मध्यप्रदेश

मामा के राज में न भांजे सुरक्षित न भंजियां न ही बहनें

कलयुग की कलम कटनी

माफियाओं द्वारा चलाई जा रही समानांतर सरकार

पगारजनता से ड्यूटी अपराधियों की

साहूकारोंके पंजे में दम तोड़ रहा मजदूर, किसान

कुर्सी बचाना प्राथमिकता

भोपाल, इंदौर, जबलपुर, कटनी, सतना, पन्ना, नरसिंहपुर, खरगोन, रतलाम, छतरपुर, दमोह, ग्वालियर, रीवा, सीधी गिनते चले जाइये फेहरिस्त लम्बी होती चली जायेगी । ये उस मध्यप्रदेश के जिले हैं जहां का राजा मामा है । और ऐसा वैसा मामा नहीं यह मामा पिछले 17 सालों में बमुश्किल एक साल छोड़कर लगातार एकछत्र राज करता चला आ रहा है ।

आज जब उत्तरप्रदेश के हाथरस जिले में घटित दुष्कर्म के मामले में शासन, प्रशासन की ओछी हरकतों को लेकर पूरे देश में चर्चा हो रही है तो उसी कड़ी में मध्यप्रदेश के मामा राज की भी चर्चा हो रही है ।

जहां उत्तरप्रदेश दुष्कर्म के मामले में तथा बिहार अपहरण फिरौती के मामले में शिखर पर है तो मध्यप्रदेश भी दुष्कर्म, अपहरण, फिरौती, के मामले में उत्तरप्रदेश, बिहार को टक्कर दे रहा है ।

मामा के राज में न भंजियां सुरक्षित हैं न भांजे न बहिनें । प्रदेश भर में महिलाओं, मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म की घटनाएं हो रही हैं । मासूमों का अपहरण किया जा रहा है । फ़िरौती मांगी जा रही है । फ़िरौती लेने के बाद भी ह्त्या की जा रही है । चौतरफ़ा माफियाओं द्वारा समानांतर सरकार चलाई जा रही है । प्रशासनिक अधिकारी, कर्मचारी सरकारी ख़ज़ाने से वेतन लेने के बावजूद माफियाओं की ड्योढ़ी पर मत्था टेकते देखे जा रहे हैं । शिक्षित वर्ग रोज़ी रोटी के अभाव में राजनीतिक दलों का जरखऱीद गुलाम बना जिंदाबाद, मुर्दाबाद करने में मशगूल है । युवा पीढ़ी को नशीलची बनाया जा रहा है । किसान सूदखोरों की गिरफ्त में फंस कर आत्महत्या कर रहा है ।

पुलिस द्वारा पीड़िताओं को थाने से भगा दिया जाता है । खरीदे हुए प्रशासन की मदद से दुष्कर्मियों द्वारा पीड़िता पर राजीनामा करने का दबाव बनाया जाता है । दबाव नहीं झेल पाने की वजह से या तो पीड़िता द्वारा खुदकुशी कर ली जाती है या फिर पीड़िता को मौत के घाट उतार दिया जाता है ।

यह साबित करने के लिए हंड़िया के चावल की भांति नरसिंहपुर, कटनी, दमोह, पन्ना, रतलाम, आदि जिले में दलित वर्ग की स्त्री जाति के साथ घटित दुष्कर्म जनित हत्या की वारदातें काफ़ी है । गत दिनों नरसिंहपुर में एक दलित महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता है । पीड़िता द्वारा 4 दिन तक लगातार पुलिस थाने की चौखट पर माथा टेक कर आरजू विनय की जाती है मगर पुलिस द्वारा एफआईआर नहीं लिखी जाती । पुलिस द्वारा पीड़िता को मानसिक रूप से इतना टार्चर किया जाता है कि आखिरकार पीड़िता आत्महत्या कर लेती है ।

कटनी जिले में महिला के साथ बलात्कार किया जाता है । दुष्कर्मी जेल से जमानत पर छूटने के बाद पीड़िता पर राजीनामा करने का दबाव बनाता है । पीड़िता अपनी लूटी गई आबरू के लिए राजीनामा करने को राजी नहीं होती । दुष्कर्मी द्वारा महिला को मौत के घाट उतार दिया जाता है । उसके पति पर भी प्राणघातक हमला किया जाता है । पति आज भी अस्पताल में जीवन औऱ मौत से संघर्ष कर रहा है ।

सतना जिला पूरे प्रदेश में अपहरण और फिरौती के मामले में शिखर पर बना हुआ है । मामा के राज में हजारों भंजियां की आबरू लूटी जा चुकी है । सैकड़ों भांजों का अपहरण फ़िरौती के लिए किया जा चुका है । अकेले सतना जिले में ही आधा सैकड़ा से ज़्यादा अपहरण किये जा चुके हैं । जिसमें से दसियों परिवारों को तो फ़िरौती देने के बाद भी अपने कलेजे के टुकड़े की मृत देह ही हाथ लगी है ।

प्रदेश के तीन चौथाई से ज़्यादा जिले अतिक्रमण के मकड़जाल में जकड़े हुए हैं । अतिक्रमण के दुष्परिणाम यातायात को अराजक बनाये हुए है । सड़के गलियों में, गलियां कुलियों में सिकुड़ चुकी हैं । अतिक्रमणकारियों को राजनीतिक दलों का वरदहस्त मिला हुआ है ।

राजनीतिक संरक्षण में माफियाओं द्वारा समानांतर सरकार चलाई जा रही है । समाजविरोधी कामों में सारे दलों के नेताओं की सग्गामित्ति लाजवाब है । सभी एक ही रास्ते से मल विसर्जित कर रहे हैं ।

सबसे ज़्यादा दयनीय हालत मजदूर और किसान की है जो कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है । जहां मजदूर वर्ग दबंग साहूकारों के पंजे में फंसा हुआ अपने ख़ूनपसीने की कमाई साहूकार को सुरसा के मुंह की तरह फैल रहे ब्याज की भरपाई करने में दे रहा है वहीं किसान स्थानीय साहूकारों के साथ ही बैंक का कर्जदार बना हुआ कर्ज न अदा करने की स्थिति में आत्महत्या करने के लिए मजबूर है । ऐसा नहीं है कि मामा की सरकार इससे अनजान है मगर वैधव्य को प्राप्त हो रही बहनों, अनाथ हो रहे भांजे भांजियों की दयनीय हालत से मामा की सेहत पर कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा है ।

फ़िलहाल तो मामा की प्राथमिकता जनमत के हत्यारों की मदद से हथियाई गई कुर्सी को बचाये रखने की है और उसके लिए घोषित हो चुके उपचुनाव की वैतरणी पार करने की है ।

अश्वनी बड़गैया, अधिवक्तास्व तंत्र पत्रकार कटनी

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