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विकासखंड ढीमरखेड़ा के ग्राम कोठी में जैविक खेती से बदली तकदीर: रामदास बैगा बने गांव के रोल मॉडल, 82 हजार की कमाई से रची सफलता की नई कहानी

कलयुग की कलम से राकेश यादव

विकासखंड ढीमरखेड़ा के ग्राम कोठी में जैविक खेती से बदली तकदीर: रामदास बैगा बने गांव के रोल मॉडल, 82 हजार की कमाई से रची सफलता की नई कहानी

कलयुग की कलम ढीमरखेड़ा – मेहनत, सही मार्गदर्शन और आधुनिक तकनीक के समन्वय से कैसे एक साधारण किसान अपनी किस्मत बदल सकता है, इसका जीवंत उदाहरण हैं विकासखंड ढीमरखेड़ा के ग्राम कोठी निवासी रामदास बैगा। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने जैविक खेती अपनाकर न केवल अपनी आय बढ़ाई, बल्कि गांव में प्रेरणा का स्रोत बन गए हैं।

पहले पारंपरिक खेती पर निर्भर रामदास की आमदनी कम और अनिश्चित थी। लेकिन बीते वर्ष जून में नाबार्ड के सहयोग से “मानव जीवन विकास समिति” द्वारा उन्हें नई दिशा मिली। संस्था ने उन्हें 150 किलो अदरक और 100 किलो हल्दी के उन्नत बीज उपलब्ध कराए, साथ ही जैविक खेती की विधियों—जैसे गोबर खाद, जीवामृत और प्राकृतिक कीटनाशकों के उपयोग—का प्रशिक्षण दिया।

इस मार्गदर्शन और अपनी मेहनत के दम पर रामदास ने शानदार उत्पादन हासिल किया। उन्होंने लगभग 5 क्विंटल अदरक का उत्पादन किया, जिसे 80 रुपये प्रति किलो के भाव से बेचकर करीब 40 हजार रुपये कमाए। वहीं 7 क्विंटल हल्दी उत्पादन से 60 रुपये प्रति किलो के हिसाब से लगभग 42 हजार रुपये की आय प्राप्त की। इस तरह उन्होंने कुल 82 हजार रुपये की कमाई कर अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया।

रामदास की फसलों की खासियत यह है कि वे पूरी तरह केमिकल मुक्त हैं। जैविक उत्पादन होने के कारण उन्हें बाजार में बेहतर दाम मिले और ग्राहकों के बीच उनकी उपज की मांग भी तेजी से बढ़ी। आज वे न केवल आत्मनिर्भर बने हैं, बल्कि अन्य किसानों को भी जैविक खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

रामदास बैगा का कहना है कि संस्थाओं के सहयोग और सही मार्गदर्शन ने उनकी सोच बदल दी। उनके अनुसार जैविक खेती कम लागत में अधिक लाभ देने वाली तकनीक है। वे अपनी इस सफलता का श्रेय नाबार्ड और “मानव जीवन विकास समिति” को देते हुए उनका आभार व्यक्त करते हैं।

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