मध्यप्रदेश

उपचुनावी परिणाम तय करेंगे मतदाता के वोट की क़ीमत है या नहीं !

कलयुग की कलम कटनी

70 साल बाद भी जनप्रतिनिधि सामन्तशाही ग़ुलाम मानसिकता के शिकार

एक भी दलबदलू पार्टी की रीतिनीति से प्रभावित नहीं

सरकार गिराने की सौदेबाज़ी जगज़ाहिर

मध्यप्रदेश में होने जा रहे विधानसभा उपचुनाव की चौसर बिछ चुकी है । उपचुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए जीवन – मरण का सवाल बन गया है । उपचुनाव में जहाँ कांग्रेस तीन चौथाई से ज़्यादा सीटें जीत कर फ़िर से सत्ता पर काबिज़ होना चाहती है तो वहीं भारतीय जनता पार्टी कांग्रेसी विधायकों को अपने पाले में शामिल कर हथियाई गई सत्ता को बनाये रखना चाहती है ।

उपचुनाव में आम आदमी के जेहन आज भी तरोताज़ा है कि आम चुनाव में जनता द्वारा चुने गए कांग्रेसी विधायकों ने अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए अपनी पार्टी से बग़ावत करने के साथ ही अपने विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं से विश्वासघात करते हुए कमलनाथ सरकार को अपदस्थ कराकर प्रदेश में उपचुनाव लादने का पाप किया है । वहीं सत्ता की भूखी भारतीय जनता पार्टी ने जोड़तोड़ की राजनीति के तहत सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया है ।

राजनीतिकगलियारों में यह आरोप आम चर्चा में है कि भाजपा ने तत्कालीन कांग्रेसी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया की सत्ता लोलुपता को हवा देकर सिंधिया गुट के विधायकों की खरीद फरोख्त की । खरीद फरोख्त में परदे के पीछे प्रति विधायक 35 से 50 करोड़ रुपये का लेनदेन हुआ है ।

यह मान भी लिया जाय कि सत्ता के लिए जल बिन मछली की तरह फड़फड़ा रही भाजपा ने कांग्रेसी विधायकों को नगदी रक़म का भुगतान नहीं किया है । मगर यह बात तो आईने की तरह साफ़ है कि मध्यप्रदेश में कमलनाथ की कांग्रेसी सरकार को अपदस्थ कर भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनवाने के लिए भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच सौदेबाज़ी हुई है ।

भाजपा नेतृत्व और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच हुई सौदेबाज़ी का पहला जीता जागता उदाहरण है भाजपा द्वारा अपने खांटी नेताओं, कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर मध्यप्रदेश से ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा के लिए होने वाले चुनाव में पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी घोषित कर सांसद बनवाना । दूसरा उदाहरण है मध्यप्रदेश की शिवराजी सरकार में विधायक नहीं होने के बाद भी सिंधिया गुट के उन लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल किया जाना जिन्होंने कांग्रेस के चुनाव चिन्ह पर चुनाव जीत कर विधायकी पाई थी और कमलनाथ सरकार को गिराने के लिए पार्टी से बग़ावत कर विधायकी खोई है । तीसरा उदाहरण है भाजपा द्वारा एक बार फ़िर अपने खाँटी नेताओं, कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर कांग्रेस के विश्वासघातियों, दलबदलुओं को भाजपा के चुनाव चिन्ह पर चुनाव मैदान पर उतारना ।

ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा की सांसदी, सिंधिया के सिपहसालारों को विधायकी की सौदेबाजी यह बताने के लिए पर्याप्त है कि सत्ता की भूखी भारतीय जनता पार्टी ने जहां ख़ुद पर लगे पार्टी विथ डिफरेंट के लेबल पर कालिख़ पोती है वहीं उसे अब अपने खाँटी नेताओं, कार्यकर्ताओं पर कोई भरोसा नहीं रहा है । पार्टी अपने खाँटी नेता, कार्यकर्ता को महज़ बंधुआ मजदूर मानकर चलने लगी है ।

कांग्रेसछोड़कर भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने आज तक यह नहीं कहा कि वे भारतीय जनता पार्टी की रीतिनीति, सिद्धान्तों से प्रभावित हैं । सिंधिया ने साफ़तौर पर कहा है कि उसने कांग्रेस पार्टी में हो रही अपनी उपेक्षा से व्यथित होकर भाजपा का दामन थामा है ।

यही बात भाजपा की उम्मीदवारी कर रहे सिंधिया के चाटुकारों द्वारा कही जा रही है । इमरती देवी डबरा, रक्षा सिरौनिया भांडेर, जसमंत जाटव करैरा, सुरेश धाकड़ पोहरी, कमलेश जाटव अंबाह, रणवीर जाटव गोहद, मुन्नालाल गोयल ग्वालियर, प्रद्युम्न सिंह तोमर ग्वालियर, रघुराज सिंह कंसाना मुरैना, जजपाल सिंह अशोकनगर, बृजेन्द्र सिंह यादव मुंगावली, गिर्राज दंडोतिया दिमनी, मनोज चौधरी हाटपिपल्या ये वे लोग हैं जो उपचुनाव में जनता के बीच चर्चित बिकाऊ और टिकाऊ मुद्दे पर भगवान की कसमें खा कर बिकाऊ होने पर सफ़ाई देते फ़िर रहे हैं ।

ज्योतिरादित्य सिंधिया का पल्लू पकड़ कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए एक भी पिछलग्गू ने यह क़भी नहीं कहा कि वे भाजपा संस्कृति से प्रभावित हैं । भाजपा की रीतिनीति को आत्मसात कर भाजपा की सदस्यता ग्रहण की है । सभी का कहना है कि उन्होंने अपने नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए कांग्रेस पार्टी छोड़ी है । आज भी उनके लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया ही एकमात्र नेता हैं । इसका सीधा मतलब है कि इन नेताओं की नज़र में भाजपा हाईकमान की अहमियत दो कौड़ी की भी नहीं है ।

बहुत साफ़ है कि यदि कल को ज्योतिरादित्य सिंधिया को भाजपा में ख़ुद को उपेक्षित होने का अहसास हो जाये तो वह भाजपा को कांग्रेस की ही तरह लात मारकर चल देगा । और जब सिंधिया जायेगा तो पिछलग्गुओं का भाजपा को लात मारकर जाना तो तय है ही ।

मध्यप्रदेश में सामन्ती गुलामों द्वारा जबरिया थोपे गये चुनाव से मतदाता ख़ुद को किंकर्तव्यविमूढ़ ठगा सा महसूस कर रहा है । वह सोच रहा है कि लोकतंत्र के मंदिर में जाकर जनमत का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसद, विधायक आज़ादी के 70 साल बाद भी सामन्तशाही ग़ुलाम मानसिकता से नहीं उबर पाये हैं । यह निश्चित रूप से देश और देशवासियों का दुर्भाग्य ही है ।

उपचुनावी परिणाम से सत्ता में कांग्रेस की वापसी हो या भाजपा काबिज़ रहे कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं है । विधानसभा क्षेत्र के मतदाता उपचुनावी परिणाम में यह तय करेंगे कि मतदाता के वोट की कोई क़ीमत है भी या नहीं ? क्या यूं ही जनता द्वारा चुना हुआ प्रतिनिधि अपनी व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि के लिए दलबदल कर जनमत को अपमानित करते हुए चुनाव लादता रहेगा ?

कटनी लेखक अश्वनी बड़गैया, अधिवक्ता स्वतंत्र पत्रकार

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