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बस स्टैंड नहीं तो बलिदान!”—पांच सूत्री मांगों पर अड़े समाजसेवी चंद्रकांत चंदू चौरसिया, गणतंत्र दिवस से पहले अल्टीमेटम उमरिया पान बस स्टैंड की मांग प्रमुख, शासन की उदासीनता का आरोप; 26 जनवरी को झंडा चौक विजय स्तंभ के पास आत्मदाह की चेतावनी, प्रशासन से त्वरित पहल की अपील

कलयुग की कलम से राकेश यादव

“बस स्टैंड नहीं तो बलिदान!”—पांच सूत्री मांगों पर अड़े समाजसेवी चंद्रकांत चंदू चौरसिया, गणतंत्र दिवस से पहले अल्टीमेटम उमरिया पान बस स्टैंड की मांग प्रमुख, शासन की उदासीनता का आरोप; 26 जनवरी को झंडा चौक विजय स्तंभ के पास आत्मदाह की चेतावनी, प्रशासन से त्वरित पहल की अपील

कलयुग की कलम उमरिया पान -क्षेत्रीय विकास और नागरिक सुविधाओं को लेकर लंबे समय से संघर्षरत समाजसेवी चंद्रकांत ‘चंदू’ चौरसिया ने पांच सूत्री मांगों को लेकर शासन-प्रशासन के समक्ष कड़ा रुख अपनाया है। श्री चौरसिया का कहना है कि 24 दिसंबर को स्पीड पोस्ट के माध्यम से मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन भेजा गया था, लेकिन 18 जनवरी तक भी मांगों पर कोई ठोस पहल नहीं हुई। इसे सत्ता पक्ष की उदासीनता बताते हुए उन्होंने 26 जनवरी, गणतंत्र दिवस को दोपहर 2 बजे झंडा चौक स्थित विजय स्तंभ के पास आत्मदाह की घोषणा की है। उन्होंने इस संभावित घटना की जिम्मेदारी शासन पर डालते हुए मांगों के शीघ्र निराकरण की अपील की है।

श्री चौरसिया ने स्पष्ट किया कि उनकी पांच सूत्री मांगों में उमरिया पान में सुरक्षित, व्यवस्थित और पूर्ण सुविधायुक्त बस स्टैंड का निर्माण प्रमुख है। उनका आरोप है कि वर्षों से इस महत्वपूर्ण नागरिक सुविधा को लेकर केवल आश्वासन दिए गए, जबकि जमीनी स्तर पर प्रगति नहीं हुई। उन्होंने कहा कि बस स्टैंड की अनुपस्थिति में यात्रियों—विशेषकर महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों—को भारी असुविधा का सामना करना पड़ता है, जो नियम-कानून और जनहित की भावना के विपरीत है।

इतिहास और जमीन का मुद्दा

श्री चौरसिया के अनुसार, स्वर्गीय ताराचंद चौरसिया (पूर्व विधायक) के कार्यकाल में उमरिया पान—तत्कालीन बहोरीबंद विधानसभा—के टोला तिराहा पर लगभग एक एकड़ आठ डिसमिल भूमि बस स्टैंड के लिए चिन्हित की गई थी। समय बीतने के साथ उस भूमि पर अतिक्रमण होता गया और आज स्थिति यह है कि वर्षों बाद भी वहां सुरक्षित बस स्टैंड का निर्माण नहीं हो सका। उनका कहना है कि यदि समय रहते अतिक्रमण हटाकर निर्माण कराया जाता, तो आज क्षेत्र को यह बुनियादी सुविधा मिल चुकी होती।

सुविधाओं का अभाव, केवल शौचालय तक सीमित काम

समाजसेवी ने जनपद और ग्राम पंचायत पर सवाल उठाते हुए कहा कि बस स्टैंड के नाम पर केवल बाथरूम कॉम्प्लेक्स बनाकर औपचारिकता पूरी कर दी गई। यात्रियों के लिए प्रतीक्षालय, पेयजल, बैठने की व्यवस्था, महिला यात्रियों के लिए सुरक्षित स्थान, प्रकाश व्यवस्था और यातायात नियंत्रण जैसी आवश्यक सुविधाएं आज भी नदारद हैं। इससे न केवल यात्रियों को परेशानी होती है, बल्कि सड़क सुरक्षा और यातायात व्यवस्था पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।

प्रस्ताव बना, मंजूरी नहीं—उदासीनता का आरोप

श्री चौरसिया ने बताया कि पूर्व में एसडीएम ढीमरखेड़ा देवकीनंदन द्वारा इस विषय पर आश्वासन दिया गया था और लगभग 34 लाख रुपये का प्रस्ताव तैयार कर शासन को स्वीकृति हेतु भेजे जाने की जानकारी दी गई थी। लेकिन आज तक उस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं मिल सकी। उनके अनुसार, यह देरी शासन की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करती है और जनहित के कार्यों में अनावश्यक विलंब को दर्शाती है।

आंदोलन का लंबा इतिहास

श्री चौरसिया का दावा है कि उन्होंने बस स्टैंड की मांग को लेकर कई बार चक्का जाम, ज्ञापन, धरना-प्रदर्शन के माध्यम से शासन-प्रशासन का ध्यान आकृष्ट कराया। बावजूद इसके, समस्या जस की तस बनी हुई है। वे कहते हैं कि “यदि विकास के लिए आवाज उठाने पर भी समाधान न मिले, तो यह पूरे तंत्र के लिए शर्मिंदगी का विषय है।”

राजनीतिक निरपेक्षता का दावा

समाजसेवी ने यह भी स्पष्ट किया कि वे किसी राजनीतिक दल से जुड़े नहीं हैं। “मैं केवल नगर और ग्रामीण क्षेत्र के विकास के लिए आवाज उठा रहा हूं। जब तक सफलता नहीं मिलेगी, संघर्ष जारी रहेगा,” उन्होंने कहा। उनका यह भी दावा है कि इस आंदोलन में ग्रामीणों का भरपूर समर्थन उन्हें प्राप्त है।

26 जनवरी का प्रतीकात्मक चयन

जब संवाददाता ने उनसे गणतंत्र दिवस का दिन चुनने का कारण पूछा, तो श्री चौरसिया ने कहा, “गणतंत्र दिवस का अर्थ गणराज्य का जमीन पर उतरना है। गणराज्य कागजों तक सीमित न रहे—इसी संदेश के लिए मैंने 26 जनवरी चुनी है।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पूर्व में जनप्रतिनिधियों द्वारा बस स्टैंड का डिज़ाइन दिखाकर केवल फ्लेक्स तक सीमित घोषणाएं की गईं, परंतु धरातल पर कुछ नहीं हुआ।

जनहित और कानून के दायरे में समाधान की मांग

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि बस स्टैंड जैसी बुनियादी सुविधा से न केवल यात्री सुविधा बढ़ेगी, बल्कि यातायात अनुशासन, सड़क सुरक्षा और स्थानीय व्यापार को भी लाभ होगा। नियम-कानून के अनुसार बस स्टैंड का निर्माण होने से अव्यवस्थित पार्किंग, सड़क पर बसों के ठहराव और दुर्घटनाओं की आशंका कम होगी।

प्रशासन से अपील

इस बीच, जिम्मेदार नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने प्रशासन से अपील की है कि स्थिति की गंभीरता को समझते हुए तत्काल संवाद स्थापित किया जाए और कानून के दायरे में समाधान निकाला जाए, ताकि किसी भी अप्रिय घटना को रोका जा सके। लोगों का मानना है कि मांगें जनहित से जुड़ी हैं और समयबद्ध कार्रवाई से विश्वास बहाल हो सकता है।

उमरिया पान में बस स्टैंड की मांग वर्षों पुरानी है। अब यह मामला सामाजिक चेतावनी और प्रशासनिक जवाबदेही के मोड़ पर आ खड़ा हुआ है। शासन-प्रशासन के लिए यह अवसर है कि वह संवेदनशीलता और तत्परता दिखाते हुए समस्या का स्थायी समाधान करे—ताकि गणतंत्र दिवस वास्तव में जनता की सुविधा और अधिकारों का उत्सव बन सके।

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