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सवाल का जवाब ही सवाल हैं – छापा क्यों

कलयुग की कलम

सवाल का जवाब ही सवाल हैं – छापा क्यों

सूरज का पर्यायवाची नाम रख लेने से कोई सूरज के समान खरा और प्रकाशवान नहीं हो जाता । सच्चाई नैतिकता से आती है और आज मीडिया में नैतिकता नाम की कोई चिड़िया नहीं है । अंतिम सत्य यही है कि पूरे कुएं में भाँग घुली हुई है ।

गंगा में तैरती लाशें, ऑक्सीजन की कमी से अस्पतालों में मरते लोग, नौनिहालों को लेकर मीलों लम्बी सड़क को पैंया पैंया नापते महतारी बाप, आसमान छूती कीमतें, जासूसी कांड, अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में नीलाम हो रही देश की आबरू, इसी तरह की अनेक खबरों को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित प्रसारित कर लोगों को पढ़ने देखने के लिए अंधों की भीड़ को आईना बेचने का अपराध सरकार की नजरों में देशद्रोह से कम तो आंका नहीं जायेगा और उसकी सजा भी प्राणदंड से कम क्या होगी !

इन अक्षम्य अपराधों के लिए न तो मीडिया का गला घोंटना पहली बार हो रहा है न ही दूसरों के घरों में झांकना । सरकार किसी की भी हो उसके चाल चलन में विशेष बदलाव नहीं आता । जब लोकतंत्र की संवैधानिक तीसरी टांग को तोड़कर नतमस्तक कराया जा सकता है तो मान न मान मैं तेरा मेहमान की भांति स्वयंभू बने लोकतंत्र की चौथी टांग मीडिया को तलवे चाटने मजबूर क्यों नहीं किया जा सकता ।

मोदी सरकार ने अपनी नग्नता को छुपाने के लिए मीडिया घराने पर छापा डलवाया है इसमें कोई न तो विवाद है न ही विरोधाभास है । ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार पहली ऐसी सरकार है जिसने ही अपने कपड़े उतरते देखकर स्वयंभू लोकतंत्र की चौथी टांग को तोड़ने की कोशिश की है । इसके पहले भी इंदिरा सरकार ने अपने नोचे जा रहे नक़ाब से परेशान होकर प्रेस का गला घोंटने का प्रयास किया था । सत्ताधारियों का चरित्र ही ऐसा होता है जो सत्ता की धारा के विपरीत बहने की कोशिश करेगा उसे यमपुरी की गली से गुजरना ही होगा । पच्चीसों पत्रकारों की हत्या कर उनकी आवाज को सदा के लिए केवल इसलिए खामोश कर दिया गया कि उन्होंने ने सत्ता के आगे नतमस्तक होना स्वीकार नहीं किया ।

इंदिरा सरकार ने खुलेआम इमरजेंसी लगाकर प्रेस का गला घोंटा मगर मोदी सरकार इमरजेंसी लगाने का साहस नहीं जुटा पा रही है इसलिए वह अघोषित रूप से इमरजेंसी जैसे हालात पैदा कर प्रेस का गला घोंट रही है । मोदी सरकार के अघोषित आपातकाल में निष्पक्ष पत्रकारिता की उम्मीद करना बेमानी है । सरकार की गोद में बैठकर अंगूठा चूस रहे गोदी मीडिया ने ऐसी स्थितियां पैदा कर दी हैं कि धारा के विपरीत बह रहा मीडिया या तो गोदी मीडिया का हिस्सा बने या फिर सरकार के कोपभाजन का शिकार ।

वैसे इन परिस्थितियों के लिए सरकार से ज्यादा मीडिया घराने खुद जिम्मेदार हैं । कारण मीडिया पहले भी व्यापारी चलाते थे और आज भी व्यापारी ही चला रहे हैं । कड़वी सच्चाई तो यह है कि कोई भी मीडिया घराना जनसरोकार की पत्रकारिता नहीं कर रहा है सभी कारपोरेट स्टाइल पर चल रहे हैं । यहां तक कि कई लोग तो पत्रकारिता की ओट में अपने स्याह चेहरे को छुपाये हुए हैं ।

मीडिया घरानों की नैतिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सारे अखबारी सरकार की गोद में बैठकर सब्सिडी की जमीन लेते हैं । टके भाव मिली जमीन पर व्यवसायिक परिसर निर्माण कर लाखों रुपये महीना कमाते हैं । टाइम्स ऑफ इंडिया से लेकर इंडियन एक्सप्रेस तक को पत्रकारिता के नाम पर मात्र एक रुपये की टोकन मनी पर सैकड़ों एकड़ जमीन दी गई है । राजनीतिक दलाली और सरकारी ठेकों की लाइजनिंग की उपजाऊ जमीन मीडिया ही बना हुआ है ।

मीडिया मालिकों को जहां एक ओर राज्यसभा की मेम्बरी चाहिए वहीं दूसरी ओर अपने वालों को मनमाफिक मंत्रालय । जिस तरह मीडिया घरानों के पास सरकार के राज हैं उसी तरह सरकार के पास भी मीडिया घरानों के राज हैं । चूंकि सरकार के पास आईटी, ईडी, सीबीआई जैसे घातक हथियार है इसलिए वह जब चाहे तब इन हथियारों के सहारे सिर उठाने वाले मीडिया घराने का सिर कुचलने लगती है ।

हाल ही में जिस मीडिया घराने पर मोदी सरकार ने आईटी, ईडी नामक घातक हथियार चलाये हैं यही मीडिया घराना कुछ समय पहले तक मोदी का सबसे बड़ा ब्रांड एम्बेसडर हुआ करता था । 2015 में ही खबरों को पॉजिटिव और निगेटिव में बांटने के साथ ही खबरों का एजेंडा और हेडलाइन मैनेजमेंट की तारीफ़ मोदी ने ही तो की थी । मंडे नो निगेटिव न्यूज । सत्य के हस्ताक्षर रूपी मामूली अखबार से शुरू हुआ कारोबार आज अरबों के विभिन्न व्यापार तक कैसे पहुंच गया किसी से छुपा नहीं है ।

सूरज का पर्यायवाची नाम रख लेने से कोई सूरज के समान खरा और प्रकाशवान नहीं हो जाता । सच्चाई नैतिकता से आती है और आज मीडिया में नैतिकता नाम की कोई चिड़िया नहीं है । अंतिम सत्य यही है कि पूरे कुएं में भाँग घुली हुई है ।

बाहर निकल कर गीदड़ धमकी देने वाले मीडिया घरानों का सच यही है कि वे भीतर से अत्यंत कायर हैं । सरकार के डर से पत्रकार को निकाल देते हैं । खुद करोड़ों कमाते हैं मगर पत्रकार का शोषण करते रहते हैं । महामारी की आपदा में खुद के लिए तो अवसर तलाशे मगर पत्रकार की नौकरी लील ली । सेठ जी जब अपने पत्रकारों के नहीं हो सकते तो पत्रकारिता के ख़ाक होंगे ।

 

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता

स्वतंत्र पत्रकार

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