मध्यप्रदेश

दमोह के वनवासियों के सामने आया बड़ा संकट ।

वर्षों से काबिज़ वनवासियों कोसरकार कर रही है बेदख़ल ।

बेदख़ल हुए तो परिवार सहित कर लेंगे आत्मदाह।

2003 में कटी  कब्जे की अर्थदण्ड रशीद वन अधिकार कानून लागू 2008 में ,फिर भी नया कब्जाधारी बताकर हटाया जा रहा ।

 

निचले स्तर के कर्मचारियों की गलती का खामियाजा भुगत रहे है वनवासी।

वन भूमि पर दावा फॉर्म करने के बाद भी नहीं दिया अधिकार पत्र ।

दमोह – मध्यप्रदेश की कई सीटों पर आगामी दिनों में उप चुनाव होना है जहाँ शिवराज सरकार की साख डॉ पर लगी है तो कांग्रेस भी मौके की तलाश में है ऐसे नाजुक वक़्त में दमोह जिले के तेन्दूखेड़ा ब्लाक के बमनोदा खदरीहार गाँव के वनवासियों के सामने अब अपनी ही जमीन से बेदख़ली का एक बड़ा संकट आ खड़ा है जिला प्रशासन उन्हें वहाँ से बेदख़ल करना चाहती है , वर्षो से जंगल की वन भूमि पर काबिज आदिवासी वनवासी किसान सरकार की कथनी और करनी से इस क़दर आहत हो गए है कि एक दर्जन आदिवासी परिवार अब अपनी ही जमीन से बेदखल होने के बाद आत्मदाह की बात कर रहा है

 जंगलों में अपने परिवारों के साथ इन घास पूस की झोपड़ियों में रहने वाले और वर्षों से इसी जमीन पर खेती किसानी करके अपना और अपने बच्चों का पेट पालने वाले आदिवासी आज बेहद परेशान है क्योंकि जिले के तेन्दूखेड़ा ब्लाक के  बमनोदा ग्राम पंचायत सचिव द्वारा यहाँ निवास करने वाले

सभीवनवासियों के दावा फार्म अमान्य कर दिये गए और सभी  को नया कब्जा धारी घोषित कर यहाँ से बेदखल करने के आदेश वन विभाग द्वारा दिया गया है । जबकि ये सभी आदिवासी  समुदाय के लोग यहाँ 1993 से काबिज़ है जिनको कब्जा का 2003 में अर्थदण्ड भी मिला है ,जिसकी बाकायदा रशीद कटी है । और शासन ने वन अधिकार कानून लागू किया 2008 में ,फिर भी  एक दर्जन परिवारों को नया कब्जाधारी बताकर उनकी  खड़ी फसलों  को नष्ट  और तबाह करके यहां से चले जा को कहा जा रहा है । वनवासी आदिवासी,  वन भूमि दावा फार्म अमान्य होने के साथ ही भूमि कब्जा सत्यापन  ना होने से अब इन  सबके सामने एक बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने बेदखली पर रोक लगा रखी है मामला कोर्ट में लंबित है। इन लोगों का कहना है कि अगर हम लोगों को यहां से हटाया गया तो हम हटने से पहले ही परिवार सहित आत्मदाह कर लेंगें । अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी वन अधिकारोंकी मान्यता अधिनियम 2006 , 2007 और 2008 संशोधित नियम 2012 के तहत वन भूमि पर वर्षों से काबिज आदिवासी वनवासी लोगों को काबिज भूमि का अधिकार पत्र आज तक प्राप्त नहीं हुआ , जबकी 2008 ,2009 में आदिवासी वनवासी लोगों ने आवेदन भरकर ग्राम वनाधिकार समिति के पास जमा किये ओर पावती प्राप्त की थी उसके बावजूद प्रशासन  की नज़र में ये सरकारी रिकॉर्ड में आज भी  वनवासी यहां के पुराने कब्जाधारी नहीं हैं जब आदिमजाति कल्याण विभाग की जिला संयोजक रेखा पाँचाल से जानकारी मांगी तो उन्होंने क्या दलीलें दी ये भी सुनियेगा । इस पूरे मामले में निचले स्तर के जो कर्मचारियों ने जो गड़बड़ियां की है उसकी सजा आज इन आदिवासियों का एक एक बच्चा झेल रहा है , इस संबंध में जब जिला वन मण्डल अधिकारी विपिन कुमार पटेल से बात की तो जनाब ने अपने विभाग की नाकामियों को बड़ी खूबसूरती से छुपाते हुए  मामले की जाँच कराने की बात कही। अब देखने लायक होगा कि इस ख़बर दिखाए जाने के बाद जिला प्रशासन और वन विभाग इन गरीबो की किस्मत का क्या फैसला  करते है,

जो लोग प्रभावित हुए है उनके नाम इस प्रकार है
(1)नंदलाल पिता मेर सींग गौड ( खमरियाशिवलाल)
(2) हाकमसीगं पिता कुवरमन गौड( खमरियाशिवलाल )
(3) बिशाल पिता लाखन सींग गौड(खमरियाशिवलाल)
(4) लट्टू पिता रामसीगं गौड (खमरियाशिवलाल)
(5) संतोष पिता कुवरमन गौड(खमरियाशिवलाल)
(6)सुरेश पिता मुलायम सींग गौड (बमनोदा)
(7)राजेश पिता मेर सींग गौड(खमरियाशिवलाल)
(8) रमेश पिता मुलायम सींग गौड (बमनोदा)
(9) चद्रभान पिता लट्टू सींग गौड( खमरियाशिवलाल)
(10)प्रीतम पिता सुरेश गौड (बमनोदा)
(11) सूरत पिता मेर सींग गौड( खमरियाशिवलाल)

दमोह से इम्तियाज चिश्ती की रिपोर्ट

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