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अस्तित्वहीन सा हो चला है प्रेस ” नई किरण का इंतज़ार

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता स्वतंत्र पत्रकार

 

       अस्तित्वहीन सा हो चला है प्रेस

 

       नई किरण का इंतज़ार

 

16 नवम्बर प्रेस दिवस की औपचारिक बधाई देने में भी क़लमकार की क़लम कांपती नज़र आती है ।

 

खींचो न कमानो को न तलवार निकालो

जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो

 

की उक्ति अपना अस्तित्व खो चुकी है ।आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया अपने मूलभूत उद्देश्यों से भटककर सत्ता की गोद में बैठकर अंगूठा चूस रहे हैं । सोशल मीडिया भी सत्ता की विरुदावली से भरा रहता है ।

 

समाज के अंतिम छोर तक पसरी विसंगतियां मीडिया की आंखों से ओझल हो चुकी है । मीडिया सत्तापक्ष का भोंपू बना हुआ है । यदाकदा सच के क़रीब छपने वाले समाचारों से नेताओं, अधिकारियों, व्यापारियों के गठजोड़ की सेहत कोई फ़र्क नहीं पड़ता । मीडिया सत्तापक्ष का स्थायी विपक्ष होता है लेकिन सत्तापक्ष के हाथों बिक चुके मीडिया घरानों ने कलमकारों की क़लम को कुंद करके रख दिया है ।

 

सआदत हसन मंटो का यह कथन आज की मीडिया पर अक्षरसः लागू होता दिख रहा है कि_ *कोठे की एक तवायफ़ और एक बिका हुआ पत्रकार एक ही श्रेणी में आते हैं लेकिन इनमें तवायफ़ की इज्ज़त ज़्यादा होती है ।

 

 

ज़ुल्म इतना बुरा नहीं है जितनी ख़ामोशी है बोलना सीखो वरना पीढ़ियां गूंगी हो जाएंगी

 

कलमकारों को प्रेस दिवस की हार्दिक बधाई

 

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता स्वतंत्र पत्रकार

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