मध्यप्रदेश

दास्तान – ए – आदिवासी विभाग

मनोज शर्मा वरिष्ठ पत्रकार रतलाम

आदिवासी विभाग के ऑफिस में से “सवा फुटीये” “कॉच” की आखिरकार “बला” टली…….. “बला” टली……….

“तोकूचन्द” के चेहरे से “नूर” उतरा

रतलाम । पुराने बाजना बस स्टेण्ड से महज एक किलोमीटर दूर बाजना रोड के बाजू में आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति कल्याण विभाग के सहायक आयुक्त R.S. परिहार के ऑफिस में जो आज तक नहीं हुआ था वो परिहार के कार्यकाल में नजर आया परिहार साहब अपनी बादशाहतगिरी के दम,खम, के बल पर ” कैमरे की तीसरी नजर पर जितना विश्वास नहीं रखते थे उससे कई गुणा अपने छोटे से “सवा फूटिये कॉच” से वो न जाने कौन सा उनके मन में खुटका भरा था कि “ठेठ सड़क तक “झडी” भरने वाले मास्टर माइंड का तबादला शिवपुरी हो जाने से उनके इक्के-दुक्के चट्टे-बट्टे “तोकूचंद” के चेहरे से नूर उतर गया फिर हर बार की तरह नये अफसर आयेगे फिर उनसे गणित ज्ञान बिठाने का टेंशन अलग भरा गया ।

दूसरी और सिर्फ-सिर्फ एक मात्र अफसर R.S. परिहार तो दूसरी तरफ कर्मचारी संगठन ने भी जब तक चैन की सॉस नी ली तब तक ट्रांसफर नहीं हुआ आखिरकार पलड़ा कर्मचारी संगठन का भारी पड़ा और जैसे ही बाबू मोशय परिहार साहब की रवानगी की खबर लगी तो कर्मचारी संगठन में चहुॅ और खुशी की लहर………खुशी की लहर……….

इस तरह तुगलकी अफसर शाही के हर अति के अंत की इतिश्री अध्याय की पूर्णाहुति हुई । इसलिये किसी ने सच ही कहॉ कि “घमंड और “हमपना” भी इतना करो कि धक जाय जब रावणश्री की लंका नी री तो कौन ॽ किस खेत की गाजर मूली है ।

बहुतपुरानी कहावत चार पैसे क्या मिले , भई क्या मिले , खुद को समझ बैठे खुदा काहे चार पैसे पर इतना गुरुर करे हैं । यही पैसा तो अपनों से दूर करें है । यही पैसा तो अपनों से दूर करें है

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