आस्थामध्यप्रदेश

संतानों की लंबी उम्र की कामना में माताओं ने रखा निर्जला व्रत,श्रद्धा और आस्था से मना हलषष्ठी पर्व, हरछठ की पूजा कर मांगा बच्चों के सुख-स्वास्थ्य का आशीर्वाद,उमरिया पान, ढीमरखेड़ा, खमतरा, सिलौंडी, दशरमन सहित पूरे अंचल में दिनभर रही धार्मिक रौनक

कलयुग की कलम से राकेश यादव

संतानों की लंबी उम्र की कामना में माताओं ने रखा निर्जला व्रत,श्रद्धा और आस्था से मना हलषष्ठी पर्व, हरछठ की पूजा कर मांगा बच्चों के सुख-स्वास्थ्य का आशीर्वाद,उमरिया पान, ढीमरखेड़ा, खमतरा, सिलौंडी, दशरमन सहित पूरे अंचल में दिनभर रही धार्मिक रौनक

कलयुग की कलम उमरिया पान – भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि पर बुधवार को कटनी जिले के ग्रामीण अंचलों में हलषष्ठी, हलछठ और ललही छठ का पर्व पारंपरिक श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। उमरिया पान, ढीमरखेड़ा, खमतरा, सिलौंडी, दशरमन सहित आसपास के गांवों में सुबह से ही पर्व को लेकर चहल-पहल रही। माताओं ने अपनी संतानों की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना करते हुए निर्जला व्रत रखा और विधि-विधान से हरछठ की पूजा की।

घरों से लेकर पूजा स्थलों तक दिनभर धार्मिक वातावरण बना रहा। व्रती महिलाओं ने महुआ, पलाश और कांस की टहनियों से हरछठ की प्रतीकात्मक स्थापना की। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण और उनके ज्येष्ठ भ्राता भगवान बलराम का पूजन किया गया। पूजा में रोली, अक्षत, महुआ, चना और पसई (तिन्नी) के चावल सहित पारंपरिक सामग्री अर्पित की गई।

कई स्थानों पर महिलाओं ने समूह में बैठकर हलषष्ठी व्रत कथा का श्रवण किया। पूजा-अर्चना के दौरान महिलाओं ने अपनी संतानों की मंगलकामना करते हुए परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना की।

हल से जुते अन्न का नहीं किया सेवन

हलषष्ठी व्रत की परंपरा में हल से जोतकर उगाए गए अन्न के सेवन से परहेज किया जाता है। इसी मान्यता के चलते व्रती महिलाओं ने हल से उत्पादित अनाज, फल और सब्जियों का त्याग किया। प्राकृतिक रूप से उगने वाले पसई के चावल और महुआ का फलाहार किया गया।

पर्व की पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार पूजा और प्रसाद में भी विशेष नियमों का पालन किया गया। गाय के दूध के स्थान पर भैंस के दूध से तैयार दही और घी का उपयोग किया गया।

बलराम जयंती से जुड़ा है पर्व

हलषष्ठी पर्व को भगवान बलराम के प्राकट्य उत्सव से भी जोड़ा जाता है। भगवान बलराम का प्रमुख आयुध हल माना जाता है, इसलिए इस पर्व का कृषि परंपरा और ग्रामीण जीवन से गहरा संबंध है। गांवों में महिलाओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा कर पर्व मनाया।

दिनभर व्रत और पूजा-अर्चना के बाद शाम को व्रती महिलाओं ने छह प्रकार की भाजियों और पसई के चावल का सेवन कर व्रत का पारण किया। ग्रामीण अंचलों में पर्व को लेकर महिलाओं में विशेष उत्साह और आस्था देखने को मिली।

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