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 इनसे तो बेहतर हैं लाशें

कलयुग की कलम

     इनसे तो बेहतर हैं लाशें

 किसने सोचा था कि जिस पार्टी की अगुवाई में देश के लिए आज़ादी की लड़ाई लड़ी गई और सूरज न डूबने वाले शासक को देश निकाला देकर देश को आज़ाद कराया गया उस पार्टी की आने वाली पीढ़ी इतनी निकम्मी, नाकारा, कायर निकल जायेगी कि उस पार्टी का आलाकमान अपने पुरखों के सम्मान की हिफाज़त तक नहीं कर पायेगा तो फ़िर यह सोचना लाज़िमी है कि अगर उसके हाथों सत्ता सौंप दी जाय तो वह देश की रक्षा क्या ख़ाक करेगा ।

बॉयलर मुर्गे को बाज की तरह पेश कर कब्र में गड़ती चली जा रही पार्टी को उबारने की असफ़ल कोशिश की जीती जागती मरदानी तस्वीर तब सामने आ गई जब उस पार्टी के शासन के दौरान देश का नेतृत्व करने वाले के नाम पर खेल जगत में दिए जाने वाला सर्वश्रेष्ठ सम्मान “खेल रत्न” का नाम बदलकर स्वर्गीय ध्यानचंद के नाम पर कर दिए जाने की घोषणा दूसरों की लाईन को मिटाकर अपनी लाईन बड़ा बताने की मानसिकता से ग्रसित पार्टी द्वारा देश का पंतप्रधान बनाये गए व्यक्ति द्वारा केवल इसलिए कर दी जाती है जिसके बारे में कहा जाता है कि उन्हें उस परिवार से हद दर्जे की घृणात्मक नफ़रत है !

भारत रत्न से सम्मानित पूर्व पंतप्रधान के नाम पर दिए जाने वाले खेल रत्न का नाम बदलने की घोषणा को हफ्ता होने को आ रहा है और उस खेमे में कंपन तक नहीं होना इस बात का सूचक है कि पार्टीजन मुर्दों से भी गए गुजरे हो गए हैं और पार्टी गर्त में जा चुकी है ।

घटिया – घिनौनी हरकत करने वाली पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ यदि यही सब कुछ किया गया होता तो अभी तक तो देश के हर गली कूचे में बवंडर ला दिया गया होता ।

आने वाले दिनों में यदि पंतप्रधान द्वारा अपनी निम्न स्तरीय सोच को आगे बढ़ाते हुए नफरती परिवार के सदस्य द्वय, जो बारी – बारी से देश की सत्ता का नेतृत्व कर चुके हैं, को दिए गए देश के सर्वोच्च सम्मान “भारत रत्न” को वापिस लिए जाने की बलात घोषणा कर दी जाए तो किसी को भी आश्चर्यचकित या चौकना नहीं चाहिए ।

होना तो यह चाहिए था कि अपमानित किये गए पार्टीजन कुछ करते ना करते कम से कम उनके परिजनों को तो अपनी सास – दादी – पति – पिता को दिया गया देश का सर्वोच्च सम्मान “भारत रत्न” गिरेबान में हाथ डालकर छीन लिया जाय उसके पहले ही अपनी सास – दादी – पति – पिता के सम्मान की रक्षा के लिए उनको मिले “भारत रत्न” को ले जाकर राष्ट्रपति को ससम्मान वापिस कर दिया गया होता ।

अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है । 15 तारीख स्वतंत्रता दिवस के दिन को भारत रत्न वापिस करने की घोषणा की जा सकती है तथा 29 अगस्त राष्ट्रीय खेल दिवस के दिन “भारत रत्न” राष्ट्रपति को ससम्मान वापिस सौंपा जा सकता है ।

सवाल यही है कि क्या जबरन बाज बनाकर पेश किए जा रहे बॉयलर मुरगों से ऐसे प्रतिकार की अपेक्षा की जा सकती है ! शायद हाँ – शायद नहीं ।

 

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता

स्वतंत्र पत्रकार

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