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कुछ तो पक रहा है भाजपा के भितरखाने !

कलयुग की कलम

 कुछ तो पक रहा है भाजपा के भितरखाने !

सतत दो दशकों से सत्तापक्षी विधायक होने के बाद भी नहीं सुधरे शहर के नारकीय हालात

पिछली कुछ घटनाओं पर नजर डाली जाय तो कटनी में भारतीय जनता पार्टी की राजनीति के भितरखाने कुछ तो नए समीकरण बन रहे हैं जो आने वाले समय में उथल पुथल मचा सकते हैं ।

मिशन चौक रेलवे पुलिया के इस पार – उस पार की चलने वाली राजनीति से शहरवासी दशकों से परिचित हैं । जिसका खामियाजा नरक में तब्दील हो चुके विकास के रूप में शहरवासी आज भी बखूबी भोग ही रहे हैं ।

प्रदेश में शिवराजी सरकार के एक साल छोड़ दिये जायें तो 18 सालों से सत्ता में काबिज़ भारतीय जनता पार्टी का विधायक प्रतिनिधित्व करता चला आ रहा है । यह कहने में जनता को कोई गुरेज नहीं है कि चार पंच वर्षीय कार्यकाल के तीन विधायकों ने शहर विकास के नाम पर या रोड़े अटकाए हैं या फिर शहर विकास की ऐसी टेढ़ी ईंट रखी है जिसने शहरवासियों को नारकीय पीड़ा ही दी है ।

18 साल पहले एक विधायक के कार्यकाल में शुरू हुआ कटनी नदी का ओव्हरब्रिज आज तक अपनी पूर्णता की बाट जोह रहा है । दूसरे विधायक के कार्यकाल में शहर की ज़रूरतों को नजरअंदाज कर बनाये गए खिरहनी फाटक ओव्हरब्रिज की प्रताड़ना गर्ग चौराहे पर भोगने के लिए शहरवासी विवश हैं । शहर की ओर उतरने वाले ब्रिज में से यदि एक उतार रेलवे स्टेशन की ओर जाने वाली बरही रोड कही जाने वाली सड़क की ओर तथा दूसरा उतार भगवती चौराहे से गोलबाजार की ओर जाने वाली सड़क पर उतार दी गईं होती तो रेलवे स्टेशन, गोलबाजार की ओर जाने वाली भीड़ जो गर्ग चौराहे पर उतर कर अपने गंतव्य की ओर जाती है उसे प्रसवदायी पीड़ा से निजात मिल सकती थी ।

जो गलती विधायक ने खिरहनी फाटक ओव्हर ब्रिज में की है उसकी पुनरावृति बरगवां से जगन्नाथ तिराहे तक बनने वाले ओव्हरब्रिज में भी दिखाई दे रही है । यदि इस ओव्हरब्रिज का एक उतार साऊथ रेलवे स्टेशन की ओर जाने वाले मार्ग की ओर दूसरा शहर की ओर जाने वाले सुभाष चौक की ओर तीसरा बस्ती की जाने वाले लक्ष्मीनारायण मार्ग की ओर उतार दिया जाता तो नागरिकों को आने वाली अनेक विपत्तियों से बचाया जा सकता था ।

वर्तमान ब्रिज की उपयोगिता केवल बरसात में मिशन चौक के अंडरब्रिज में होने वाले जल जमाव से राहत देनी की रह गई है । मगर अब क्या जब चिड़िया चुग गई खेत । अब तो विधायक के लिए यही कहा जा सकता है “एक बार डहकाये बाम्हन वीर कहाये, बार बार डहकाये चोदुनाथ कहाये” ।

भारतीय जनता पार्टी की पहली महिला विधायक द्वारा स्वीकृत कराए गए केंद्रीय विद्यालय का निरस्तीकरण पार्टी के जिस विभीषणीकरण के चलते हुआ था उसकी चर्चा और पीड़ा का इजहार आज भी आमजनों के बीच होता रहता है ।

नगरीय चुनावों में जिस तरह शहर को सिंगापुर तथा खिलाड़ियों को अंतर्राष्ट्रीय खेल मैदान बनवाने के वादे किये गए थे वे सभी पंतप्रधान के वादों की तरह जुमले ही साबित हुए हैं । इतना ही नहीं जिस प्रकार वरिष्ठ खिलाड़ियों के चिरौरी विनती कर चंद महीने के लिए फारेस्ट प्ले ग्राउंड का एक हिस्सा चौपाटी के लिए लिया गया था । दशक होने को आया चौपाटी वाला हिस्सा खिलाड़ियों को लौटाना तो दूर उसे पूंजीपतियों को बेचने की तैयारी किये जाने की सुगबुगाहट सुनाई पड़ रही है ।

दानदाताओं द्वारा दिये गए शिक्षा मंदिरों के हालात नगर निगम के केयर टेकर जनप्रतिनिधियों के नाकारा निकम्मेपन के कारण किसी से छुपे हुए नहीं हैं । शहर की ऐतिहासिक धरोहरें जनप्रतिनिधियों का मर्सिया पढ़ने मजबूर हैं । जिम्मेदारों ने पूरे शहर को सूअरों का तबेला बनाकर रखा हुआ है । प्रशासनिक अधिकारियों का ख़िरका ज़िले को चारागाह समझकर चर रहा है ।

         ये रिश्ता कुछ कहता है

पिछली कुछ घटनाओं पर नजर डाली जाय तो कटनी में भारतीय जनता पार्टी की राजनीति के भितरखाने कुछ तो नए समीकरण बन रहे हैं जो आने वाले समय में उथल पुथल मचा सकते हैं ।

शहर में रहने वाले दो विधायकों की राजनीतिक पृष्टभूमि न तो भाजपाई है न ही संघाई साथ ही दोनों में से किसी के भी राजनैतिक गॉडफादर भाजपाई थे । दोनों की पैदाइश एक ही राजनीतिक अखाड़े में हुई है फिर भी दोनों की राजनीतिक महत्वाकांक्षी छत्तीसगिरी किसी से छुपी हुई नहीं है । पैसों की ताकत के बलबूते राजनीति करने पर विश्वास करने वाले इस बात को पूरी तरह साबित कर रहे हैं कि कटनी व्यापारिक नगरी है ।

एक पखवाड़े के भीतर जिस तरह प्रदेश के गृहमंत्री, प्रभारीमंत्री तथा सांसद सह प्रदेशाध्यक्ष के आगमन पर स्थानीय विधायक की नदारती नज़र आई तथा मंत्रियों द्वारा पार्टी कार्यालय छोड़कर स्थानीय विधायक को दरकिनार कर एक अन्य विधायक के घर पर भोजनादि और कार्यकर्ताओं से मेलमुलाकत का दौर चलाया गया उससे एक नये राजनीतिक समीकरण की बू आ रही है ।

राजनीतिक लोगों के बीच बतकही चल रही है कि इस तरह निर्मित की जा रही स्थितियां निकट भविष्य में होने वाले नगरीय चुनाव में स्थानीय विधायक को दरकिनार करने के साथ ही 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव में वर्तमान विधायक के स्थान पर अपने किसी खास को पार्टी टिकिट दिलवाकर चुनाव मैदान में उतारने की है !

राजनीतिक जानकारों के बीच इस बात पर भी अनुमानी बातचीत होती रहती है कि स्थानीय विधायक की मंत्रियों के आगमन पर बनाई जा रही दूरी उनकी कोई सोची समझी रणनीति है या लगातार की जा रही उपेक्षा से उपजी हताशा ! फ़िलहाल अभी बहुत कुछ भविष्य के पेट में छुपा हुआ है । ऊंट किस करवट बैठेगा देखने के लिए समय का इंतज़ार करना जरूरी है ।

 

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता

स्वतंत्र पत्रकार

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