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उमरिया-पान: चंदौल जलाशय की जर्जर नहर से संकट में सिंचाई—कानूनी दांव–पेंच में फंसे किसान, गेहूं की बुवाई पर असर वन विभाग और जल संसाधन विभाग के बीच अटका काम

कलयुग की कलम से राकेश यादव

उमरिया-पान: चंदौल जलाशय की जर्जर नहर से संकट में सिंचाई—कानूनी दांव–पेंच में फंसे किसान, गेहूं की बुवाई पर असर वन विभाग और जल संसाधन विभाग के बीच अटका काम

कलयुग की कलम उमरिया पान – क्षेत्र के हजारों किसानों की जीवनरेखा मानी जाने वाली चंदौल जलाशय की मुख्य नहर वर्षों से जर्जर हालत में पड़ी है। नहर की टूट-फूट और स्थान–स्थान पर क्षतिग्रस्त संरचना के चलते इस सीजन में किसानों की सिंचाई व्यवस्था पूरी तरह संकट में आ गई है। जलाशय से निकलने वाली यह नहर कई हजार एकड़ कृषि भूमि को सींचती है, लेकिन समय पर मरम्मत और रखरखाव नहीं होने की वजह से किसानों की उम्मीदों पर पानी फिरता नजर आ रहा है।

मरम्मत में लापरवाही—किसान दुविधा में

क्षेत्र के किसानों का कहना है कि जलाशय की नहर की मरम्मत लंबे समय से लंबित है। जिम्मेदार विभागों को कई बार अवगत कराने के बावजूद समय पर कार्य शुरू नहीं किया गया। अब जब रबी सीजन की शुरुआत हो चुकी है और गेहूं की बुवाई का सर्वोत्तम समय चल रहा है, तब किसानों के सामने यह बड़ा सवाल खड़ा है कि—नहर चालू होगी या नहीं?

इसी असमंजस की वजह से बड़ी संख्या में किसान अब तक गेहूं की बुवाई करने से पीछे हट रहे हैं, क्योंकि यदि समय रहते पानी नहीं मिला तो उनकी फसल की पूरी मेहनत बेकार हो जाएगी।

 वन विभाग और जल संसाधन विभाग के बीच अटका काम

जल संसाधन विभाग के कार्यपालन यंत्री का कहना है कि नहर की मरम्मत का कार्य प्रारंभ कर दिया गया था, लेकिन इस दौरान वन विभाग के हस्तक्षेप के बाद काम रोकना पड़ा।वन विभाग ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि—या तो 1990 के दशक की अनुमति संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत किए जाएं,अथवा कटनी वन मंडल से नई अनुमति प्राप्त की जाए।

इन दस्तावेजों के बिना नहर पर किसी भी प्रकार का निर्माण अथवा मरम्मत कार्य करने की अनुमति नहीं है। यही कारण है कि अभी तक नहर का काम आधा-अधूरा पड़ा हुआ है।

 कानूनी प्रक्रिया और नियमों की जटिलता

वन भूमि पर किसी भी प्रकार के निर्माण, खुदाई या मरम्मत कार्य के लिए निम्न कानूनी प्रक्रियाएँ अनिवार्य हैं।

भारतीय वन अधिनियम, 1927

इस अधिनियम के अंतर्गत वन क्षेत्र में बिना वैध अनुमति किसी भी प्रकार का विकास कार्य दंडनीय है।वन संरक्षण अधिनियम, 1980 की धारा 2 इस धारा के अनुसार वन भूमि के स्वरूप में परिवर्तन अथवा उपयोग में बदलाव के लिए राज्य और केंद्र सरकार की अनुमतियाँ जरूरी होती हैं।

 

राजस्व एवं वन सीमा का स्पष्ट निर्धारण

कई बार परियोजना क्षेत्र वन विभाग और राजस्व विभाग की संयुक्त सीमा पर होता है। ऐसे मामलों में दोनों विभागों की सहमति अनिवार्य होती है।चंदौल जलाशय नहर का हिस्सा वन क्षेत्र से होकर गुजरता है, ऐसे में वन विभाग द्वारा पुराने दस्तावेजों की मांग कानूनी रूप से सही है। लेकिन इस प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया के बीच किसान ही पिस रहे हैं।

 सरकारी दावों से उलट जमीनी वास्तविकता

राज्य सरकार लगातार यह दावा करती रही है कि किसानों को सिंचाई के लिए किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं होगी सभी आवश्यक व्यवस्थाएँ समय पर उपलब्ध कराई जाएंगी किसानों की समस्याओं का त्वरित समाधान किया जाएगा लेकिन इस मामले में सरकार के सभी दावे जमीनी स्तर पर खोखले साबित होते दिखाई दे रहे हैं।

किसानों के अनुसार—“जब गेहूं की बुवाई का सही समय आया, तभी कानूनी प्रक्रियाओं और विभागीय खींचतान में सिंचाई व्यवस्था अटक गई। इसकी कीमत हमें फसल से उठानी पड़ेगी।”

 किसान बोले—अनिश्चितता ने बढ़ाई मुश्किलें

कई किसानों ने बताया कि यदि नहर शीघ्र मरम्मत होकर चालू नहीं हुई, तो इस वर्ष:गेहूं की बुवाई प्रभावित होगी उत्पादन घट सकता हैआर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है

कुछ किसानों ने यह भी कहा कि वे बीज और खाद खरीद कर रख चुके हैं, लेकिन पानी की अनिश्चितता के कारण वे खेत में बुवाई नहीं कर पा रहे हैं।

 तत्काल जरूरत—विभागों में समन्वय और शीघ्र अनुमति

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला प्रशासन की गंभीरता और विभागीय समन्वय की कमी का परिणाम है। 

अनुमति प्रक्रिया तेज की जाए

वन विभाग और जल संसाधन विभाग संयुक्त बैठक कर समाधान निकालें पुराने दस्तावेजों का सत्यापन कराया जाए तो नहर की मरम्मत शीघ्र शुरू हो सकती है और हजारों किसानों को राहत मिलेगी।

 लंबे समय का समाधान

इस प्रकार की समस्याओं से बचने के लिए राज्य स्तर पर नहरों की मरम्मत, रखरखाव और अनुमतियों के लिए एकीकृत प्रणाली तैयार करने की आवश्यकता है।

साथ ही प्रत्येक सिंचाई परियोजना के लिए वार्षिक रखरखाव कैलेंडर लागू किया जाना चाहिए, ताकि समय से पहले मरम्मत सुनिश्चित की जा सके और किसानों को प्रभावित न होना पड़े।कुल मिलाकर, चंदौल जलाशय की नहर मरम्मत का यह मुद्दा सिर्फ एक नहर का मसला नहीं है, बल्कि यह किसानों, प्रशासनिक तंत्र और कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलताओं को उजागर करता है। किसान उम्मीद लगाए बैठे हैं कि विभागीय खींचतान जल्द खत्म हो और नहर जल्द से जल्द चालू हो, ताकि वे समय पर गेहूं की बुवाई कर सकें और अपनी आजीविका को सुरक्षित रख सकें।

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