मध्यप्रदेश

आबकारी विभाग के भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की जरूरत, भ्रष्टाचार का सरकारी निगरानी का तंत्र काफी लचर, यही वजह है कि बड़ी मछलियां निकलती हैं बच निकल कार्रवाई नजीर बननी चाहिए

कलयुग की कलम से रामेश्वर त्रिपाठी की रिपोर्ट

संपादकीय- मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि जब भी कोई घोटाला फूटता है करोड़ों-अरबों की गफलत सामने आती है। सिस्टम में इतने छेद हैं कि जनता की जेब से निकाला गया पैसा विकास पर खर्च होना तो दूर वह कब इधर-उधर कर दिया जाता है, पता ही नहीं चलता। जांच एजेंसी तब जागती हैं, जब पानी सिर से ऊपर चला जाता है। इसकी एक दुर्भाग्यपूर्ण बानगी प्रदेश का आबकारी घोटाला है, जिस पर पिछले दिनों कार्रवाई शुरू की गई। 2015 से गड़बड़ियां जारी थीं, लेकिन विभाग सोता रहा। अब प्रवर्तन निदेशालय ईडी ने छापेमारी की तो पता चला कि दोहरे तरीके से कई सालों तक सरकारी खजाने को चूना लगाया जा रहा था। विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगी। आबकारी से शराब लेने के एवज में जो चालान बैंक में जमा किए गए, वह काफी कम रकम वाले होते थे और उसी चालान में शून्य बढ़ाकर आबकारी विभाग से ज्यादा की शराब उठा लाते। इसे आबकारी विभाग का अंधेर नगरी चौपट राजा वाली कार्य प्रणाली नहीं तो और क्या कहा जाए? हैरानी की बात है कि अफसरों के नजरों के सामने सत्तर-पचहत्तर करोड़ का हेरफेर हो जाता है और वे मौन साधे शराब बेचकर सरकारी की आय बढ़ाने की दुहाई देते रहे। इस मिलीभगत में जिन अधिकारियों पहचान हुई उन पर इतनी सख्त कार्रवाई हो कि वह नजीर बन जाए। और जिन्हें बचाने का प्रयास किया जा रहा हो, वहां शिकंजा कसा जाए। उनसे गड़बड़ी की राशि भी वसूल की जाए। फिलहाल सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार को रोकने का सरकारी निगरानी तंत्र बिलकुल ही लचर है। इसके चलते ही सब कुछ आंखों के सामने घटित होता रहता है, लेकिन वे अनजान होने का ढोंग करते रहते हैं। मामले में लीपापोती की सारी कोशिशें नाकाम हो जाती है तब छोटी-मोटी कार्रवाई कर इतिश्री कर ली जाती है। ऐसी ढेरों आर्थिक अनियमितता और भ्रष्टाचार के मामले हैं, जिनमें कार्रवाई में कोताही सामने आ चुकी है। इंदौर नगर निगम में महाघोटाले में अब तक पता नहीं चला सका कि बड़ी मछलियां कौन थीं और सिस्टम उन पर कार्रवाई की हिम्मत भी नहीं दिखा पाया। जांच के नाम दरअसल छलनी में दूध दुहने जैसा उपक्रम हो रहा है। एक्शन के नाम पर कार्रवाई चलती रहती है। वह सख्ती कभी किसी गलत करने वालों के लिए नजीर नहीं बन पाती, ताकि दूसरा कोई आर्थिक अनियमितता करने से पहले हजार बार सोचे। इसके लिए दृढ़ता चाहिए होगी।

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