जैविक खेती बनी आत्मनिर्भरता की राह : ढीमरखेड़ा विकासखंड अंतर्गत ग्राम बांध की सीमांत किसान लीलाबाई कुशवाहा की बदली किस्मत
कलयुग की कलम से राकेश यादव

जैविक खेती बनी आत्मनिर्भरता की राह : ढीमरखेड़ा विकासखंड अंतर्गत ग्राम बांध की सीमांत किसान लीलाबाई कुशवाहा की बदली किस्मत
कलयुग की कलम ढीमरखेड़ा -जिले के ढीमरखेड़ा विकासखंड अंतर्गत ग्राम बांध की रहने वाली सीमांत किसान लीलाबाई कुशवाहा ने जैविक खेती अपनाकर न केवल अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत की, बल्कि टिकाऊ कृषि का सफल उदाहरण भी प्रस्तुत किया है। सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद लीलाबाई ने मेहनत, प्रशिक्षण और नई सोच के बल पर खेती को लाभ का साधन बना दिया।
लीलाबाई के पास कुल 2 एकड़ कृषि भूमि है। पहले वे रासायनिक पद्धति से खेती करती थीं, जिसमें अधिक लागत, घटती उत्पादकता और मिट्टी की उर्वरता कम होने के कारण उन्हें लगातार नुकसान उठाना पड़ रहा था। खेत की मिट्टी कठोर हो चुकी थी और फसलों से अपेक्षित उपज नहीं मिल पा रही थी। रबी में गेहूं व चना तथा खरीफ में धान की खेती के साथ वे घरेलू जरूरत के लिए कुछ सब्जियां उगाती थीं।
वर्ष 2023 में लीलाबाई मानव जीवन विकास समिति से जुड़ीं। संस्था के मार्गदर्शन में उन्हें जैविक एवं प्राकृतिक खेती, कम लागत में उत्पादन और पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धतियों का प्रशिक्षण दिया गया। समिति के सचिव एवं पर्यावरणविद् निर्भय सिंह के अनुसार सब्जियों की व्यवसायिक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 0.25 एकड़ क्षेत्र में बैंगन, टमाटर और मिर्च के पौधे, वर्मी बेड, ड्रम तथा आधुनिक खेती तकनीकों की जानकारी उपलब्ध कराई गई। इसके साथ ही कृषि विभाग से बीज भी प्राप्त हुए।
प्रशिक्षण और संसाधनों का समुचित उपयोग करते हुए लीलाबाई ने जैविक विधि से सब्जी उत्पादन शुरू किया। इसका सकारात्मक परिणाम यह रहा कि उनकी खेती की लागत में उल्लेखनीय कमी आई और मिट्टी की नमी व उर्वरता में भी सुधार हुआ। सब्जी उत्पादन से उन्हें लगभग 30 हजार रुपये की आय हुई, जिसमें से लागत घटाने के बाद 24 हजार 600 रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ।
आर्थिक लाभ के साथ-साथ परिवार को प्रतिदिन ताजी, रसायनमुक्त और पौष्टिक सब्जियां मिलने लगीं, जिससे स्वास्थ्य में भी सुधार देखा गया। आज लीलाबाई की आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर है और वे आत्मनिर्भरता की ओर निरंतर आगे बढ़ रही हैं।लीलाबाई कुशवाहा और उनका परिवार अन्य किसानों से भी जैविक एवं प्राकृतिक खेती अपनाने की अपील कर रहा है, ताकि कम लागत में अधिक लाभ के साथ मिट्टी और स्वास्थ्य दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।



