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खामोश संघर्ष का नाम ‘पिता’: जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा एक अनकहा सच,पिता का दर्द शब्दों में कम और खामोशी में अधिक दिखाई देता है।

कलयुग की कलम से राकेश

खामोश संघर्ष का नाम ‘पिता’: जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा एक अनकहा सच,पिता का दर्द शब्दों में कम और खामोशी में अधिक दिखाई देता है।

संपादकीय लेख 

आज के समाज में जब अधिकारों, सुविधाओं और संवेदनाओं की बात होती है, तब एक वर्ग ऐसा भी है जिसकी पीड़ा अक्सर अनदेखी रह जाती है—वह है ‘पिता’। परिवार की रीढ़ माने जाने वाले पिता का जीवन त्याग, जिम्मेदारी और खामोशी से बुनी एक ऐसी कहानी है, जिसे न तो अक्सर शब्द मिलते हैं और न ही पर्याप्त समझ।

पिता वह व्यक्ति है जो दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद भी अपने दर्द को चेहरे पर आने नहीं देता। उसकी थकान उसके कदमों में दिखती है, लेकिन चेहरे पर हमेशा मजबूती का मुखौटा होता है। अपनी भूख, अपनी बीमारी और अपनी इच्छाओं को वह परिवार की जरूरतों के पीछे सहजता से रख देता है। बच्चों की मुस्कान उसके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार होती है, जिसके लिए वह अपने कई सपनों को चुपचाप त्याग देता है।

समाज में भावनाओं को व्यक्त करने की जो सीमाएं पुरुषों पर थोप दी गई हैं, उसका सबसे बड़ा असर पिता पर पड़ता है। वह रोता नहीं, शिकायत नहीं करता, और यही कारण है कि उसका दर्द अक्सर अदृश्य रह जाता है। रात की खामोशी में उसकी चिंताएं जागती हैं, लेकिन सुबह होते ही वह फिर उसी दृढ़ता के साथ खड़ा नजर आता है।

बुढ़ापे में यह संघर्ष और गहरा हो जाता है। एक समय जो पूरे परिवार का सहारा था, वही व्यक्ति खुद को बोझ कहलाने के डर से भीतर ही भीतर टूटता रहता है। यह स्थिति केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक चिंता का विषय भी है।

प्रशासन और समाज की जिम्मेदारी

यह आवश्यक है कि प्रशासन और समाज दोनों इस अनदेखे पहलू को समझें। वरिष्ठ नागरिकों के लिए चलाई जा रही योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन, समय पर पेंशन, स्वास्थ्य सुविधाएं और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना केवल कागजी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि मानवीय कर्तव्य है।

परिवारों को भी चाहिए कि वे पिता के त्याग को केवल कर्तव्य मानकर नजरअंदाज न करें, बल्कि उनके भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य का भी ख्याल रखें।

पिता का दर्द शब्दों में कम और खामोशी में अधिक दिखाई देता है। झुके हुए कंधे, थकी हुई चाल और बिना शिकायत के निभाई जा रही जिम्मेदारियां उसके जीवन की असली कहानी हैं। समय आ गया है कि इस खामोश संघर्ष को पहचाना जाए और उसे वह सम्मान और संवेदना दी जाए, जिसका वह हकदार है।

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