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कोरोना का हो रहा सौंदर्यीकरण

अश्वनी बड़गैया, अधिवक्ता स्वतंत्र पत्रकार

  मानसिक रूप से नपुंसकता ग्रस्त राजनीतिक दलों के नेताओं तथा मुरदों से भी गये गुजरे लोगों के कारण जिले में तैनात होने वाले कामचोर, हरामखोर अधिकारियों की फौज ने जिले को चारागाह बना रखा है । जिलेभर में जिस तरह से कोरोना महामारी अपने डैनों को फैलाती जा रही है उससे जिले के मुखिया से लेकर किसी भी विभाग के प्रमुखों की पेशानी में बल नहीं पड़ रहा है । जिले का मुखिया मुरदों के लिए श्मशान का सौंदर्यीकरण करने में व्यस्त है । जन चर्चा मुताबिक कमीशनखोरी के चक्कर में !

 

      कोई लेनादेना नहीं

 

इसी कड़ी में विद्युत विभाग भी कहां पीछे रहने वाला है । वैसे तो जिले की जनता रोज़ होने वाली असमय बिजली कटौती, नये कनेक्शन, अनाप शनाप भारी भरकम बिलों को सुधरवाने आदि के लिए बिजली दफ्तर के चक्कर लगाने की आदी हो चुकी है । फ़िर भी कलेक्टर से लेकर विभाग के अधिकारियों, मंत्री से लेकर सन्तरी, राहुल – मोदी की छीछालेदर में व्यस्त मस्त नेताओं औऱ उनके पिछलग्गुओं को जनता की परेशानियों से कोई लेनादेना नहीं है ।

 

        9 घँटे बिजली गुल

 

दिनांक 12 अक्टूबर को दिन में 8 बजे से 3 बजे तक तथा रात में 9.30बजे से 11.15 बजे तक शहर के अधिकांश हिस्सों की बिजली गुल रही मगर मजाल है कि शहर संभाग के मुखिया ने किसी भी माध्यम से बिजली बंद होने, बिजली कब तक आने की संभावना है बताने की जरूरत समझी नहीं न । राजनीतिक मुद्दों पर सड़क पर निकलकर जिंदाबाद मुर्दाबाद करने वालों की भीड़ भी बिजली गुल से हो रही जनता के लिए सड़कों पर नहीं निकली । शायद विधायक से लेकर छुटभैये तक क़ब्र से बाहर निकलने में इसलिए संकोच करते रहे कि अधिकारियों से एक निश्चित परसेंट पर मिलने वाली ऊपरी कमाई जनता के दुखदर्द पर भारी पड़ रही थी ।

 

      साला मैं तो साहिब बन गया

 

बताया जाता है कि सत्ता पार्टी के एक प्रभावशाली नेता का रिश्तेदार आकाओं की सरपरस्ती में बिजली विभाग के शहर संभाग का मुखिया बना है । उसके राजनीतिक वजूद का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जाता कि उसने संभागीय कार्यालय में जनता से दूरी बनाए रखने के लिए पूर्व कमरे को छोड़कर पीछे एकांत में बने कमरे को ऑफ़िस बना लिया है और वहीं दुबककर बैठ गया है । दफ्तर आने वाले उपभोक्ताओं को दरवाज़े से ही चपरासियों द्वारा चलता कर दिया जाता है । जबसे राजनीतिक सरपरस्ती वाले अधिकारी ने चार्ज संभाला है उसने सोशल मीडिया तक से दूरी बना रखी है । साला मैं तो साहब बन गया ।

 

               याद आये

 

आम जनता के बीच इससे पूर्व शहर संभाग के मुखिया के रूप में पदस्थ रहे अभिषेक शुक्ला ने आम उपभोक्ताओं को होने वाली हर तरह की समस्याओं से अवगत होने, उनका निराकरण करने के लिए सोशल मीडिया (व्हाट्सएप, फेसबुक) का जीवंत सहारा लिया था । वर्तमान मुखिया तो लाटसाहबी में इतने मदमस्त हैं कि उन्हें शहर की जनता से कोई लेना देना नहीं है ।

 

       कैसे पहुंचे सिसकियां

 

सूत्र तो यहां तक बताते कि लाटसाहब ने ऊपरी कमाई के लिए बाकायदा विभागीय और बाहरी दलालों को नियुक्त कर रखा है । जिसमें एक नाम संभागीय कार्यालय में पदस्थ प्रोग्रामर का लिया जाता है । कुछ पीड़ितों का कहना है कि प्रोग्रामर द्वारा पैसा नहीं दिए जाने पर बदतमीजी से पेश आया जाता है । चूंकि लाटसाहब कार्यालय के पिछले में कोने में दुबके हुए हैं तो स्वाभाविक है कि पीड़ितों की आवाज़ उन तक नहीं पहुंचेगी ।

 

 

    नींद में ख़लल पड़ेगा क्या

क्या जिले के मुखिया से लेकर विधायक या अन्य स्वयंभू नेताओं की कुम्भकरणी नींद जनता के दुखदर्द के निदान के लिए टूटेगी या जिलेवासी यूं ही मरते खपते रहेंगे ?

 

अश्वनी बड़गैया, अधिवक्ता स्वतंत्र पत्रकार

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