वैदिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय से सुलझेगा जल संकट महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय करौंदी में राष्ट्रीय संगोष्ठी, जल संरक्षण पर गहन मंथन
कलयुग की कलम से राकेश यादव

वैदिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय से सुलझेगा जल संकट महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय करौंदी में राष्ट्रीय संगोष्ठी, जल संरक्षण पर गहन मंथन
कलयुग की कलम उमरिया पान – जल संरक्षण और भूजल के सतत उपयोग जैसे महत्वपूर्ण विषय पर चिंतन के लिए कटनी स्थित महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय, ब्रह्मस्थान करौंदी में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। “भूजल के सतत उपयोग के लिए जल प्रबंधन : वैदिक काल से आधुनिक युग तक की यात्रा” विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी का आयोजन विश्वविद्यालय और इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ हाइड्रोजियोलॉजिस्ट्स (आईएएच) के भारतीय राष्ट्रीय अध्याय (आईएनसी–आईएएच) के संयुक्त तत्वावधान में 16 से 17 मार्च 2026 तक किया जा रहा है। इस संगोष्ठी में देशभर से आए जल वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने भाग लेकर जल संकट के समाधान पर अपने विचार रखे।

कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चार और दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इस अवसर पर प्रमुख वक्ताओं ने जल संरक्षण की भारतीय परंपरा और आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के समन्वय पर जोर दिया। वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान समय में जल संकट केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के सामने गंभीर चुनौती बनकर उभर रहा है। ऐसे में जल संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और संरक्षण के लिए व्यापक स्तर पर जागरूकता आवश्यक है।

संगोष्ठी के मुख्य अतिथि और विश्वविद्यालय के कुलाधिपति वेद विद्या मार्तंड ब्रह्मचारी गिरीश चंद्र वर्मा ने इस अवसर पर विश्वविद्यालय परिसर में स्थापित ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन (स्वचालित मौसम केंद्र) का लोकार्पण किया। यह आधुनिक उपकरण मौसम से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़ों को एकत्रित करने और उनका विश्लेषण करने में सहायक होगा, जिससे कृषि, पर्यावरण अध्ययन और जल प्रबंधन के क्षेत्र में शोध को नई दिशा मिलेगी। विशेषज्ञों के अनुसार यह मौसम केंद्र वर्षा, तापमान, आर्द्रता और अन्य जलवायु संबंधी आंकड़ों के आधार पर जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन में सहायक सिद्ध होगा।
अपने उद्बोधन में ब्रह्मचारी गिरीश चंद्र वर्मा ने कहा कि भारतीय संस्कृति में जल को देवता का दर्जा दिया गया है और हमारे प्राचीन ग्रंथों में जल संरक्षण से जुड़े अनेक सिद्धांत वर्णित हैं। उन्होंने कहा कि यदि इन वैदिक सिद्धांतों को आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ जोड़ा जाए तो जल संकट का स्थायी समाधान संभव है। उन्होंने विद्यार्थियों और समाज के लोगों से भी जल संरक्षण के प्रति जागरूक रहने का आह्वान किया।
विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. प्रमोद कुमार वर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि आज जल संकट वैश्विक समस्या बन चुका है। तेजी से बढ़ती जनसंख्या, जल संसाधनों का अत्यधिक दोहन और बदलते पर्यावरणीय हालात इसके प्रमुख कारण हैं। उन्होंने कहा कि वैदिक ज्ञान परंपरा में प्रकृति और जल संसाधनों के संरक्षण की समृद्ध परंपरा रही है, जिसे आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ अपनाकर हम इस चुनौती से निपट सकते हैं।
संगोष्ठी में विशेषज्ञ वक्ता प्रो. ए.डी. सावंत और प्रो. ए.के. सिन्हा ने भी जल प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सतत विकास के लिए जल संसाधनों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए वैज्ञानिक शोध, आधुनिक तकनीक और समाज की सक्रिय भागीदारी तीनों का समन्वय जरूरी है।
कार्यक्रम के दौरान जल विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले वैज्ञानिकों को सम्मानित किया गया। साथ ही ज्ञान के प्रसार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण प्रकाशनों का विमोचन भी किया गया। इनमें शोध पत्रों का संकलन, विश्वविद्यालय की पत्रिका ‘महर्षि वैदिक स्वर’ तथा डॉ. रवि चौरे द्वारा लिखित पुस्तक ‘जल चौपाल’ शामिल हैं। इन प्रकाशनों के माध्यम से जल संरक्षण और प्रबंधन से जुड़े महत्वपूर्ण शोध और विचार समाज तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है।
कार्यक्रम के समापन के बाद विश्वविद्यालय के कुलाधिपति ब्रह्मचारी गिरीश चंद्र वर्मा ने प्रेस वार्ता को भी संबोधित किया। उन्होंने कहा कि भूजल के सतत उपयोग के लिए सरकार विभिन्न योजनाओं और उपायों के माध्यम से लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन केवल सरकारी प्रयासों से ही समस्या का समाधान संभव नहीं है। इसके लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को जागरूक और जिम्मेदार बनना होगा।
उन्होंने कहा कि हमें इस विषय पर गंभीर विचार मंथन करने की आवश्यकता है कि भूजल का संरक्षण किस प्रकार किया जाए और वर्षा जल सहित बाहरी जल स्रोतों को किस प्रकार सहेजा जाए। उन्होंने यह भी कहा कि जल संरक्षण से जुड़ी जानकारी विद्यार्थियों, युवाओं और समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि समाज और सरकार मिलकर प्रयास करें तो जल संकट की चुनौती से प्रभावी रूप से निपटा जा सकता है।
दो दिवसीय इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से आए वैज्ञानिक, शोधार्थी, शिक्षक और विद्यार्थी बड़ी संख्या में शामिल हो रहे हैं। संगोष्ठी के माध्यम से जल संरक्षण के प्रति जनजागरूकता बढ़ाने और सतत जल प्रबंधन के लिए ठोस सुझाव सामने आने की उम्मीद जताई जा रही है।


