UNCATEGORIZED

रात में क्या क्या ख़याब दिखाये ” रंग भरे सौ जाल बिछाये आँख खुली तो सपने टूटे “रह गए गम के काले साये

कलयुग की कलम

रात में क्या क्या ख़याब दिखाये

                  रंग भरे सौ जाल बिछाये

आँख खुली तो सपने टूटे

     रह गए गम के काले साये

 

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है जोर कितना बाजु-ए क़ातिल में है

कभी ये आवाजें ब्रितानी सरकार के ख़िलाफ़ पूरे देश में गूंजा करती थी । आज एक बार फ़िर ऐसा ही कुछ नजारा पिछले साल से सरकार द्वारा बनाये गए तीन कृषि क़ानूनों की ख़िलाफ़त कर रहे किसानों द्वारा देश की राजधानी दिल्ली की बॉर्डर पर दिखाई – सुनाई दे रहा है ।

एक ही उल्लू काफी है बरबादे चमन के करने को यहां तो तीनों साख में उल्लू बैठे हैं अंजामे गुलिस्तां क्या होगा !

मोदी सरकार तीनों कृषि कानूनों को अपनी साख का सवाल बनाकर किसानों की आवाज को अनसुनी कर गुलामीयत की यादों को तरोताजा कर रही है । बारीक नजर रखने वालों का कहना है कि नये कृषि क़ानूनों के दुष्प्रभाव से केवल किसान ही नहीं हर हिंदुस्तानी बरबाद होगा । जिसे कृषि कानून की कांट्रेक्ट फार्मिंग धारा तीन की बारीकी से विवेचना कर समझा जा सकता है ।

कांट्रेक्ट फार्मिंग धारा तीन में उल्लेख है कि किसान और व्यापारी के बीच में एग्रीमेंट किया जाएगा । उस एग्रीमेंट में लिखा जाएगा कि किसान अपनी जमीन में कौन सी फसल बोयेगा, उस फसल का रेट क्या होगा, स्टैंडर्ड क्या होगा, फसल की क्वालिटी क्या होगी, उस फसल के लिए जो बीज, खाद, कीटनाशक, मशीनरी, तकनीक होगी व्यापारी देगा । उसी एग्रीमेंट में यह भी लिखा जाएगा उसकी कीमत क्या होगी, फसल तैयार होने पर उस फसल को व्यापारी किस कीमत पर खरीदेगा । इतना ही नहीं फसल बोते समय, उगकर जब बढ़ रही होगी तब और फसल कटने के बाद जब व्यापारी उस फसल को खरीदेगा तब इन तीन समय पर फसल की चैकिंग होगी ।

चलिये मान लेते हैं कि किसान और व्यापारी के बीच एग्रीमेंट हो गया । एग्रीमेंट की शर्तों के मुताबिक सारी की सारी फसल व्यापारी के यहां चली गई तो फिर सरकार किसान से क्या खरीदेगी बाबाजी का ठिल्लू । क्योंकि मोदी सरकार ने 2013 में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत किये गए प्रावधानों को ख़त्म कर दिया है जिसमें फ़सल खरीदने पर व्यापारी के ऊपर प्रतिबंध लगा हुआ था । व्यापारी एक निश्चित सीमा तक ही फसल की खरीद फरोख्त कर सकता था मग़र अब नए प्रावधान के मुताबिक व्यापारी अनलिमिटेड फ़सल खरीद कर अपनी गोदाम में रख सकता है ।

2013 में नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट के तहत 82 करोड़ लोगों को तीन रुपये किलो चावल, दो रुपये किलो गेंहू तथा एक रुपये किलो मोटा अनाज दिया जायेगा । यक्ष प्रश्न यही है कि जब सारी की सारी फ़सल व्यापारी खरीद कर ले जाएगा और सरकार कुछ भी खरीदने की स्थिति में नहीं होगी तब इन 82 करोड़ हितग्राहियों को अनाज कहां से दिला पाएगी । मतलब साफ़ है कि सरकार के मदद की राडार पर रहने वाले 82 करोड़ हितग्राही असमय खत्म हो जाएंगे ।

सरकार बिकाऊ मीडिया के सहारे ढ़िढोरा पीटती है कि तीनों कृषि क़ानून किसानों के हित में हैं जबकि किसान कह रहे हैं कि तीनों कृषि कानून किसान के लिए क़ब्रगाह हैं । हकीकत यह है कि तीनों कृषि क़ानून देश के खिलाफ हैं !

कांट्रेक्ट फार्मिंग एग्रीमेंट से जहां 82 करोड़ गरीब ख़त्म होंगे वहीं देशभर में चल रही लगभग पांच लाख राशन दुकानों पर ताला लटका दिया जायेगा । जिसका सीधा असर इन पांच लाख राशन दुकानों में मिलने वाले रोजगार पर पड़ेगा । कांट्रेक्ट फार्मिंग एग्रीमेंट की शर्तों के मुताबिक जब किसान को बीज, खाद, कीटनाशक, मशीनें, तकनीकी एग्रीमेंट करने वाला व्यापारी देगा तो उन व्यापारियों का रोजगार भी ख़त्म हो जायेगा जो बीज, खाद, कीटनाशक, मशीनें आदि विक्रय करते हैं । जब आम व्यापारी ख़त्म, मजदूर ख़त्म कर दिया जायेगा तब किसान विशुद्ध रूप से बंधुआ मजदूर, गुलाम बनकर रह जायेगा ।

किसान और व्यापारी के बीच एग्रीमेंट होने के बाद किसान अपनी ही जमीन पर बोई हुई फ़सल में से एक दाना भी नहीं ले सकता । यदि ऐसा किया तो फिर लड़ते रहो एडीएम, एसडीएम के द्वारे । न्याय मिलने से रहा क्योंकि जग जाहिर है देश की राजस्व न्यायालयों का न्याय । सच तो यह हैं कि यहां तो न्याय ऊंची कीमत पर खुलेआम नीलाम होता है । जिसकी लाठी उसकी भैंस ।

स्वाभाविक है कि किसान ऐसे क़ानून को लेकर क्या करेगा जिसके हंटर के तले किसान अपनी ही जमीन पर उगाई गई फ़सल में से चाह कर भी अपने, अपने बच्चों, अपने परिजनों के लिए एक दाना भी नहीं ले सकता ! जब मोदी सरकार द्वारा बनाये गए कृषि क़ानूनों से किसान अपनी मर्जी से खाद, बीज, कीटनाशक, मशीन आदि खरीद ही नहीं पायेगा तो स्वाभाविक तौर से छोटे व्यापारी का व्यापार तबाह हो जायेगा । मजदूर बरबाद हो जायेगा । तब मतलब बहुत साफ़ है कि आज नहीं तो कल चंद व्यापारियों की मुट्ठी में पूरा देश क़ैद होने वाला है ।

इतना ही नहीं होगा । इसका असर यह भी होगा कि किसान और व्यापारी का कांट्रेक्ट हो जाने के बाद कोई भी बैंक किसान को कर्जा नहीं देगा । मतलब वक्त जरूरत पर किसान को लोन लेने के लिए व्यापारी की चौखट पर ही माथा टेकना पड़ेगा ।

मोदी सरकार द्वारा लागू किये गए कृषि कानून से एक बार फिर 1947 के पहले का दौर शुरू होगा जब साहूकार से ली गई उधार रकम का ब्याज किसान पीढ़ी दर पीढ़ी चुकाता रहता था । मूलधन और ब्याज के एवज में किसान को अपनी रहन रखी हुई जमीन अंततः साहूकार के नाम करनी पड़ती थी । देखें और पढ़ें मदर इंडिया, गुलामी पिक्चर और मुंशी प्रेमचंद की कालजयी रचना गोदान ।

यह कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि मोदी सरकार द्वारा लागू किये गए कृषि कानून की भयावहता से कोई भी अछूता रहने वाला नहीं है । मध्यम वर्गीय परिवार की तो कमर ही टूट जायेगी । आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया । मोदी सरकार का कृषि कानून किसान के हितों के विपरीत ही नहीं है बल्कि यह देश को तबाह करने वाला है ।

 

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता

स्वतंत्र पत्रकार

Related Articles

error: Content is protected !!
Close