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👍सरकार की साख को बट्टा लगा रहे चित्रकूट के जमीनी घोटाले “कई विधायक उठा चुके सवाल, भूमाफियाओं व अपराधियों के गठजोड़ को तोड़ने की दरकार

कलयुग की कलम

👍सरकार की साख को बट्टा लगा रहे चित्रकूट के जमीनी घोटाले

👍कई विधायक उठा चुके सवाल, भूमाफियाओं व अपराधियों के गठजोड़ को तोड़ने की दरकार

कलयुग की कलम

सतना, (ओपी तीसरे)। मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम की तपोस्थली चित्रकूट आखिर भाजपा के लिए अजेय क्यों रही है ? आखिर क्या कारण है कि  चित्रकूट विधानसभा क्षेत्र भाजपा के लिए अभेद्य किला बना हुआ है, जहां वर्ष 2008 में भाजपा प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह गहरवार की जीत को अपवादस्वरूप छोड़ दिया जाए तो भाजपा यहां मुंह की खाती रही है ? चित्रकूट के सामाजिक और राजनीतिक मामलों के जानकार इसके लिए कई कारकों को जिम्मेदार ठहराते हैं। जिनमें से सबसे बड़ा कारण चित्रकूट के उपरोक्त जमीनी घोटाले हैं। इन घोटालों को लेकर सत्तापक्ष के ही कई विधायक सवाल भी उठा चुके हैं, लेकिन यहां अधिकारियों व भूमाफियाओं का गठजोड़ इतना सशक्त है कि सरकार भी यहां लाचार नजर आती है। सरकार की यही लाचारी भाजपा के लिए चुनाव में भारी साबित होती है। जबकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साफ निर्देश हैं कि भू-माफियाओं के खिलाफ बिना किसी दबाव के सख्त कार्रवाइयां की जाएं। लेकिन जिले के अफसर सीएम की इस मंशा के विपरीत काम कर रहे हैं। हालात यह हैं कि सतना में जिलाबदर की कार्रवाई के बाद जिलाबदर के आरोपी यज्ञदत्त शर्मा ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर कई रजिस्ट्रियां कराई और प्रशासनिक अधिकारी मूक दर्शक बने देखते रहे।

विधायकों ने दागे सवाल, मिले गोलमोल जवाब

चित्रकूट के जमीनी घोटालों को लेकर सत्तापक्ष के तीन विधायक  विधानसभा में सवाल भी दाग चुके हैं। मैहर विधायक नारायण त्रिपाठी, चुरहट विधायक शारदेंदु तिवारी व विजयराघवगढ़ विधायक राघवेंद्र सिंह ने सदन में सवाल लगाकर चित्रकूट की ऐसी सरकारी जमीनों का ब्यौरा मांगा था, जो बाद में बंटन के आधार पर दी गई थी। इसके अलावा मझगवां की आराजी नंबर 710 ग्राम परेवा की आराजी नंबर 28 ग्राम नयागांव की आराजी नंबर 516, 518, 519, 520, 521 ग्राम रजौला की आराजी नंबर  364, 368, 369 की आराजियों के संबंध में पूछा गया था कि इन जमीनों की जांच में क्या तथ्य सामने आए थे और प्रश्नाधीन आराजियों का क्या हुआ ? विधायकों के सवालों का जवाब तो दिया गया, लेकिन उन तथ्यों को छुपा लिया गया जो तथ्य जमीनी घोटाले की पुष्टि कर सकते थे। मसलन यह बात छुपाई गई कि आराजी नंबर  364, 368, 369 में हजारों पेड़ है और उसमें वन चौकी भी स्थित है।

प्रशासन ने तो इस मामले में  हद ही कर दी

मामला रजौला ग्राम की आराजी नंबर 250 का है, जिसे बंटन नीति के तहत 4.70 एकड़ जमीन चुन्ना तनय सुकुरवा चर्मकार को दिया गया। बाद में यह जमीन चित्रकूट के भू कारोबारी संतोष त्रिपाठी की पत्नी दिव्या त्रिपाठी व राजेश्वरी द्विवेदी के नाम दर्ज हो गई। विगत माह दिव्या त्रिपाठी ने इस जमीन को किसी और को बेचा है। दिलचस्प बात यह है कि ग्राम रजौला स्थित आराजी क्र. 268/1 क रकवा 1.619 हे. व आराजी क्र. 268/1 ग रकवा 1.619 हे. का बंटन भगवानदीन व पराग के नाम किया गया था। जिसे राजस्व में दर्ज प्रावधानों का पालन करते हुए भगवानदीन व पराग ने बेच दिया था। लेकिन इस बंटन को कलेक्टर ने 3 मार्च 2020 को इस तर्क के साथ निरस्त कर दिया था कि बंटन नियम व प्रावधानों के विपरीत है। जबकि इसी आराजी के आसपास की आराजियों को उसी प्रक्रिया के तहत भवानीदीन, मैकुआ, गुजवा, धसीलाल, रजुआ कोटवार, छंगू भइयालाल, बिरवा, रामलाल, पराग, सियादुलारी व कुंती को  आवंटित हुई, जिन्हें बेचने की अनुमति भू-कारोबारियों को मिल गई। राजस्व के दस्तावेज बताते हैं कि इसी प्रकार 1977 में आराजी क्र. 374, 375, 376, 378, 380, 383, 289, 415, 417 और 414 की जमीनों का बंटन जगनंदन आदिवासी, बोधीलाल, जागेश्वर, बड़कइया, मोनुआ, गेंदा, रामसिया, भुरवा, भइयालाल समेत 82 लोगों को बंटन की जमीनें सरकार ने दी, जिनके  बंटन की प्रक्रिया भी भवानीदीन व पराग की तरह ही थी। ऐसे में सवाल यह है कि उसी प्रक्रिया के तहत जिन 82 और 12 लोगों को बंटन की जमीन दी गई, उनका निरस्तीकरण क्यों नहीं किया गया और भूमाफियाओं को इन जमीनों को बेचने की अनुमति क्यों दी गई ?

केस क्र. 1- आराजी क्र.-364, 368, 369 की 21 जून को रजिस्ट्री करा दी गई। इन आराजियों पर सघन जंगल होने के साथ वन चौकी और वन विभाग का प्रसंस्करण केंद्र है। रजिस्ट्री में हजारों पेड़ों व वन चौकी का जिक्र न कर शासन को करोड़ों का चूना स्टांप शुल्क के तौर पर भी लगाया गया। इसके पीछे चित्रकूट के कुछ सत्ताधारी दल से जुड़े लोग हैं।

केस क्र. 2-कामता की देवस्थान की आराजी क्र. 1004 एवं वन भूमि की आराजी क्र. 1072 में कूट रचना करके पटवारी व स्थानीय राजस्व अमले ने नक्शे में उलट फेर करवा दिया था। मुखारबिंद की इस आराजी की खरीदी-बिक्री में भाजपा का चोला ओढ़े भूमाफिया था। इसमें एक पूर्व मंत्री की संलिप्तता भी पाई गई थी।

केस क्र. 3- आराजी क्रमांक- 250 और आराजी क्रमांक-268 का बंटन किया गया लेकिन जिला प्रशासन ने एक बंटन को अमान्य कर दिया जबकि कुछ स्थानीय भाजपा नेताओं को फायदा पहुंचाने वैसी ही बंटन की जमीन  आराजी क्र. 250 को बेचने की अनुमति दे दी। बंटन की जमीन पर बाद में   दिव्या त्रिपाठी व राजेश्वरी द्विवेदी समेत कई के नाम दर्ज हुए।

“चित्रकूट को अफसरों-भूमाफियाओं के गठजोड़ से बचाइए सरकार”

जिन अफसरों पर सरकारी व सार्वजनिक महत्व की जमीनों को बचाने की जिम्मेदारी है उन्हीं अधिकारियों की संदिग्ध कार्यप्रणाली  सरकारी व सार्वजनिक महत्व की जमीनों को खुर्द-बुर्द कर रही है। जिला मुख्यालय से लेकर चित्रकूट तक जमीनों के गोरखधंधे में यहां के अधिकारी फल-फूल रहे हैं। चित्रकूट व मझगवां में तो राजस्व के ही कुछ अधिकारी जमीनों के धंधें में लिप्त हैं, जिन्हें जिला मुख्यालय से शह मिल रही है। यहां कलेक्टर के तौर पर पदस्थ रहे पूर्व कलेक्टर केके खरे की वह बात अक्षरश: सही साबित हो रही है जो उन्होने एक पत्र लिखकर कहा था कि सरकारी व सार्वजनिक महत्व की जमीनों के खुर्द-बुर्द होने में राजस्व महकमा ही संलिप्त  है। उस दौरान  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्वयं चित्रकूट पहुंचकर संतों को आश्वस्त किया था कि धार्मिक महत्व की जमीनों व मंदाकिनी को संरक्षित किया जाएगा। उस दौरान सीएम के प्रयास से चित्रकूट की कई धार्मिक महत्व की जमीनें बचाई भी गई थीं लेकिन वर्ष 2018 में चंद महीनों के लिए सरकार क्या बदली , पुन: चित्रकूट में वैसा ही खेल शुरू हुआ जो अभी भी जारी है। संत महात्माओं व चित्रकूटवासियों की नाराजगी बनने वाले इन जमीनी घोटालों पर अंकुश लगाने की जरूरत है। बेशक गलतियां अफसर कर रहे हैं लेकिन मुसीबत सरकार को उठानी पड़ती है। सरकारी तंत्र के जमीनी घोटालों में संदिग्ध भूमिका होने पर जेब भले  अफसरों और भू कारोबारियों की भरे  लेकिन छवि सरकार की खराब होती है, जिसकी कीमत चित्रकूट विधानसभा के चुनावों में चुकानी पड़ती है।

 

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