गोबर से हरित क्रांति: “हरित होली” ने संतकुमारी को बनाया आत्मनिर्भर ‘लखपति दीदी’
कलयुग की कलम से राकेश यादव

गोबर से हरित क्रांति: “हरित होली” ने संतकुमारी को बनाया आत्मनिर्भर ‘लखपति दीदी’
कटनी। ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में चल रहे प्रयासों ने एक और प्रेरक कहानी को जन्म दिया है। कटनी जिले के ग्राम मतवारी (ग्राम पंचायत देवरीटोला) की संतकुमारी विश्वकर्मा ने संघर्षों से उभरकर आत्मनिर्भरता की मिसाल कायम की है। आज वे न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए “हरित होली” अभियान से भी जुड़ी हैं।
संघर्ष से सफलता तक का सफर
समूह से जुड़ने से पहले संतकुमारी की मासिक आय मात्र 6–6.5 हजार रुपये थी। सीमित संसाधनों के कारण खेती से पर्याप्त उत्पादन नहीं हो पाता था और आकस्मिक जरूरतों के लिए साहूकारों से ऊँचे ब्याज पर ऋण लेना पड़ता था।
परिस्थितियाँ तब बदलीं जब उन्होंने 13 महिलाओं के साथ मिलकर “जय स्व-सहायता समूह” का गठन किया और इसकी अध्यक्ष बनीं। समूह ने प्रति सप्ताह 10 रुपये की बचत से शुरुआत की।
प्रथम सीसीएल से 30 हजार रुपये प्राप्त कर कृषि यंत्र खरीदे गए कृषि प्रशिक्षण से उन्नत तकनीकों को अपनाया गया द्वितीय बैंक लिंकेज से 40 हजार रुपये प्राप्त कर संसाधन बढ़ाए गए इन प्रयासों से खेती का उत्पादन बढ़ा और आज संतकुमारी की मासिक आय 14 से 20 हजार रुपये तक पहुँच गई है।
“हरित होली” की अनोखी पहल
आगामी होली पर्व को ध्यान में रखते हुए संतकुमारी और उनका समूह गोबर से पर्यावरण अनुकूल उत्पाद तैयार कर रहा है, जिनमें शामिल हैं:
उपले पूजा माला गुलरी अन्य पूजन सामग्री ये उत्पाद प्राकृतिक, प्रदूषण-रहित और परंपरागत संस्कृति से जुड़े हैं। इनका विक्रय जनपद, जिला और राज्य स्तर के मेलों में किया जाएगा, जिससे आय में वृद्धि के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी फैल रहा है।
संतकुमारी कहती हैं,
“त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि समाज और प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी निभाने का अवसर भी है।”
बनीं प्रेरणा का स्रोत
संतकुमारी की सफलता से प्रेरित होकर गाँव की अन्य महिलाएँ भी स्वयं सहायता समूहों से जुड़ रही हैं। मिशन का उद्देश्य महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना और निर्णय लेने में सक्षम करना है। संतकुमारी और उनका समूह इस लक्ष्य की जीवंत मिसाल बन चुके हैं।
सामूहिक शक्ति से बदलती तस्वीर
यह कहानी बताती है कि सही मार्गदर्शन, सामूहिक प्रयास और आत्मविश्वास से ग्रामीण महिलाएँ न केवल अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सकती हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषयों में भी अग्रणी भूमिका निभा सकती हैं।
“जय स्व-सहायता समूह” की यह पहल दर्शाती है कि संगठित महिला शक्ति विकास की नई इबारत लिख रही है—जहाँ हरित उत्सव भी है और बढ़ती आमदनी भी।



