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लाख दलदल हो पांव जमाए रखिए हाथ खाली ही सही उपर उठाये रखिए कौन कहता है चलनी में पानी रुक नहीं सकता बर्फ बनने तक हौसला बनाये रखिए अगर सड़कें खामोश हो जायेंगी तो संसद आवारा हो जायेगी अन्नदाता की ताकत को पहले पहचान गये होते

कलयुग की कलम

लाख दलदल हो पांव जमाए रखिए

हाथ खाली ही सही उपर उठाये रखिए

कौन कहता है चलनी में पानी रुक नहीं सकता

बर्फ बनने तक हौसला बनाये रखिए

अगर सड़कें खामोश हो जायेंगी तो संसद आवारा हो जायेगी

अन्नदाता की ताकत को पहले पहचान गये होते

 

जब असम में चुनाव हो रहे थे तब भाजपा ने नागरिकता कानून लागू करने की बात छोड़ दी थी अब जब उत्तरप्रदेश, पंजाब में चुनाव होने हैं तो भाजपा ने कृषि कानूनों को लागू करने की बात छोड़ दी है ।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से आनन फानन में राष्ट्र के नाम सन्देश प्रसारित करने का कार्यक्रम तय कराकर अहंकारजनित मासूमियत मुखोटा ओढ़कर कृषि कानूनों को वापिस लेने की घोषणा की है उसने खुद नरेन्द्र मोदी सहित तमाम सिपहसालारों, गोदी मीडिया को उलझन में डाल दिया है । कलतक जो कृषि कानूनों के फायदे गिना रहे थे तथा किसान आंदोलन के लिए विष वमन कर रहे थे अब कौन सा मुँह लेकर जनता के बीच जाएं ।

गोदी मीडिया ने किसान आंदोलन को बदनाम करने के लिए सारे अनैतिक हथकण्डे अपनाये मगर किसानों ने गोदी मीडिया को आंदोलन से बाहर का रास्ता दिखा दिया था । मोदी के निर्णय ने गोदी मीडिया को सदमे में ला दिया है । अब वह करे तो क्या करे , बोले तो क्या बोले । वैसे उसकी कोशिश प्रधानमंत्री मोदी के पहलू में छिपकर अपनी झेंप मिटाने की होगी । जहाँ मीडिया का एक छोटा सा हिस्सा भारत में लोकतंत्र को बचाता है वहीं गोदी मीडिया भारत के लोकतंत्र की हत्या करने में लगा रहता है ।

सही मायने में किसानों आंदोलन ने राम मनोहर लोहिया के कथन “अगर सड़कें खामोश हो जायेंगी तो संसद आवारा हो जायेगी” को साकार करते हुए लोकतंत्र वापिस दिलाया है । किसान आंदोलन को नागरिकता कानून के विरोध में हुए आंदोलन से अलग नहीं किया जा सकता । उस आंदोलन के साथ जो ज्यादतियां, बर्बरता की गई थी वो सभी किसान आंदोलन के साथ भी की गईं हैं । जिस तरह गोदी मीडिया के सहयोग से शाहीन बाग आंदोलन को मुस्लिम अल्पसंख्यक खांचे में फिट किया गया था उसी तरह किसान आंदोलन को भी सिक्ख और अन्य किसान के फ्रेम में जड़ने की कोशिश की गई । मगर किसानों ने बेहतर सांप्रदायिक सोच के साथ गोदी मीडिया के इस प्रोपेगैंडा की हवा निकाल कर रख दी । शाहीन बाग आंदोलन को ऐसा साथ नहीं मिला । उन पर गोलियों से हमला किया गया, गोली मार देने के नारे लगाए गए, पुरुस्कार स्वरूप राज्यमंत्री को केबिनेटमंत्री बना दिया गया । अमित शाह ने तो यहां तक कहा कि वोटिंग मशीन ऐसे दबाना है कि करेंट शाहीन बाग तक पहुंचे । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो कपड़ों से पहचानने की बात कही थी । सच कहा जाय तो शाहीन बाग आंदोलन की असफलता ही किसान आंदोलन की सफलता है ।

सुभाषचंद्र बोस का नारा था दिल्ली चलो जब इस नारे को किसानों ने आत्मसात किया तो दिल्ली वाली सरकार को खटक गया । अंग्रेजों ने तो हाथ पैर में बेड़ियां पहनाई थी आजाद भारत की सरकार ने अपनी हिटलरी ताकत समझाने के लिए सड़कों पर कीलें गाड़ दी गई, बड़े बड़े बोल्डर, कन्टेनर रखवा दिए गए ताकि किसानों के पांव ठहर जाएं ।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 8 फरवरी 2021 को संसद में किसान आंदोलनकारियों का मजाक उड़ाते हुए उन्हें आंदोलनजीवी – परजीवी तक कहा था । केंद्रीय मंत्री नरेन्द्र तोमर ने मोदी सरकार की अहंकारित पराकाष्ठा बताते हुए कहा कि भीड़ इकट्ठा होने से कानून वापस नहीं होते । आंदोलनकारियों का मनोबल तोड़ने के लिए केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि माओवादी विचारधारा से प्रेरित लोगों के हाथों में चला गया है किसान आंदोलन । केंद्रीय मंत्री वी के सिंह ने कहा कि तस्वीरों में कई लोग किसान नहीं लग रहे हैं । केंद्रीय मंत्री रावसाहेब दानवे के अनुसार आंदोलन के पीछे पाकिस्तान और चीन का हाथ है । केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी ने तो आंदोलनकारियों को मवाली तक कह दिया । भाजपा के बड़बोले सांसद कहां पीछे रहने वाले थे । मनोज तिवारी ने आंदोलनकारियों को टुकड़े टुकड़े गैंग का सदस्य बता दिया । आंदोलनरत किसानों की शहादत पर भाजपा सांसद रतन लाल ने शर्मनाक बयान देते हुए कहा कि इन किसानों को यहीं मरना था । हरियाणा सरकार के कृषि मंत्री जे पी दलाल ने भी आंदोलनकारियों के पीछे पाकिस्तान का हाथ होने की बात कही । कर्नाटक सरकार के कृषि मंत्री बी सी पाटिल ने कहा कि कायर हैं आत्महत्या करने वाले किसान । बिहार के कृषि मंत्री द्वारा भी अपना मुंह खोलते हुए किसान आंदोलन को दलालों का आंदोलन कहा गया । छुटभैया नेताओं द्वारा भी अपने आकाओं का गाया राग ही अलापा गया ।

देशवासियों ने देखा है कि जब किसान आंदोलनकारियों को मवाली, आतंकवादी, खालिस्तानी, देश का दुश्मन, टुकड़े टुकड़े गैंग का सदस्य आदि कहा गया नरेन्द्र मोदी चुप रहे । सड़कों पर कीलें गड़ाई गई, बोल्डर, कन्टेनर रखे गए नरेन्द्र मोदी चुप रहे । इतना ही नहीं जब किसानों को गाड़ियों से कुचलकर मार डाला गया तब भी नरेन्द्र मोदी ने ज़बान नहीं खोली । 700 से ज्यादा आंदोलनरत किसान कालकलवित हो गए मगर नरेन्द्र मोदी का कलेजा नहीं पसीजा । अगर यह कहा जाय कि किसान आंदोलन के दौरान साल भर में हुई आंदोलनकारियों को मौत मौत नहीं हत्या है तो अनुचित नहीं होगा ।

सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि जब प्रकाश पर्व के दिन राजनीतिक लाभ उठाने की गरज से तीनों कृषि कानूनों को वापिस लेने की घोषणा नरेन्द्र मोदी कर रहे थे तब भी एक बार भी किसानों की शहादत पर एक शब्द भी नहीं बोला । अपने पूरे भाषण में आंदोलनकारी किसानों की तपस्या को खुद की तपस्या बताकर खुद को ही महिमामण्डित करते रहे । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह कहना कि उनकी तपस्या में कमी रह गई कहीं इस ओर संकेत तो नहीं कि कीलें कम गाड़ी गई, सिर कम फोड़े गए, कम गाडियों से रौंदा गया ।

अगर समय समय पर चुनाव नहीं होते तो सरकारें आवारा और अत्याचारी हो चुकी होतीं । चंदे के नाम पर इकट्ठा किया गया हजारों, करोड़ों रुपया बेनामी रखने वाला एक देश एक चुनाव की बात कर जनता की ताकत को खत्म कर देने के मंसूबे पाल रहा है ।

किसान आंदोलन का टर्निंग प्वाइंट वह था जब राकेश टिकैत का रोना और उसी समय दिवंगत अजीत सिंह का फोन आना और यह कहना कि हम आपके साथ हैं । इस एक फोन से लगभग हार आंदोलन में नई जान आ गई थी ।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा तीनों कृषि कानून वापिस लेने की घोषणा के बावजूद आंदोलन तत्काल खत्म होने के आसार नहीं है । संयुक्त किसान मोर्चा ने साफ – साफ कह दिया है कि आंदोलन तत्काल समाप्त नहीं होगा । हम तब तक डटे रहेंगे जब तक कानून रदद् करने की सारी औपचरिकताएं पूरी नहीं हो जातीं । आंदोलनकारी नेताओं का कहना है कि टीवी की घोषणा से देश नहीं चलता । देश बातचीत से चलता है । नरेन्द्र मोदी ने सभी देशवासियों के खाते में 15 – 15 लाख जमा करने की बात टीवी पर कही थी क्या रकम जमा हुई ?

यह निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विश्वसनीयता पर कुठाराघात कहा जायेगा । आजाद भारत के इतिहास में प्रधानमंत्री पद की गरिमा का जितना अधोपतन नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में हुआ है उसके पहले कभी नहीं हुआ ।

कृषि कानून वापिस लेने की नरेन्द्र मोदी घोषणा ने सुप्तावस्था में पड़ी कांग्रेस में रक्त संचार सा कर दिया है । अब कांग्रेस राहुल गांधी के 14 जनवरी 2021 को कहे गए व्यक्तव्य को आगे रखकर हमलावर होगी । किसानों की ताकत के आगे सरकार मजबूर होगी और ये कानून वापिस लेगी । भले ही तब भाजपा ने राहुल गांधी का मजाक उड़ाया था मगर अब जब सरकार ने कृषि कानून वापिस लेने का वचन दे दिया है तो फिर सूट बूट की सरकार फेल हो गई और पप्पू पास हो गया ।

ट्रेक्टर से सिर्फ खेत ही नहीं सरकार के गुरुर भी जोते जाते हैं । बैल कितना भी अड़ियल हो किसान खेत जुतवा ही लेता है । अन्नदाता की ताकत को पहले पहचान गए होते तो ऐसी भद्द तो ना पिटती ।

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता

स्वतंत्र पत्रकार

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