शोर बनाम संवेदना आमने-सामने विधायक निवास के सामने सियासी टकराव: सवालों की घंटी, जवाब में डीजे और नारे
कलयुग की कलम से राकेश यादव

शोर बनाम संवेदना आमने-सामने विधायक निवास के सामने सियासी टकराव: सवालों की घंटी, जवाब में डीजे और नारे
कलयुग की कलम कटनी -विधायक निवास के सामने सोमवार को जो दृश्य सामने आया, वह महज एक राजनीतिक विरोध या शक्ति प्रदर्शन नहीं था, बल्कि लोकतंत्र की संवेदनशीलता और संवैधानिक मूल्यों पर उठता गंभीर प्रश्न भी था। इंदौर में दूषित पानी से 15 से अधिक लोगों की मौत जैसे गंभीर और दर्दनाक मामले को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने विधायक निवास के सामने घंटा बजाकर विरोध दर्ज कराया। वहीं, उसी दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा डीजे की तेज धुन पर “जय श्रीराम” के नारे, जश्न और मिठाई वितरण का दृश्य भी सामने आया, जिसने माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया।
लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन कोई अपराध नहीं है। भारत का संविधान अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने का अधिकार देता है। जनहित से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाना विपक्ष का ही नहीं, बल्कि हर जागरूक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब जनता प्रतिनिधियों के दरवाजे तक अपनी पीड़ा लेकर पहुंचे, तो संवाद होना चाहिए या शोर के जरिए उस आवाज को दबाने का प्रयास।
डीजे की तेज आवाज, जश्न और मिठाई वितरण जैसे कदम यह संकेत देते हैं कि गंभीर मानवीय त्रासदी के बीच भी राजनीति संवेदनशीलता से दूर होती जा रही है। दूषित पानी से हुई मौतें किसी एक दल का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की जवाबदेही का विषय हैं। ऐसे मामलों में शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि संवेदना, जवाबदेही और समाधान की अपेक्षा की जाती है।
यदि प्रदर्शन कानून व्यवस्था के दायरे से बाहर था, तो प्रशासन के पास वैधानिक प्रावधान मौजूद हैं। लेकिन यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक मर्यादाओं में था, तो जनप्रतिनिधियों का दायित्व बनता है कि वे आवाज सुनें—भले ही वह विपक्ष की क्यों न हो। राजनीतिक असहमति को शोर से दबाना न तो संवैधानिक भावना के अनुरूप है और न ही लोकतांत्रिक परंपराओं के।
विडंबना यह है कि जिन नेताओं ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत आंदोलनों और प्रदर्शनों से की, वही आज ऐसे विरोधों को असहजता की नजर से देखते दिखाई देते हैं। सत्ता का उद्देश्य यदि केवल उत्सव और प्रदर्शन तक सीमित रह जाए और संवेदनशीलता पीछे छूट जाए, तो लोकतंत्र सिर्फ चुनावी औपचारिकता बनकर रह जाता है।जनता का भरोसा शोर, डीजे और नारों से नहीं, बल्कि संकट के समय संवेदनशील व्यवहार और जवाबदेही से बनता है। लोकतंत्र की असली कसौटी यही है कि क्या सत्ता जनता की पीड़ा सुनने को तैयार है। यदि नहीं, तो यह भरोसा भी धीरे-धीरे उसी शोर में खो जाता है।



