मध्यप्रदेश

शेर तो शिकार करेगा ही पत्रकार भांड माफ़िक़ राजनीतिज्ञों की नज़र

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता, स्वत्रंत पत्रकार

अभिव्यक्ति की व्याख्या नफे नुकसान को देखकर

लोकतंत्र के सभी स्तम्भों को किया जा रहा महत्वहीन

लोकतंत्र के स्तम्भों को गुंडातन्त्र में तब्दील करना ही हिन्दू राष्ट्रवाद बनकर रह गया है

पत्रकारितासदैव खतरे में रहती है

शेर का खुले में शिकार करते वक्त ये हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि अगर शेर को आप नहीं मार पाए तो शेर आपको मारेगा ही मारेगा । आपके लिए ये खेल हो सकता है शेर के लिए कोई खेल नहीं है । उसकी नजर में आप एक खुराक से ज़्यादा कुछ नहीं हो ।

राजनीतिज्ञों की नज़र में चैनल चलाने और उसके मालिक पत्रकार की हैसियत भांड से ज़्यादा नहीं होती क्योंकि इनके ये पलते ही राजनीतिज्ञों के टुकड़ों पर ही हैं । जिसके फेवर की सरकार आई वो नशे में चूर होकर हवा में उड़कर विपक्ष को ठेंगे पर रखने लगता है । जबकि नेता नेता होता है । आज तुम्हारी सरकार तो कल दूसरे की सरकार । इसीलिए जब कोई नेता किसी पत्रकार का शिकार करता है तो दूसरा नेता टांग नहीं अड़ाता ।

पत्रकारिता ने इतने दुर्दिन शायद ही कभी देखे होंगे । अभिव्यक्ति की आज़ादी की व्याख्या सत्तापक्ष अपने नफे नुकसान को देखकर की जाती है । सत्तापक्ष हमेशा से अपने पक्ष में की गई चाटूकारिता को ही लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के लिए अभिव्यक्ति की आजादी का पक्षधर रहा है । सत्तापक्ष की नज़र में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ की अभिव्यक्ति की आज़ादी तभी खतरे में दिखाई देती है जब उसके चाटुकार मीडिया घरानों पर कोई दूसरी पार्टी की सरकार नकेल कसने का काम करती है ।

ऐसा ही कुछ 2014 के बाद से सत्तापक्ष की गोदी में बैठकर अंगूठा चूसने वाले मीडिया घरानों द्वारा देशभर में विभिन्न समुदायों के बीच विभिन्न संवेदनशील मुद्दों को हवा देकर नफ़रत का बाज़ार तैयार किया गया । इसी गोदी मीडिया के हम्माम में गोता लगा रहे नगों में से एक नाम अर्नब गोस्वामी का सामने आया है । जिसने पत्रकारिता के नाम पर सत्तापक्ष की चाटूकारिता में बहुतों को पीछे छोड़कर अब्बल नम्बर हासिल कर लिया था ।

महाराष्ट्र में कभी भाजपा की सहयोगी रही शिवसेना ने अपने ऊपर किये जा रहे हमलों से निपटने के लिए एक न्यूज चैनल चला रहे अर्नब गोस्वामी पर नकेल क्या कस दी भाजपा को अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ख़तरे में दिखाई देने लगा ।

पिछले6 सालों से लोकतंत्र के चारों स्तम्भों को महत्वहीन बनाने का जो नंगा नाच किया जा रहा है आख़िर वो क्या है । सरकार की कथनी और करनी को देश के सामने परोसने वाले पनसारे, दाभोलकर, कलबुर्गी, गौरी लंकेश, देवजी महेश्वरी जैसे तमाम लोगों को या तो मौत के घाट उतार दिया गया या फिऱ सलाखों के पीछे डाल दिया गया ।

क्या स्वतंत्र लिखने – बोलने वालों के लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं है । सवाल पैदा होता है अगर अर्नव की गिरफ्तारी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला है तो उन तमाम स्वतन्त्र लेखक, पत्रकार, कवि, सामाजिक कार्यकर्ता जो जेल में बंद हैं तो उनके लिए फिर क्या है ? आख़िर ऐसे लोगों के लिए चाय के प्याले में तूफान क्यों नहीं उठता ?

लगताहै सत्ताधारियों ने अपराधी, गुंडे, मवाली की तरह चैनल पर बैठकर ओछी हरक़त, असभ्य भाषा का इस्तेमाल करना ही पत्रकार का मापदंड तय किया हुआ है । बिना सबूत, गवाह किसी भी व्यक्ति विशेष को चिल्ला चिल्लाकर गुनहगार

साबित करने का हक ऐसे पत्रकारों को किसने दिया है । क्या ऐसे पत्रकार ख़ुद ही कोर्ट हैं । ये जो कहेंगे देशवासी उसे ही सच मान लेंगे क्या ?

लगता है पिछले कुछ सालों से सत्ता सिंघासन पर कब्ज़ा कर चुकी राजनीतिक पार्टियों के लिए लोकतंत्र, लोकतंत्र के स्तम्भों को गुंडातन्त्र में तब्दील करना ही हिन्दू राष्ट्रवाद बनकर रह गया है ।

जिस अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी पर पार्टी विशेष अपनी छाती पीट रही है उसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि उसने पत्रकारिता धर्म का पालन करते हुए कभी भी देश में बढ़ती हुई बेरोजगारी, मंहगाई, स्वास्थ्य सुविधा जैसे सरकार को घेरने वाले मुद्दे नहीं उठाए । अर्नब ने छात्रों की समस्या, व्यापमं घोटाला, नर्मदा किनारे डूब प्रभावितों, सुरसा की तरह बढ़ती मंहगाई, गिरती जीडीपी पर कभी भी डिबेट्स का प्राइम टाइम नहीं किया । अर्नब तुलसीदास गोस्वामी हमेशा गोएबल्स की भूमिका में ही दिखाई देता रहा है ।

यू पी हो बिहार, झारखंड हो या छत्तीसगढ़ या फिर अन्य प्रदेश सरकार की पोल खोलने पर पत्रकारों को अक्सर जेल में डाला जाता है । कोई भी पार्टी सत्ता में आये पत्रकारिता हमेशा ख़तरे में रहती है ।

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता,स्वत्रंत पत्रकार

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