मध्यप्रदेश

इससे तो गब्बर भला

अश्वनी बड़गैया, अधिवक्ता स्वतंत्र पत्रकार

ऐसी फ़क़ीरी को लानत है

नहीं चाहिए ऐसा चौकीदार

नरेन्द्र मोदी पर इल्ज़ाम लगाया जाता है कि वे दस लाख रुपये का सूट, ढाई लाख रुपये का बूट पहनते हैं । डेढ़ लाख रुपये का गॉगल लगाते हैं । तीन लाख रुपये किलो बिकने वाली मशरूम के आटे की रोटी खाते हैं । आठ लाख चार सौ करोड़ रुपये के हवाई जहाज में सफ़र करते हैं

नरेन्द्र मोदी पर यह भी आरोप लगाया जाता है कि वे आसाराम, नित्यानंद, ज्योति गिरी, रामपाल, रामरहीम, दाती महाराज, चिन्मयानंद, नारायण साईं, कुलदीप सेंगर जैसे बलात्कारी, दुष्कर्म के आरोपियों के समर्थन में खड़े दिखते हैं ।

नरेन्द्र मोदी पर आरोप है कि वे रेल – रेल्वे स्टेशन, हवाई अड्डे, पोर्ट, दूरसंचार, सुरक्षा संस्थान, विद्युत संस्थान, बीमा संस्थान, शिक्षा संस्थान आदि का निजीकरण कर रहे हैं ।

नरेन्द्र मोदी दस लाख रुपये का सूट, ढाई लाख रुपये का बूट पहने, डेढ़ लाख रुपये का गॉगल लगाएं, तीन लाख रुपये किलो बिकने वाली मशरूम के आटे की रोटी खाएं, आठ लाख चार सौ करोड़ रुपये के हवाई जहाज में सफ़र करें इसमें किसी कोई एतराज नहीं होना चाहिए क्योंकि हर आदमी को अपने मनमाफ़िक पहनने खाने, घूमने का हक है । मगर ये सब ख़र्चे अपनी ख़ुद की कमाई से किये जायें यह नहीं कि बाप के भरोसे दो दो लुगाई । अगर नरेन्द्र मोदी पर होने वाले ख़र्चों की भरपाई सरकार के ख़ज़ाने से हो रही है तो उन पर लगाये जाने वाले आरोप सही हैं । नरेन्द्र मोदी के ये कृत्य प्रधानमंत्री पद पर विराजमान होने के कारण न केवल आलोचनात्मक हैं बल्कि निंदनीय भी हैं । कारण जिस देश की तीन चौथाई आबादी को एक टाईम भी भरपेट रूखा सूखा भोजन भी नसीब नहीं होता हो, पूरे तन ढ़कने को कपड़े नहीं मिलते हों, आवागमन के साधनों का अभाव हो उस देश के प्रधानमंत्री को ऐशोआराम भरी जिन्दगी जीने का नैतिक अधिकार नहीं है वह भी लोकतांत्रिक देश में ।

नरेन्द्र मोदी आसाराम, नित्यानंद, ज्योति गिरी, रामपाल, रामरहीम, दाती महाराज, चिन्मयानंद, नारायण साईं, कुलदीप सेंगर जैसे बलात्कारी, दुष्कर्म के आरोपियों के समर्थन में खड़े दिखाई देते हैं या खड़े हुए हैं इसमें भी किसी को कोई एतराज नहीं होना चाहिए । यह आदमी की फ़ितरत पर निर्भर करता है कि वह किन लोगों के साथ रहे । बलात्कारी हों या दुष्कर्म के आरोपी यदि इनने दुष्कर्म अपने परिजनों के साथ किया है और उन्हें कोई एतराज नहीं है तो बाकी को भी नहीं होना चाहिए । मगर ऐसा कतई नहीं है । ये वे लोग हैं जिन्हें समाज में सम्मान के साथ देखा जाता था । इनमें कोई धर्मगुरु है तो कोई जननेता । इन्होने अपने परिजनों की नहीं अपने अनुयायियों की मातृशक्ति की इज्ज़त पर डाका डाला है । समाज की आबरू लूटने का अक्षम्य अपराध किया है । ऐसे अपराधियों को तो सार्वजनिक स्थानों पर खड़ा कर फांसी पर लटका दिया जाय तो भी सज़ा कम ही होगी । प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठा हुआ व्यक्ति यदि समाज कलंकियों के साथ उसी कतार में खड़ा दिखाई देता है तो वह भी उसी सजा का हक़दार होना चाहिए जो दुष्कर्मियों को दी जाती है ।

नरेन्द्र मोदी रेल – रेल्वे स्टेशन, हवाई अड्डे, पोर्ट, दूरसंचार, सुरक्षा संस्थान, विद्युत संस्थान, बीमा संस्थान, शिक्षा संस्थान आदि का निजीकरण कर सकते हैं, उन्हें बेच सकते हैं । इसमें किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए बशर्ते ये सारे संस्थान, सम्पत्तियां उनकी ख़ुद की कमाई हों अथवा उनके बाप दादाओं ने कमाई हों । मगर रेल – रेल्वे स्टेशन, हवाई अड्डे, पोर्ट, दूरसंचार, सुरक्षा संस्थान, विद्युत संस्थान, बीमा संस्थान, शिक्षा संस्थान आदि को न तो नरेन्द्र मोदी ने ख़ुद कमाया है और न ही ये उनकी पैतृक संपत्ति है । प्रधानमंत्री होने के नाते नरेन्द्र मोदी को इन संस्थानों, सम्पत्तियों के केयरटेकर की भूमिका निभानी है न कि मालिक की । नरेन्द्र मोदी पर निजीकरण किये जाने का लगाया जा रहा आरोप पूर्णतया सही है । यह गंभीरतम आरोप है और ऐसे आरोपी को किसी भी क़ीमत पर संवैधानिक पद पर बैठने का एक पल के लिए भी हक़ नहीं होना चाहिए । ऐसे आदमी का क्या भरोसा जो आज देश की सम्पत्तियां बेच रहा है कल देश को ही बेच दे !

नरेन्द्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री अनेक अवसरों पर ख़ुद को चौकीदार, फ़क़ीर बताते रहे हैं । सामान्य समझ रखने वाला भी यह समझता है कि चौकीदार माल असबाब का रक्षक होता है न कि भक्षक । ये कैसा चौकीदार है जिसकी चौकीदारी में न मातृशक्ति सुरक्षित है न देश की सम्पत्तियां सुरक्षित हैं न देश की सीमाएं सुरक्षित हैं ।

चलो एक बार यह भी माना कि नरेन्द्र मोदी जनता के ख़ूनपसीने की कमाई से दस लाख रुपये का सूट, ढाई लाख रुपये का बूट पहनने, डेढ़ लाख रुपये का गॉगल लगाने , तीन लाख रुपये किलो बिकने वाली मशरूम के आटे की रोटी खाने, आठ लाख चार सौ करोड़ रुपये के हवाई जहाज में सफ़र करने के बाद भी फ़क़ीर हैं तो होते रहें इसमें देशवासियों को कोई आपत्ति नहीं है । मगर देशवासियों ने उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर विराजित कर यह हक नहीं दिया है कि वे देश को ही फ़क़ीर, कंगाल बना डालें जैसा कि उनके 6 सालों के कार्यकाल में दिखाई दे रहा है ।

जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे

किरायेदारहैं जाती मकान थोड़ी है ।

सभीका खून है शामिल यहां की मिट्टी में

किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है ।

देश को न तो ऐसा चौकीदार चाहिए और न ही ऐसा फ़क़ीर ।

चलते – चलते

नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा किये जा रहे निजीकरण का समर्थन करने वालों से एक सवाल

अगर बच्चा पैदा न हो तो ईलाज कराओगे या (……..) को भाड़े पर दोगे ।

अश्वनी बड़गैया, अधिवक्ता स्वतंत्र पत्रकार

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