मध्यप्रदेश

उपचुनाव में जीत का गणित और मनोविज्ञान -भूपेन्द्र गुप्ता (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

कलयुग की कलम

मध्य प्रदेश के 28 सीटों पर हुए उपचुनाव इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं कि इससे सरकार के गिरने या टिके रहने का फैसला होना है। राजनीतिक विश्लेषण की दृष्टि से ये चुनाव अत्यंत विरोधाभासी हो गए हैं क्योंकि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां 28 में से 28 सीटें प्राप्त करने का दावा कर रही हैं। इसलिए इन चुनावों का सूक्ष्म विश्लेषण ही इन दावों की विश्वसनीयता सिद्ध कर सकता है।

इन दावों को समझने के लिये 2018 के आम चुनाव के परिणामों पर नजर डालें तो यह तथ्य है कि इन 28 सीटों में से 27 सीटों पर कांग्रेस का ही कब्जा था। इनमें से कई सीटों को तो कांग्रेस पूर्व से भी जीतती आ रही है।2018 के चुनाव परिणाम यह भी बताते हैं कि इन सीटों पर कांग्रेस को भाजपा के मुकाबले लगभग 4लाख 99 हजार मत ज्यादा मिले थे,जो इन सीटों पर हुए कुल मत प्रतिशत का लगभग 14% था।यानि भाजपा इन सीटों पर पूर्व से ही भारी मतों से पीछे रही है।

इन 28 सीटों में से डबरा करेरा, बमोरी, मुंगावली और सुवासरा कांग्रेस पार्टी ने 2013 में भी जीती थी जबकि जौरा, दिमनी, मेहगांव, ग्वालियर पूर्व, पोहरी अशोकनगर ,सुर्खी, मलहरा, ब्यावरा, मांधाता जैसी 10 सीटें 5000 से कम मतों से हारी थी ।यह वह चुनाव था जिसमें जनता पार्टी ने 165 सीटें जीतकर रिकॉर्ड बनाया था किंतु इन सारी सीटों पर 2018 में लगभग औसतन 25 से 40 हजार वोटों की कांग्रेस ने बढ़त हासिल कर भारतीय जनता पार्टी को सरकार से बेदखल कर दिया ।सवाल उठता है कि 25 से 40 हजार वोटों का यह स्विंग कांग्रेस को क्यों मिला ? जिसके चलते भाजपा को 56सीटें गंवाना पड़ीं थीं। 2018 में जनता भाजपा के 15 साल के शासन से ऊब चुकी थी। झूठी घोषणाएं और थोथे वादों की असलियत जनता के सामने आ चुकी थी। इसलिए उसने एंटी इनकंबेंसी वोट के माध्यम से भाजपा को सत्ता के बाहर का रास्ता दिखाया। 2018 के इस चुनाव में कमलनाथ को ‘पैन मध्य प्रदेश यानि प्रदेश के कोने कोने तक’ पहचान नहीं मिली थी। वे राज्य की राजनीति के लिये नये माने गये थे।फिर भी 2013 में 1लाख 66 हजार 342 मतों से हारी इन सीटों पर 2018 में कांग्रेस ने 4 लाख 99 हजार से अधिक मतों की छलांग लगाई।पंद्रह साल की भाजपा सरकार उखाड़ दी,यही कमलनाथ फैक्टर है।

2020 के उपचुनाव जिन परिस्थितियों में हुये हैं,उसने बिकाऊ और गद्दारी को चुनाव का नरेटिव बना दिया और कमलनाथ के प्रति आम सहानुभूति पैदा हुई।लोगों को लगा कि उन्हें सरकार चलाने का पूरा मौका मिलना चाहिये था।कमलनाथ सरकार की किसान कर्जमाफी,100 रुपये में 100यूनिट बिजली,शुद्ध का युद्ध उन्हें प्रांतव्यापी पहचान देने में सफल रहे।इन परिस्थितियों को देखते हुए भाजपा ने कमलनाथ को झूठा सिद्ध करने की रणनीति पर काम किया जिसे कृषि मंत्री कमल पटेल के विधानसभा उत्तर ने ‘सेल्फ गोल’ में बदल दिया।भाजपा ने तब तय किया कि कमल पटेल की स्वीकारोक्ति के बावजूद भी लगातार कहा जाये कि कर्ज माफ नहीं हुआ ,इसमें भाजपा को बार बार डिफेंसिव होना पड़ा अंततः ’10दिन में किया क्या?’ कहकर उन्हें आत्मसमर्पण करना पड़ा।

2020 में 2018 के मुकाबले भाजपा के उम्मीदवारों को गद्दार की जनधारणा ने कमजोर कर दिया था और कमलनाथ की ‘मैने क्या गुनाह किया’ की भावुक अपील ने सहानुभूति लहर पैदा कर दी।जगह-जगह वे भाजपा से अधिक भीड़ को आकर्षित कर सके।कांग्रेस की ‘लैस बिजिबिलिटि-मोर कान्टेक्ट’ की रणनीति सफल दिखी।

भाजपा की कमलनाथ को शब्दों में घेरने की नीति ने जैसे ही गति पकड़ी वैसे ही राहुल लोधी के पार्टी बदलवाने से ‘बिकाऊ-टिकाऊ’ का नरेटिव फिर से मुख्य मुद्दा बन गया यही भाजपा के प्रचार के लिये आत्मघाती सिद्ध हुआ जनता को लगा कि अब तो हद ही हो गई।मतदाता अधिकाधिक वोट डालने बाहर निकले।भाजपा का कथित अनुशासन भीतरघातियों को डराने में पूरी तरह असफल हुआ और कांग्रेस ने एकजुट होकर चुनाव लड़ा। यही कारण है कि 2020 के उपचुनावों के परिणाम चौंका भी सकते है और आश्चर्य नहीं कि कांग्रेस पूरी 28सीटें जीत जाये,क्योंकि 27 सीटें तो वह पहले से ही जीती हुई है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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