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मग़रूर सत्ता ध्वस्त कर चुकी मानवीय संवेदनाओं की सारी सीमायें कब्र में पड़े तानाशाहों की क्रूरताएं भी फीकी पड़ीं

कलयुग की कलम समाचार पत्रिका

मग़रूर सत्ता ध्वस्त कर चुकी मानवीय संवेदनाओं की सारी सीमायें

कब्र में पड़े तानाशाहों की क्रूरताएं भी फीकी पड़ीं

सरकार से ज़्यादा अपना अच्छा बुरा समझता है किसान

फ़िलहाल कार्पोरेट घरानों के आगे नतमस्तक है पंथ प्रधान

“चिड़ियों को मैं बाज बनाऊँ, सवा लाख पे एक लड़ाऊँ, फ़िर गुरू गोविंद कहलाऊँ” वाली परम्परा के वंशज सनातन संस्कृति का ध्वज गतिशील बनाये रखने वाले धरती पुत्र पाँच नदियों की पवित्र धारा से अभिमंत्रित होकर गत 25 दिनों से देश के दिल राजधानी दिल्ली की सड़कों पर सर्द हवाओं और 4 डिग्री तापमान के बीच आज़ादी की दूसरी लड़ाई लड़ने के लिए मोर्चे पर डटे हुए हैं ।

साढ़े छह साल से संविधान की आत्मा को छलनी करने वाले अध्यादेशों की लम्बी फेहरिस्त बनाने वाली, लोकतांत्रिक संस्थाओं को चंद निजी हाथों में बेचकर नेस्तनाबूद करने वाली, धर्म, जाति, पन्थ के नाम पर क़त्लेआम कराने वाली सरकार पहली बार असहाय, मजबूर, दिशाहीन, किंकर्तव्यविमूढ़ दिखाई दे रही है ।

साढ़े छह साल के इतिहास में पहली बार ऐसा मौक़ा आया है जब हिन्दू – मुस्लिम – ईसाई, मन्दिर – मस्जिद – चर्च, अल्पसंख्यक – बहुसंख्यक, अजाक्स – सपाक्स, सवर्ण – दलित आदि के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंककर सत्तासीन होने वाली पार्टी के सामने एक ऐसी क़ौम के धरती पुत्र सीना तानकर आज़ादी का दूसरा आंदोलन कर रहे हैं जिनकी कुर्बानियों का एक लम्बा इतिहास है । जिसे नजरअंदाज करना नामुमकिन है । यही कारण है कि विध्वंसकारी राजनीति के पुरोधाओं को कुछ सूझ ही नहीं रहा है ।

साढ़े छह साल में यह भी पहली बार देखने में आ रहा है कि लोकतंत्र के चारों स्तम्भ धराशायी होते दिखाई दे रहे हैं । सरकार की गोद में बैठकर अंगूठा चूस रहे मीडिया का प्रोपोगंडा दम तोड़ रहा है ।

25 जून 1975 को लागू किये गए आपातकाल से अपनी जान बचाने के लिए गुजरात के अहमदाबाद से भागकर कच्छ ज़िले में नक़ली सरदार बनकर रहने वाले का सामना भी पहली बार धर्म और सत्य के पथ पर चलने, पुरुस्वार्थ पर भरोसा करने वाले गुरुगोविन्द सिंह, भगतसिंह के वंशजी असली सरदारों से पड़ा है ।

यही कारण है कि निजी स्वार्थों की पूर्ति करवाने के बाद कच्छ जिला कलेक्टर प्रदीप शर्मा, गुजरात ए टी एस प्रमुख बंजारा को सलाखों के पीछे भिजवाने वाले विशुद्ध बनिया बुद्धिधारी, ड्रामेबाजी का मास्टरमाइंड मानसिक रूप से बीमार नज़र आ रहा है । तभी तो उसकी नज़र में सड़कों पर दम तोड़ रहे किसानों से ज़्यादा अदानी, अंबानी नामक दो व्यापारी ज़्यादा महत्वपूर्ण दिखाई दे रहे हैं ।

वरना कोई वजह नज़र नहीं आती कि रौलेट एक्ट जैसे काले क़ानून की तर्ज़ पर बनाये गये तीनों किसान क़ानूनों को बिना नागा ख़त्म न कर दिया जाता । मग़र फ़िलहाल तो “पयादे से वज़ीर भया टेढ़ा – टेढ़ा” ही चल रहा है ।

” चूंकि मग़रूर शासक और उसकी दमनकारी सत्ता को हथियारबंद आंदोलन से निहत्थे लोगों का शांतिपूर्ण प्रदर्शन ज़्यादा चुभता है” । इसलिए इस बात की आशंका भी सिर उठाती दिखाई दे रही है कि कहीं मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति द्वय 13 अप्रेल 1919 को दुहराने के तानेबाने नहीं बुन रहे !

 

कटनी से लेखक अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता स्वतंत्र पत्रकार

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