चौथे स्तंभ की साख पर सवाल: गिरता पत्रकारिता का स्तर और समाज की बदलती धारणा समाज और सत्ता दोनों के मन में पत्रकारिता की साख गिरी रही है।
कलयुग की कलम संपादकीय लेख - राकेश यादव

चौथे स्तंभ की साख पर सवाल: गिरता पत्रकारिता का स्तर और समाज की बदलती धारणा समाज और सत्ता दोनों के मन में पत्रकारिता की साख गिरी रही है।
कलयुग की कलम -लोकतंत्र के चार स्तंभों में पत्रकारिता को वह स्थान प्राप्त है, जिसे समाज का सजग प्रहरी कहा जाता है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ-साथ पत्रकारिता ही वह माध्यम है, जो सत्ता और जनता के बीच सेतु बनकर सच को सामने लाती है। लेकिन आज सबसे बड़ा और गंभीर प्रश्न यह है कि क्या यह चौथा स्तंभ अपनी गरिमा, विश्वसनीयता और नैतिक शक्ति को धीरे-धीरे खोता जा रहा है?
आज के समय में यदि कोई पत्रकार किसी जनप्रतिनिधि से शिष्टाचार भेंट करता है, तो कई बार उसे सम्मान की दृष्टि से नहीं, बल्कि संदेह की नजर से देखा जाता है। जनप्रतिनिधियों के मन में यह आशंका घर कर गई है कि कहीं यह मुलाकात किसी निजी लाभ, विज्ञापन, सुविधा या धन की मांग के उद्देश्य से तो नहीं हो रही। यह स्थिति केवल अपमानजनक ही नहीं, बल्कि पूरी पत्रकार बिरादरी के लिए चिंताजनक भी है। यह सोच बताती है कि समाज और सत्ता दोनों के मन में पत्रकारिता की साख कमजोर हुई है।
यहां यह समझना बेहद आवश्यक है कि ओछी हरकतें कुछ व्यक्तियों द्वारा की जाती हैं, लेकिन बदनामी पूरे पेशे को झेलनी पड़ती है। चंद लोग यदि पत्रकारिता को व्यापार, दलाली या ब्लैकमेलिंग का माध्यम बना लेते हैं, तो उसका दाग उन हजारों ईमानदार पत्रकारों पर भी लग जाता है, जो सीमित संसाधनों में, जोखिम उठाकर और कई बार व्यक्तिगत नुकसान सहकर भी सच सामने लाने का प्रयास करते हैं।
इसी संदर्भ में यह शेर पत्रकारिता की पीड़ा और सच्चाई को बखूबी बयान करता है—
“चंद चेहरों की वजह से आईने बदनाम हो गए,
सच दिखाना जिनका काम था, वही इल्ज़ाम हो गए।”
भारतीय प्रेस परिषद, संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, और पत्रकारिता के स्थापित आचार संहिता स्पष्ट रूप से कहती है कि पत्रकार का दायित्व निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा और जनहित है। किसी भी प्रकार का निजी लाभ, दबाव, प्रलोभन या भय पत्रकारिता की आत्मा के विरुद्ध है। इसके बावजूद जब कुछ लोग इन मूल्यों को ताक पर रखकर व्यक्तिगत स्वार्थ को प्राथमिकता देते हैं, तो पूरे पेशे की छवि धूमिल होती है।
आज जनप्रतिनिधि ही नहीं, बल्कि आम जनता के बीच भी पत्रकार को लेकर धारणा बदली है। पहले पत्रकार को समाज का विश्वसनीय प्रतिनिधि माना जाता था, आज कई जगह उसे शक की नजर से देखा जाता है। यह बदलाव केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक भी है। पत्रकारिता के भीतर आत्ममंथन की आवश्यकता है कि आखिर यह स्थिति क्यों बनी? क्या आर्थिक दबाव, मीडिया का व्यवसायीकरण, टीआरपी और विज्ञापन की दौड़, या फिर नैतिक प्रशिक्षण की कमी इसके लिए जिम्मेदार है?
डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया के दौर में बिना सत्यापन, बिना संतुलन और बिना जिम्मेदारी के खबरें परोसी जा रही हैं। “ब्रेकिंग” की होड़ में तथ्य पीछे छूट जाते हैं। इससे पत्रकारिता की विश्वसनीयता को गहरा आघात पहुंचा है। प्रेस परिषद के दिशा-निर्देश स्पष्ट हैं कि खबर प्रकाशित करने से पहले तथ्यों का सत्यापन अनिवार्य है, लेकिन व्यवहार में इसका पालन कम होता दिख रहा है।
यह भी सच है कि आज पत्रकारों की कार्य परिस्थितियां आसान नहीं हैं। कम वेतन, असुरक्षित नौकरी, राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव, तथा कभी-कभी जान का जोखिम—इन सबके बावजूद ईमानदार पत्रकार अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश उनकी मेहनत और ईमानदारी पर पानी फेर देती हैं कुछ गलत प्रवृत्तियां।
समाधान केवल आलोचना में नहीं, बल्कि सुधार में है। पत्रकार संगठनों को चाहिए कि वे अपने स्तर पर आचार संहिता का सख्ती से पालन कराएं। जो लोग पत्रकारिता की आड़ में गलत गतिविधियों में लिप्त हैं, उन्हें चिन्हित कर सार्वजनिक रूप से अलग किया जाए। इससे समाज को यह संदेश जाएगा कि पत्रकारिता स्वयं अपने घर की सफाई करने में सक्षम है।
जनप्रतिनिधियों और प्रशासन को भी यह समझना होगा कि सभी पत्रकार एक जैसे नहीं होते। शिष्टाचार मुलाकात को संदेह की दृष्टि से देखना भी लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। संवाद और पारदर्शिता से ही स्वस्थ लोकतंत्र मजबूत होता है।
अंततः यह समय आत्मचिंतन का है। चौथा स्तंभ तभी मजबूत रहेगा, जब उसकी नींव नैतिकता, साहस और जनहित पर टिकी होगी। कुछ लोगों की गलतियों के कारण पूरे पेशे को कटघरे में खड़ा करना जितना गलत है, उतना ही गलत उन गलतियों को अनदेखा करना भी है। यदि पत्रकारिता को अपनी खोई हुई साख वापस पानी है, तो उसे फिर से अपने मूल उद्देश्य—सच, न्याय और जनहित—की ओर लौटना होगा। यही लोकतंत्र और समाज दोनों के हित में है।



