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ध्यानचंद के पीछे छिपकर_ ………. मुफ्त का चन्दन घिस मोरे नन्दन कब तक बोझ संभाला जाय द्वंद कहां तक पाला जाये दूध छीन बच्चों के मुख से क्यों नगों को पाला जाये दोनों ओर लिखा हो भारत सिक्का वही उछाला जाये तू भी है राणा का वंशज “फेंक जहां तक भाला जाये

कलयुग की कलम डॉट कॉम न्यूज

       ध्यानचंद के पीछे छिपकर_ ………. मुफ्त का चन्दन घिस मोरे नन्दन

कब तक बोझ संभाला जाय

द्वंद कहां तक पाला जाये

दूध छीन बच्चों के मुख से

क्यों नगों को पाला जाये

दोनों ओर लिखा हो भारत

सिक्का वही उछाला जाये

तू भी है राणा का वंशज

            फेंक जहां तक भाला जाये

मोदी सरकार को बखूबी पता था कि 2020 में टोक्यो ओलंपिक होने वाले हैं । कोविड 19 की विभीषिका के कारण आयोजन तिथि को बढ़ाया गया था । इसकी भी जानकारी मोदी सरकार को थी ।

जहां एक ओर विश्व के छोटे से लेकर बड़े देश ओलंपिक में मैडल पाने के लिए अपने खिलाड़ियों को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं देने के लिए खेल बजट में अतिरिक्त राशि आवंटित करते हैं वहीं मोदी सरकार ने खेल बजट में हजारों लाख रुपये की कटौती कर दी ।_

हॉकी के स्वर्णिम इतिहास के बावजूद कोई प्रायोजक सामने नहीं आया । वर्षों से सोची समझी रणनीति के तहत क्रिकेट के सामने दूसरे खेलों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता रहा । उसके बावजूद सीमित संसाधनों में अपनी इच्छा शक्ति के बलबूते खिलाड़ियों ने देश की झोली में 7 मैडल भरे ।

बेशर्म राजनीतिज्ञों ने इसे भी आपदा में अवसर की भांति भंजाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी । प्रधानमंत्री पद की मर्यादा के विपरीत आचरण करते हुए नरेन्द्र मोदी ने तो एक बार फिर अपनी नफरती मंशानुरूप पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्वर्गीय राजीव गांधी के नाम पर दिए जा रहे खेल रत्न पुरुस्कार को ही हॉकी के जादूगर के नाम से विश्व विख्यात, भारत रत्न के प्रबल दावेदार ओलंपियन मेजर ध्यानचंद के नाम पर देने की घोषणा कर दी । जबकि मेजर ध्यानचंद के नाम पर 2002 से ही ध्यानचंद लाइफ टाईम अचीवमेंट इन स्पोर्ट्स एंड गेम्स पुरुस्कार दिया जा रहा है ।

यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यह घोषणा ध्यानचंद के सम्मान के लिए नहीं बल्कि विशुद्ध रूप से अपने राजनीतिक लाभ के लिए की गई लगती है । खुद की झोली खाली रख दूसरे की तिजोरी से चुरा कर दानवीर बनने का शौक निंदनीय ही कहा जायेगा ।

फिलहाल भारतीय खिलाड़ियों में से नीरज चोपड़ा टोक्यो ओलंपिक की व्यक्तिगत स्पर्धा ट्रैक एंड फील्ड के जेवलिन थ्रो (भाला फेंक) स्पर्धा में गोल्ड मैडल पाने वाले एकमात्र खिलाड़ी बनकर उभरे, वहीं व्यक्तिगत स्पर्धा भारत्तोलन में मीराबाई चानू ने रजत, कुश्ती में रवि कुमार दाहिया ने रजत पदक प्राप्त किया । इसी तरह बैडमिंटन में पी वी सिंधू, मुक्केबाजी में लोवलीना बारमोहेन, तथा कुश्ती में बजरंग पुनिया ने कांस्य जीता ।

वहीं टीम स्पर्धा के हॉकी में पुरुषों की टीम ने कांस्य पदक जीत कर पदकों की संख्या को 7 तक पहुंचा दिया । महिला हॉकी टीम भले ही कोई पदक पाने में सफल नहीं हो पायी मगर इतिहास रचते हुए ओलंपिक में पहली बार सेमीफाइनल तक का सफर तय कर भविष्य की उम्मीद जगा दी है ।

भारत को 13 साल बाद व्यक्तिगत स्पर्धा में सोना मिला है । इसके पूर्व 2008 बीजिंग ओलंपिक में अभिनव बिंद्रा ने शूटिंग में गोल्ड मैडल प्राप्त किया था ।_

नीरज चोपड़ा के गोल्ड मैडल जीतने पर सोशल मीडिया में जिस तरह की पोस्ट शेयर की जा रही हैं । खिलाड़ियों के लिए वे बेहद आपत्तिजनक, अपमानजनक, निंदनीय ही कही जायेंगी ।

राजनीतिज्ञों के घिनौने स्याह चाल, चरित्र, चेहरों के साथ खिलाड़ी की तुलना करना उसे सम्मानित करने के बजाय अपमानित करना जैसा ही कहा जायेगा ।_

एक के लगातार फेंकने से देश का अमन, सकून, आपसी सौहार्द, चैन से सोना गया, दूसरे के एक बारगी फेंकने से ही सोना आया जैसी टिप्पणी को सम्मानजनक तो नहीं ही कहा जा सकता ।

जिस तरह राजनीतिज्ञों ने विजेता खिलाड़ियों को बधाई देते हुए राजनीतिक लाभ उठाने की मंशा से अपनी फोटोज शेयर करनी शरू की है उससे उनके लिए तो यही कहा जा सकता है कि_ *ये बंद कराने आये थे तवायफों के कोठे मगर सिक्कों की खनक देखकर खुद ही मुजरा कर बैठे

 

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता

स्वतंत्र पत्रकार

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