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जब शिक्षक खुद पहुँचे बस्ती, तब भरे परीक्षा कक्ष”आदिवासी बस्तियों से परीक्षा कक्ष तक: शिक्षकों की पहल बनी मिसाल”शिक्षा के लिए अनूठी पहल, घर-घर जाकर विद्यार्थियों को लाए स्कूल

कलयुग की कलम से राकेश यादव

जब शिक्षक खुद पहुँचे बस्ती, तब भरे परीक्षा कक्ष”आदिवासी बस्तियों से परीक्षा कक्ष तक: शिक्षकों की पहल बनी मिसाल”शिक्षा के लिए अनूठी पहल, घर-घर जाकर विद्यार्थियों को लाए स्कूल

कलयुग की कलम कटनी – शिक्षा के प्रति समर्पण और विद्यार्थियों के भविष्य को संवारने की सच्ची प्रतिबद्धता का प्रेरक उदाहरण बुधवार को जिले के आदिवासी क्षेत्र स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय नैगवां में देखने को मिला। यहां परीक्षा के दिन जब अधिकांश विद्यार्थी विद्यालय नहीं पहुंचे, तो शिक्षकों ने कर्तव्य की नई मिसाल पेश करते हुए स्वयं बस्तियों तक जाकर छात्रों को परीक्षा केंद्र तक पहुंचाया।

कक्षा 9वीं एवं 11वीं की द्वितीय परीक्षा के लिए बुधवार सुबह विद्यालय में परीक्षा की तैयारियां पूरी थीं, लेकिन निर्धारित समय तक केवल एक छात्रा ही परीक्षा देने पहुंची। लगभग खाली पड़े परीक्षा कक्ष ने विद्यालय प्रबंधन की चिंता बढ़ा दी। ऐसे में विद्यालय के प्राचार्य श्री विपिन तिवारी ने स्थिति को गंभीरता से लेते हुए स्वयं पहल करने का निर्णय लिया।

प्राचार्य एक सहयोगी शिक्षक के साथ निजी वाहन से करीब तीन किलोमीटर दूर स्थित आदिवासी बस्तियों खुसरा और रामपुरा पहुंचे। वहां जाकर पता चला कि कई विद्यार्थी अभी तक घरों में थे। कुछ बच्चे सो रहे थे, जबकि कुछ अन्य दैनिक गतिविधियों में व्यस्त थे। कई अभिभावकों में भी परीक्षा को लेकर अपेक्षित जागरूकता दिखाई नहीं दी।

इसके बावजूद शिक्षकों ने हार नहीं मानी। उन्होंने विद्यार्थियों और उनके परिजनों से संवाद किया, शिक्षा के महत्व को समझाया और बच्चों को परीक्षा में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद अपने वाहन से विद्यार्थियों को विद्यालय लाकर परीक्षा दिलवाई।

विशेष बात यह रही कि इनमें कुछ ऐसे विद्यार्थी भी शामिल थे, जिन्होंने परीक्षा शुल्क तक जमा नहीं किया था। इसके बावजूद विद्यालय परिवार ने उनके भविष्य को ध्यान में रखते हुए उन्हें परीक्षा से वंचित नहीं होने दिया और हरसंभव सहयोग प्रदान किया।

जिले में कलेक्टर श्री आशीष तिवारी के मार्गदर्शन एवं जिला शिक्षा विभाग के निर्देशन में आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। नैगवां विद्यालय की यह पहल उसी प्रयास की एक जीवंत तस्वीर बनकर सामने आई है।

यह घटना केवल परीक्षा में उपस्थिति बढ़ाने की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताती है कि जब शिक्षक अपनी भूमिका को कक्षा की चारदीवारी से बाहर निकालकर समाज तक ले जाता है, तब शिक्षा वास्तव में जन-जन तक पहुंचती है। ऐसे प्रयास उन बच्चों के लिए नई उम्मीद बनते हैं, जो परिस्थितियों के कारण शिक्षा से दूर होने लगते हैं।

प्रेरक संदेश

“विद्यालय तक विद्यार्थियों के कदम तभी बढ़ते हैं, जब शिक्षक उनके सपनों तक पहुंचने का रास्ता खुद तय करने निकल पड़ता है।”

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