छत्तीसगढ़

प्लास्टिक इंसानो के साथ पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा- उपाध्याय 

राजेश सिन्हा कलयुग की कलम राष्ट्रीय समाचार पत्रिका कोरिया

मनेंद्रगढ़ ।-“प्लास्टिक हमारे लिए जानलेवा है ,यह हम भली भांति जानते हैं लेकिन इसका विकल्प हमारे सामने नहीं है इसलिए कुछ विवशता भी है कि मानव, प्लास्टिक को जाने-अनजाने आत्मसात कर रहा है ।यह हैरान करने वाली बात है कि हर साल दुनिया में पांच लाख करोड़ सिंगल यूज़ वाले प्लास्टिक बैग इस्तेमाल किए जाते हैं।-” उक्ताशय के विचार राष्ट्रीय हरित वाहिनी इको क्लब के जिला समन्वयक एवं सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद सतीश उपाध्याय ने व्यक्त किया है। सिंगल यूज प्लास्टिक को इंसान एवं जलीय जीव जंतुओं के लिए सर्वाधिक खतरा बताते हुए श्री उपाध्याय ने कहा- छत्तीसगढ़ सहित देश के विभिन्न राज्यों में दूध की सप्लाई , प्लास्टिक के पाउच में ही आ रहा है इसके इस्तेमाल के बाद उस पॉलिथीन को ठिकाने लगाने का कोई विकल्प अब तक नहीं ढूंढा गया है। कुरकुरे से लेकर बिस्कुट के अंदर के कागज, रेडीमेड वस्त्र से लिपटे पॉलिथीन, हमारे साथ साथ चल रहे हैं जबकि पॉलिथीन बैग इन दोनों और परिष्कृत रूप में सामने आ रहे हैं। इन पॉलिथीन और प्लास्टिक में केमिकल रंग होते हैं जो इंसान के लिए काफी घातक होते हैं। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने ऐसे उत्पादों के उपयोग को खत्म करने के लिए राज्यों को दिशा-निर्देश जारी किए हैं पर इस निर्देश का पालन नहीं किया जा रहा है। केंद्रीय पर्यावरण डिपार्टमेंट ने 50 माइक्रों से पतले प्लास्टिक कैरी बैग पर रोक भी लगाई है। इसके साथ ही पैकेजिंग में प्रयोग होने वाले प्लास्टिक प्लास्टिक के गिलास कांटे वाले चम्मच इस्तेमाल पर रोक लगा दी है, फिर भी यह अभी भी चलन में जारी है । उन्होंने कहा कि भारत को प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए विशेष जागरूकता कार्यक्रम की आवश्यकता है। प्लास्टिक की रीसाइक्लिंग पद्धति के संबंध में श्री उपाध्याय ने कहा कि- हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश ,कश्मीर और पंजाब में पहले से प्लास्टिक कानून बना हुआ है, पर इसमें अमल पूरे तरीके से नहीं हो रहा है ।इको क्लब के माध्यम से दस ,हजार से अधिक स्कूली छात्र छात्राओं को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करने वाले पर्यावरणविद सतीश उपाध्याय पिछले 4 वर्षों से प्लास्टिक से होने वाले खतरों से आगाह कर रहे है,उन्होंने कोरिया जिले के विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं से भी अपील की है कि वे प्लास्टिक से परहेज करें उन्होंने बताया कि प्लास्टिक मवेशियों के लिए गंभीर खतरा बना हुआ है इससे आकस्मिक मौत मवेशियों की होती है। मनुष्य के साथ-साथ मवेशियों के स्वास्थ्य के लिए यह बहुत खतरनाक साबित हो चुका है। प्लास्टिक गायों के पेट में भारी मात्रा में पाई जाती है और मवेशियों की मौत हो रही है। यही पॉलीथिन एवं प्लास्टिक के बोतल नदी तालाबों और समुद्र में पहुंच जाते हैं और जीव जंतु बेमौत मारे जा रहे हैं। हर साल दुनिया में 5 लाख करोड़ सिंगल यूज़ प्लास्टिक बैग का इस्तेमाल अभी भी किया जा रहा है । प्लास्टिक के कचरे के परिणिति नदी तालाब एवं समुद्र में प्रदूषण फैलाने के लिए होती है ।केंद्र सरकार द्वारा पेप्सी और कोकाकोला समेत अन्य कंपनियों से प्लास्टिक के बदले अन्य वैकल्पिक उत्पादों से को प्रयोग करने की बात कही गयी है। केंद्र सरकार का उद्देश्य है कि 2022 तक भारत से प्लास्टिक पूर्ण रूप से प्रतिबंधित हो जाए ।इसमें पर्यावरण मंत्रालय एवं आवासन मंत्रालय की महत्वपूर्ण भूमिका है ।एक आंकड़े की जानकारी देते हुए राष्ट्रीय हरित वाहिनी के जिला समन्वयक सतीश उपाध्याय ने बताया कि पूरी दुनिया में पानी से भरी 10 लाख प्लास्टिक के बोतल खरीदी जाती है हर हफ्ते आम आदमी औसतन 5 ग्राम प्लास्टिक का सेवन जाने-अनजाने कर रहा है। प्रतिवर्ष करोड़ों टन प्लास्टिक समुद्र में जमा होता जा रहा है, परिणाम स्वरुप समुद्र से लेकर जलाशय नदियां तक प्रदूषित हो रहे एवं निर्दोष पशुओं मारे जा रहे हैं। हवा और मिट्टी में भी जहर घुल रहा है। इसलिए समय की मांग है कि प्लास्टिक से निपटने के लिए हम प्रभावी कदम उठाएं स्वयं जागरूक हो और प्लास्टिक का प्रचलन उपयोग बंद करें उन्होंने स्वयंसेवी संगठन से लेकर आम नागरिक से अपील करते हुए कहा कि- जागरूक नागरिक बनकर प्लास्टिक का उपयोग बंद करें उन्होंने बतलाया कि करीब 8 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा महासागरों में फेंक दिया जाता है ।यह प्लास्टिक अपशिष्ट से महानगरों महा सागर और नदियां वि प्रदूषित होती जा रही है एवं जल स्रोतों पर भी इसका गंभीर असर पड़ रहा है। भूमि पर वन्यजीव पेड़ पौधों पर गंभीर संकट छा गया है ।सिंगल यूज प्लास्टिक जिसका उपयोग करके तत्काल फेक किया जाता है, उसे नष्ट होने में लगभग 1000 वर्ष से भी अधिक समय लग जाता है ।आज इसी प्लास्टिक के वजह से भारत की जलवायु उसकी जैव विविधता और भूमि क्षरण जैसे मुद्दे वैश्विक स्तर पर सामने आ रहे हैं ।उन्होंने प्लास्टिक को वैश्विक मुद्दा बताते हुए आम नागरिकों से अपील की है कि वह प्लास्टिक का प्रयोग कम से कम करें एवं विकल्प के रूप में कपड़े, कागज जूट के थैले मिट्टी के बने कुल्हड़ ,गिलास कांच के बर्तन वनस्पतियों के पत्तों से निर्मित होने वाले प्लेट कटोरी दोना पत्तल बायोप्लास्टिक से निर्मित पात्रों का चयन करें। यदि हम इसे अपने दैनिक दिनचर्या में शामिल कर लेंगे और इसके प्रयोग के लिए हम अपनी आदत बना लेंगे कुटीर एवं ग्रामीण उद्योगों को भी प्रोत्साहन मिलेगा और निश्चित रूप से प्लास्टिक के चलन पर भी प्रतिबंध लग सकेगा।

राजेश सिन्हा राष्ट्रीय पत्रिका कलयुग की कलम

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