मध्यप्रदेश

क्या आड़वाणी के पास है कोई मूलमंत्र

अश्वनी बड़गैयाँ, अधिवक्ता स्वतंत्र पत्रकार

चेले नमकहराम निकले तो गुरु का क्या दोष

राष्ट्रीयजनतांत्रिक गठबंधन की कर दी गई इतिश्री

राजनीती युद्ध का सबसे क्रूरतम रूप

नीतेश का अंतिम, लोजपा अंत हो सकता है बिहार लोकसभा चुनाव

मोदी सरकार विशुद्ध राजनीतिक सरकार

मोदी भाजपा की हालत इंदिरा कांग्रेस जैसी

 

चेले मतलबी, दगाबाज़, नमकहराम निकल जाये तो गुरु का क्या दोष. किसी के माथे पर तो लिखा नहीं होता. ऐसा ही कुछ हुआ गठबंधन राजनीती के जनक लालकृष्ण आड़वाणी के साथ. गुरु गुड़ होकर रह गए चेले शक़्कर हो गए

 

मोदी – शाह की भारतीय जनता पार्टी ने न केवल अटल – आड़वाणी की भारतीय जनता पार्टी रसातल में भेजा बल्कि आड़वाणी द्वारा बनाये गए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की बलि भी चढ़ा दी है

 

लालकृष्ण आड़वाणी की राजनीतिक दूरदर्शिता का ही परिणाम था 1998 में 25 से ज्यादा राजनीतिक पार्टियों से मिलकर पैदा हुआ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए). जिसने देश में गठबंधन राजनीती के सबसे सफल युग की नींव डाली. गठबंधन सरकार में किसी भी एक पार्टी को बहुमत नहीं होने पर भी एक बार नहीं तीन बार सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया है

 

1998 में जहां अटल – आड़वाणी के नेतृत्व वाले एनडीए में जहां 25 से अधिक राजनीतिक पार्टियां शामिल थीं वहीं 2014 में मोदी – शाह के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में 7 साझीदार ही शामिल थे जबकि 2020 में एक ही साझीदार सरकार में शामिल है

 

2014 में बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना, रामविलास पासवान की लोजपा, चंद्र बाबू नायडू की तेलगूदेशम, प्रकाश सिंह बादल की अकाली दल जिन्हें कैबिनेट मंत्री पद से नवाजा गया था अनुप्रिया पटेल की अपना दल, उपेन्द्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक समाजवादी पार्टी, रामदास अठावले की रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) को उनकी हैसियत मुताबिक राज्य मंत्री पद दिया गया था

 

6 साल बाद याने 2020 में राष्ट्रीय राजनीती इतनी बदल गई कि मोदी की 53 सदस्यीय कैबिनेट में एक ही सहयोगी पार्टी को शामिल किया गया है. वह भी राजनीतिक मज़बूरी में क्योंकि उसकी पार्टी के पास कुछ दलित वोट है. इसलिए आरपीआई के रामदास अठावले को उसकी हैसियत मुताबिक समाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण राज्य मंत्री बनाया गया है

 

कहा जा सकता है कि भले ही सरकार एनडीए की कही जा रही हो मगर हकीकत यही नजर आ रही है कि मोदी – शाह की भारतीय जनता पार्टी ने एनडीए को खत्म कर दिया है. आड़वाणी जनित राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की बलि चढ़ा दी गई है

 

कभी गठबंधन राजनीती में अपना वर्चस्व बनाये रखने वालों में जार्ज फर्नांडिस, नितीश कुमार, ममता बैनर्जी, नवीन पटनायक, शरद यादव, मरहूम रामविलास पासवान, सुरेश प्रभु, जी एम् सी बालयोगी, फारुख अब्दुल्ला की पार्टियां आज अपना अस्तित्व बचाये और बनाये रखने के लिए जूझ रही हैं

 

ममता बैनर्जी पश्चिम बंगाल में आरपार की लड़ाई लड़ रही है. उड़ीसा में नवीन पटनायक अकेले अपनी खिचड़ी पका रहे हैं. कश्मीर में फारुख, उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ़्ती अपना अस्तित्व बचाने में लगे हैं. शरद यादव मझधार में फंसे हैं तभी तो उनकी बेटी सुहासिनी ने कांग्रेस ज्वाइन कर ली है

 

राजनीती युद्ध का सबसे क्रूर स्वरूप होता है. इसलिए नीतेश की पार्टी का कार्यकाल अंतिम हो सकता है. बिहार विधानसभा चुनाव में पासवान की वंशवादी पार्टी लोजपा का अंत हो सकता है. जयललिता तथा करुणानिधि की मौत के बाद अन्नाद्रमुक, द्रमुक कमजोर सी पड़ गई दिख रही हैं. दक्षिणी राज्य आंध्रप्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की हालत भी खस्ता ही है

 

पटनायक, रेड्डी, नीतेश यह बहुत अच्छी तरह जानते है कि धीरे धीरे बट वृक्ष बन रही भारतीय जनता पार्टी की नीति और नियत उसे बेदखल करने वाली है फिर भी नीतेश भाजपा से गठबंधन कर विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं

 

नीतेश हों या पटनायक ये अपने घर में शेर हो सकते हैं मगर असली ताकत यानि एजेंसियां, राष्ट्रीय मीडिया, अर्थबल तो सब कुछ केंद्र में बैठी पार्टी के साथ है इसलिए अब उसको आपकी जरूरत नहीं है

 

देशवासियों को बहुत अच्छे से समझ जाना चाहिए कि मोदी – शाह की सरकार अब तक की विशुद्ध राजनीतिक सरकार है न कि लोकतान्त्रिक सरकार. इसीलिये उसमें शर्मिंदगी नाम की कोई चीज नहीं है. उसके आर्थिक निर्णय पूरी तरह से राजनीती प्रेरित हैं. इस युगल को देश के सारे सरकारी संस्थानों को अपने कृपापात्रों को बेचने से कोई परहेज नहीं है जरूरत पड़ी तो युगल देश का भी सौदा करने में संकोच नहीं करेंगे. इन्हें इस बात का भी गुमान है कि मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग का वोट उसकी मुठ्ठी में कैद हैं

 

आज मोदी – शाह के अधीन भारतीय जनता पार्टी की हालत ठीक वैसी ही हो गई है जैसे कभी कांग्रेस पार्टी की हालत श्रीमती इंदिरा गाँधी के अधीन हुआ करती थी

 

वर्तमान अराजक, निरंकुश वातावरण से देश, देशवासियों को निकालने का मूलमंत्र 1998 में देश की राजनीती को बदलने का अभियान छेड़ने वाले आड़वाणी के पास होगा क्या ?

अश्वनी बड़गैयाँ, अधिवक्ता स्वतंत्र पत्रकार

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