्या के समाधान का प्रयास किया जाएगा।

वहीं छात्रा अंकिता के सामने स्कूल ड्रेस की समस्या थी। ड्रेस नहीं होने के कारण वह संकोचवश विद्यालय नहीं आ रही थी। प्राचार्य ने उसे भी भरोसा दिलाया कि ड्रेस की व्यवस्था विद्यालय की ओर से कराने का प्रयास किया जाएगा और उसे बिना झिझक स्कूल आना चाहिए।

“तुम बस स्कूल आओ, बाकी हम देख लेंगे”

प्राचार्य के इन शब्दों ने दोनों छात्राओं में नया विश्वास जगाया। आर्थिक कठिनाई या ड्रेस जैसी छोटी-सी जरूरत उनकी शिक्षा में स्थायी बाधा न बने, इसके लिए विद्यालय परिवार ने संवेदनशीलता दिखाई। दोनों छात्राओं ने विद्यालय वापस आने की सहमति दी।

शिक्षक सिर्फ पढ़ाते नहीं, भविष्य भी संवारते हैं

प्राचार्य विपिन तिवारी का कहना है कि किसी विद्यार्थी की पढ़ाई केवल फीस, ड्रेस या अन्य आवश्यकताओं के अभाव में रुकनी नहीं चाहिए। विद्यालय का प्रयास है कि प्रत्येक बच्चा नियमित रूप से स्कूल आए, शिक्षा प्राप्त करे और अपने भविष्य को बेहतर बनाने की दिशा में आगे बढ़े।

नैगवा के शिक्षकों की यह पहल केवल दो छात्राओं को विद्यालय वापस लाने का प्रयास नहीं, बल्कि “हर बच्चा पढ़े और कोई भी बच्चा मजबूरी के कारण शिक्षा से दूर न हो” की भावना को जमीन पर उतारने वाली मिसाल है। ऐसे संवेदनशील शिक्षक वास्तव में बच्चों को सिर्फ पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाते, बल्कि उनके सपनों को उड़ान देने का काम करते हैं।

शिक्षकों की इस पहल को सैल्यूट—क्योंकि जब शिक्षक बच्चों तक पहुंचते हैं, तभी शिक्षा सच में बच्चों के जीवन तक पहुंचती है।

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