राष्ट्रीय

जो मंजिल बिछड़ गई, उसे फिर से पाना है…..

रिया शुक्ला दिल्ली

जो मंजिल बिछड़ गई, उसे फिर से पाना है…..

जो हौसले टूट गए, उन्हें फिर से लाना है,

अबसारस की तरह, ऊंचा उड़ दिखाना है।

राहों के कांटो पर, अब चलकर दिखाना है,

जो मंजिल बिछड़ गई, उसे फिर से पाना है।।

ये तो जीवन है, यहां सब का यही फसाना है,

कुछ नया मिलना है, तो कुछ खो जाना है।

अभी अंधेरा हुआ है, तो कल सूरज फिर से आना है,

जो मंजिल बिछड़ गई, उसे फिर से पाना है।।

आंखें नम हैं, फिर भी मुस्कुराना है,

अपनी मंजिल के सफर में, फिर से निकल जाना है।

कुछ कर दिखाने का, वक्त बड़ा सुहाना है,

जो मंजिल बिछड़ गई, उसे फिर से पाना है।।

कुछ करने के लिए, अभी हिम्मत और जुटाना है,

पीछे मुड़ जाना, मतलब मंजिल को ठुकराना है।

कठिन राहों पर, अब चलते जाना है,

मंजिल बिछड़ गई, उसे फिर से पाना है।।

दुनिया को अब, अपनी काबिलियत दिखाना है,

अपनेसपनों को, अब हकीकत बनाना है।

अपने आंसुओं को थाम कर, फिर मुस्कुराना है,

जो मंजिल बिछड़ गई, उसे फिर से पाना है।।

रिया शुक्ला कक्षा : दस वीं

दिल्ली

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