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खुफिया ब्यूरो (आईबी) के पूर्व प्रमुख टी वी राजेश्वर ने दावा किया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने आपातकाल का समर्थन किया था और तत्कालीन संघ प्रमुख बालासाहेब देवरस ने इंदिरा गांधी से संपर्क स्थापित करने की कोशिश की थी.

कलयुग की कलम

[28/06, 6:46 pm] ADV. Badgaiyan: [28/06, 6:36 pm] ADV. Badgaiyan: खुफिया ब्यूरो (आईबी) के पूर्व प्रमुख टी वी राजेश्वर ने दावा किया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने आपातकाल का समर्थन किया था और तत्कालीन संघ प्रमुख बालासाहेब देवरस ने इंदिरा गांधी से संपर्क स्थापित करने की कोशिश की थी.

खुफिया ब्यूरो (आईबी) के पूर्व प्रमुख टी वी राजेश्वर ने दावा किया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने आपातकाल का समर्थन किया था और तत्कालीन संघ प्रमुख बालासाहेब देवरस ने इंदिरा गांधी से संपर्क स्थापित करने की कोशिश की थी. आपातकाल लागू करने के समय आईबी के उप-प्रमुख रहे राजेश्वर ने यह भी कहा है कि इंदिरा गांधी शुरू में आपातकाल लागू होने के छह महीने बाद ही इसे हटाने का मन बना रही थीं, लेकिन अकूत शक्ति का आनंद ले रहे संजय गांधी इसके खिलाफ थे. राजेश्वर ने यह दावा भी किया है कि इंदिरा गांधी को पता था कि आपातकाल के दौरान क्या हो रहा है लेकिन लोगों पर इसके प्रभावों और इसके नतीजों की गंभीरता को शायद वह समझ नहीं पाईं. एक निजी टीवी चैनल पर दिए एक इंटरव्यू में राजेश्वर ने कहा कि देवरस का पीएम हाउस में लिंक था. वे इंदिरा गांधी और संजय गांधी से मिलना चाहते थे,लेकिन इंदिरा गांधी ने मिलने से इनकार कर दिया था. यानी 1977 में जब जनसंघ जनता पार्टी के साथ मिलकर इंदिरा गांधी के खिलाफ लड़ रहा था तो उनका पैरेंट संगठन संघ इंदिरा के पक्ष में था.राजेश्वर ने कहा कि यह बिल्कुल सही है और वह पूरे यकीन के साथ यह कह रहे हैं. भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) से सेवानिवृत होने के बाद उत्तर प्रदेश और सिक्किम के राज्यपाल रह चुके राजेश्वर ने हाल ही में ‘दि क्रूशियल ईयर्स’ नाम की किताब लिखी है. राजेश्वर ने इसकी पुष्टि की है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सिद्धार्थ शंकर रे ने ही आपातकाल का सुझाव दिया था. 2010 में उनका निधन हो गया था. जिन लोगों की गिरफ्तारी की जानी थी उनकी लिस्ट भी पीएम हाउस में ही बनी थी.

संघ ने इमर्जेंसी का किया था समर्थन, स्वयंसेवकों ने माँगी थी माफी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस का दावा है कि उसने आपातकाल का बहादुरी के साथ मुक़ाबला किया और भारी दमन का सामना किया। उस दौर के अनेक कथानक हैं, जो आरएसएस के इन दावों को झुठलाते हैं। यहाँ हम ऐसे दो दृष्टांतों का उल्लेख कर रहे हैं। इनमें से एक वरिष्ठ पत्रकार और विचारक प्रभाष जोशी हैं और दूसरे, पूर्व खुफिया ब्यूरो (आईबी) के उप प्रमुख टी. वी. राजेश्वर है। आपातकाल जिस समय घोषित किया गया था राजेश्वर आईबी के उप प्रमुख थे। माफ़ीनामे पर जेल से छूटे – राजेश्वर ने बताया कि किस तरह आरएसएस ने इंदिरा गांधी के दमनकारी शासन के सामने घुटने टेक दिए थे और इंदिरा गांधी एवं उनके पुत्र संजय गांधी को 20-सूत्री कार्यक्रम पूरी वफ़ादारी के साथ लागू करने का आश्वासन था। आएसएस के अनेक ‘स्वयंसेवक’ 20-सूत्री कार्यक्रम को लागू करने के रूप में माफ़ीनामे पर दस्तख़त कर जेल से छूटे थे। दिलचस्प बात यह है कि आरएसएस के ऐसे लोग आपातकाल के दौरान उत्पीड़न के एवज़ में आज मासिक पेंशन ले रहे हैं। बीजेपी शासित राज्यों, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में उन लोगों को 10,000 रुपये मासिक पेंशन देने का फैसला लिया गया है जिन्हें आपातकालीन के दौरान एक महीने से अधिक समय तक जेल में रखा गया था। आरएसएस से जुड़े जो लोग इस दौरान एक माह से कम अवधि के जेल गए थे उन्हें बतौर 5,000 रुपये पेंशन देना तय किया गया है। इस नियम में उन ‘स्वयंसेवकों’ का ख्याल रखा गया है, जिन्होंने केवल एक या दो महीने जेल में रहने के बाद घबरा कर दया याचिका पेश करते हुए माफ़ीनामे पर हस्ताक्षर कर दिए थे। इंदिरा को देवरस की चिट्ठी – प्रभाश जोशी का लेख अंग्रेजी साप्ताहिक ‘तहलका’ में आपातकाल की 25 वीं वर्षगांठ पर छपा थाi। उनके मुताबिक़, ‘उस समय के आरएसएस प्रमुख बालासाहेब देवरस ने संजय गांधी के कुख्यात 20-सूत्री कार्यक्रम को लागू करने में सहयोग  करने के लिए इंदिरा गांधी को एक पत्र लिखा था। यह है आरएसएस का असली चरित्र…आप उनके काम करने के अंदाज़ और तौर तरीकों को देख सकते हैं।’ आपातकाल के दौरान, आरएसएस और जनसंघ के कई लोग माफ़ीनामा देकर जेलों से छूटे थे। माफ़ी मांगने में वे सबसे आगे थे। उनके नेता ही जेलों में रह गए थे जैसे कि अटल बिहारी वाजपेयी, एल. के. आडवाणी, अरुण जेटली आदि। प्रभाष जोशी, दिवंगत पत्रकार । प्रभाष जोशी ने आगे लिखा, ‘आरएसएस ने आपातकाल लागू होने के बाद उसके ख़िलाफ़ किसी प्रकार का कोई संघर्ष नहीं किया। तब, भाजपा आपात काल के खिलाफ संघर्ष की याद को अपनाने की कोशिश क्यों कर रही है’ टी.वी. राजेश्वर नौकरी से रिटायर होने के बाद उत्तर प्रदेश और सिक्किम के राज्यपाल रहे हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘इंडिया: द क्रूशियल इयर्स’ में इस तथ्य की पुष्टि की है। वह (आरएसएस) न केवल इसका (आपातकाल) का समर्थन कर रहे थे, वह श्रीमती गांधी के अलावा संजय गांधी के साथ संपर्क स्थापित करना चाहते थे। टी. वी. राजेश्वर की किताब इंडिया: द क्रूशियल इयर्स’ का अंश । इंदिरा से गोपनीय संपर्क – राजेश्वर ने मशहूर पत्रकार, करण थापर के साथ एक मुलाकात में खुलासा किया कि देवरस ने ‘गोपनीय तरीके से प्रधानमंत्री आवास के साथ संपर्क बनाया और देश में अनुशासन लागू करने के लिए सरकार ने जो सख़्त कदम उठाए थे उनमें से कई का मजबूती के साथ समर्थन किया था।’ देवरस श्रीमती गांधी और संजय से मिलने के इच्छुक थे। लेकिन श्रीमती गांधी ने इनकार कर दिया।…संजय गांधी के परिवार नियोजन अभियान और इसे विशेष रूप से मुसलमानों के बीच लागू करने के प्रयासों को देवरस का भरपूर समर्थन हासिल था। देवरस ने की इंदिरा की तारीफ़ – राजेश्वर ने यह तथ्य भी साझा किया है कि आपातकाल के बाद भी ‘संघ (आरएसएस) ने आपातकाल के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस को अपना समर्थन विशेष रूप से व्यक्त किया था।’ यह खास तौर पर गौरतलब है कि जो सुब्रमण्यम स्वामी अब आरएसएस के प्यारे हैं, उन्होंने भी कहा था कि आपातकाल के दौरान आरएसएस के अधिकांश वरिष्ठ नेताओं ने आपातकाल के ख़िलाफ़ संघर्ष के साथ गद्दारी की थी। आरएसएस के तीसरे सरसंघचालक, मधुकर दत्तात्रय देवरस ने आपातकाल लगने के दो महीने के भीतर इंदिरा गांधी को पहला पत्र लिखा था। यह वह समय था जब राजकीय आतंक चरम पर था। देवरस ने अपने पत्र दिनांक 22 अगस्त, 1975 की शुरुआत ही इंदिरा की प्रशंसा के साथ की। मैंने 15 अगस्त, 1975 को रेडियो पर लाल किले से देश के नाम आपके संबोधन को जेल (यरवदा जेल) में सुना था। आपका यह संबोधन संतुलित और समय के अनुकूल था। इसलिए मैंने आपको यह पत्र लिखने का फ़ैसला किया। (मधुकर दत्तात्रय देवरस, आरएसएस के तीसरे सरसंघचालक) – संजय को देवरस का ख़त इंदिरा गांधी ने देवरस के इस पत्र को जवाब नहीं दिया। देवरस ने 10 नवंबर, 1975 को इंदिरा को एक और पत्र लिखा। इस पत्र की शुरुआत उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के ख़िलाफ़ दिए गए निर्णय के लिए बधाई के साथ की। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनको चुनाव में भ्रष्ट साधनों के उपयोग का दोषी मानते हुए पद के अयोग्य करार दिया था। देवरस ने इस पत्र में लिखा, ‘सुप्रीम कोर्ट के सभी पांच न्यायाधीशों ने आपके चुनाव को संवैधानिक घोषित कर दिया है, इसके लिए हार्दिक बधाई।’ आरएसएस का नाम जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के साथ अन्यथा जोड़ दिया गया है। सरकार ने अकारण ही गुजरात आंदोलन और बिहार आंदोलन के साथ भी आरएसएस को जोड़ दिया है…संघ का इन आंदोलनों से कोई संबंध नहीं है। (संजय गांधी को लिखी देवरस की चिट्ठी का अंश) – देवरस की चिट्ठी बिनोवा भावे को इंदिरा गांधी के जवाब नहीं देने के बाद देवरस ने विनोबा भावे से संपर्क किया जिन्होंने आपातकाल का आध्यात्मिक समर्थन किया था और इंदिरा गांधी का पक्ष लिया था। देवरस ने अपने पत्र दिनांक 12 जनवरी, 1976 में, आचार्य विनोबा भावे से गिड़गिड़ाते हुए आग्रह किया कि आरएसएस पर प्रतिबंध हटाए जाने के लिए वे इंदिरा गांधी को सुझाव दें। भावे ने भी पत्र का जवाब नहीं दिया, हताश देवरस ने उन्हे एक और पत्र लिखा। अखबारों में छपी सूचनाओं के अनुसार प्रधान मंत्री (इंदिरा गांधी) 24 जनवरी को वर्धा पवनार आश्रम में आपसे मिलने आ रही हैं। उस समय देश की वर्तमान परिस्थिति के बारे में उनकी आपके साथ चर्चा होगी। मेरी आपसे याचना है कि प्रधानमंत्री के मन में आरएसएस के बारे में जो गलत धारणा घर कर गई है आप कृपया उसे हटाने की कोशिश करें ताकि आरएसएस पर लगा प्रतिबंध हटाया जा सके और जेलों में बंद आरएसएस के लोग रिहा होकर प्रधानमंत्री के नेतृत्व में प्रगति और विकास में सभी क्षेत्रों में अपना योगदान कर सकें। (बिनोवा भावे को लिखी देवरस की चिट्ठी का अंश) आरएसएस का पुराना चलन है कि वह हुक़्मरानों के पाले में रहता आया है, निरंकुश शासन का हिमायती रहा है। यही वजह है कि आरएसएस के किसी भी नेता ने जंग-ए-आज़ादी में भी कोई शिरक़त नहीं की। ऐसे मे आज आरएसएस और बीजेपी के लोग ये किस मुँह से कह सकते हैं कि आरएसएस ने आपातकाल के दमन का सामना जम कर किया था। दस्तावेजी सबूत है कि आरएसएस ने आपातकाल का समर्थन किया था (अनिल जैन) – आपातकाल के साढ़े चार दशक पूरे होने के मौके पर कई लोगों ने मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए भारतीय लोकतंत्र के उस त्रासद और शर्मनाक काल खंड को अलग-अलग तरह से याद किया। याद करने वालों में ऐसे लोग हैं ही, जो आपातकाल के दौरान पूरे समय जेल में रहे थे या भूमिगत रहते हुए आपातकाल विरोधी संघर्ष में जुटे हुए थे। मगर आपातकाल को उन लोगों ने भी बढ़-चढ़कर याद किया, जो उस दौर में अपनी गिरफ्तारी के चंद दिनों बाद ही माफ़ीनामा लिखकर जेल से बाहर आ गए थे, ठीक उसी तरह, जिस तरह विनायक दामोदर सावरकर अंग्रेजों से माफी मांग कर जेल से बाहर आए थे। आपातकाल के दौरान सरकार से माफी मांग कर जेल से बाहर आने वालों ने अपने माफ़ीनामे में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बीस सूत्रीय और उनके बेटे संजय गांधी के पांच सूत्रीय कार्यक्रम का समर्थन करते हुए वादा किया था कि वे भविष्य में किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे। ऐसा करने वालों में सर्वाधिक लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस और तत्कालीन जनसंघ आज की भाजपा से जुड़े हुए थे। कई सरकारी और गैर सरकारी दस्तावेजों में दर्ज इस तथ्य के बावजूद आरएसएस में दीक्षित हुए भाजपा महासचिव राम माधव ने बेशर्मी के साथ दावा किया कि देश में लोकतंत्र इसलिए बचा हुआ है, क्योंकि आज सरकार चला रहे नेता उनमें से हैं, जिन्होंने आपातकाल के खिलाफ दूसरी आजादी की लड़ाई लड़ी थी। वे नेता लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति किसी मजबूरी की वजह से नहीं बल्कि एक धर्म सिद्धांत के तौर पर समर्पित हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने भी आपातकाल को याद करते हुए कहा कि वह दौर कभी भुलाया नहीं जा सकता। हालांकि मोदी और शाह न तो उस दौर में जेल गए थे और न ही आपातकाल विरोधी किसी संघर्ष से उनका कोई जुड़ाव था। अमित शाह की तो उस समय उम्र ही 10-12 वर्ष के आस पास रही होगी। बहरहाल राम माधव जो दावा कर रहे हैं,  उसे फर्जी साबित करने वाले कई तथ्य हैं, लेकिन यहां सिर्फ आरएसएस के तीसरे और तत्कालीन सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस उर्फ बाला साहब देवरस के उन पत्रों का उल्लेख करना ही पर्याप्त होगा, जो उन्होंने आपातकाल लागू होने के कुछ ही दिनों बाद जेल में रहते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और सर्वोदयी नेता आचार्य विनोबा भावे को लिखे थे। उन्होंने यरवदा जेल से इंदिरा गांधी को पहला पत्र 22 अगस्त, 1975 को लिखा था, जिसकी शुरुआत इस तरह थी:  ”मैंने 15 अगस्त, 1975 को रेडियो पर लाल क़िले से राष्ट्र के नाम आपके संबोधन को यहां कारागृह (यरवदा जेल) में सुना था। आपका यह संबोधन संतुलित और समय के अनुकूल था। इसलिए मैंने आपको यह पत्र लिखने का फ़ैसला किया।’’ इंदिरा गाँधी ने देवरस के इस पत्र को जवाब नहीं दिया। देवरस ने 10 नवंबर, 1975 को इंदिरा गांधी को एक और पत्र लिखा। इस पत्र की शुरुआत उन्होने सुप्रीम कोर्ट द्बारा इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ दिए गए फैसले के लिए बधाई के साथ की। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी को चुनाव में भ्रष्ट साधनों के उपयोग का दोषी मानते हुए पद के अयोग्य क़रार दिया था। देवरस ने इस पत्र में लिखा- ”सुप्रीम कोर्ट के सभी पाँच न्यायाधीशों ने आपके चुनाव को संवैधानिक घोषित कर दिया है, इसके लिए हार्दिक बधाई।’’ गौरतलब है कि विपक्ष का दृढ मत था कि यह फैसला कांग्रेस सरकार के दबाव में दिया गया था। देवरस ने अपने इस पत्र मे यहाँ तक कह दिया- ”आरएसएस का नाम जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के साथ अन्यथा जोड़ दिया गया है। सरकार ने अकारण ही गुजरात आंदोलन और बिहार आंदोलन के साथ भी आरएसएस को जोड़ दिया है… संघ का इन आंदोलनों से कोई संबंध नहीं है…।’’ चूंकि इंदिरा गाँधी ने देवरस के इस पत्र का भी जवाब नहीं दिया। इसलिए आरएसएस प्रमुख देवरस ने विनोबा भावे से संपर्क साधा, जिन्होंने आपातकाल को अनुशासन पर्व की संज्ञा देते हुए उसका समर्थन किया था। देवरस ने दिनांक 12 जनवरी, 1976 को लिखे अपने पत्र में विनोबा भावे से आग्रह किया कि आरएसएस पर प्रतिबंध हटाए जाने के लिए वे इंदिरा गाँधी को सुझाव दें। विनोबा भावे ने भी देवरस के पत्र का जवाब नहीं दिया। हताश देवरस ने विनोबा एक और पत्र लिखा जिस पर तिथि अंकित नहीं है। उन्होंने लिखा- ”अख़बारों में छपी सूचनाओं के अनुसार प्रधानमंत्री (इंदिरा गाँधी) 24 जनवरी को वर्धा, पवनार आश्रम में आपसे मिलने आ रही हैं। उस समय देश की वर्तमान परिस्थिति के बारे में उनकी आपके साथ चर्चा होगी। मेरी आपसे याचना है कि प्रधानमंत्री के मन में आरएसएस के बारे में जो ग़लत धारणा घर कर गई है, आप कृपया उसे हटाने की कोशिश करें, ताकि आरएसएस पर लगा प्रतिबंध हटाया जा सके और जेलो मे बंद आरएसएस के लोग रिहा होकर प्रधानमंत्री के नेतृत्व में देश की प्रगति के लिए सभी क्षेत्रों में अपना योगदान कर सकें।’’  विनोबा ने देवरस के इस पत्र का भी कोई जवाब नहीं दिया। यह भी संभव है कि दोनों ही पत्र विनोबा जी तक पहुंचे ही न हों। जो भी हो, इंदिरा गांधी और विनोबा जी को लिखे गए ये सभी पत्र देवरस की पुस्तक ‘हिंदू संगठन और सत्तावादी राजनीति’ में परिशिष्ट के तौर पर शामिल हैं। इस पुस्तक का प्रकाशन जागृति प्रकाशन, नोएडा ने किया है। बहरहाल, इंदिरा गांधी और आचार्य विनोबा को लिखे देवरस के पत्रों से यह तो जाहिर होता ही है कि आरएसएस आधिकारिक तौर पर आपातकाल विरोधी संघर्ष में शामिल नहीं था। संगठन के स्तर पर आपातकाल का समर्थन करने और सरकार को सहयोग देने की उसकी औपचारिक पेशकश जब बेअसर साबित हुई तो आरएसएस के जो कार्यकताã गिरफ्तार कर लिए गए थे, उन्होंने व्यक्तिगत तौर माफीनामे देकर जेल से छूटने का रास्ता अपनाया। ऐसे सारे लोग आज अपने-अपने प्रदेशों में राज्य सरकार से मीसाबंदी के नाम पर 10 से 25 हजार रुपए तक की मासिक पेंशन लेकर डकार रहे हैं। पेंशन लेने वालों में कई सांसद, विधायक और मंत्री भी शामिल हैं। आपातकाल के दौरान आरएसएस के कई स्वयंसेवक तो इतने ‘बहादुर’ निकले कि उन्होंने आपातकाल लगते ही गिरफ्तारी से बचने और अपनी राजनीतिक पहचान छुपाए रखने के लिए अपने घरों में दीवारों पर टंगी हेडगेवार, गोलवलकर और सावरकर की तस्वीरें भी उतार कर नष्ट कर उनके स्थान पर इंदिरा गांधी और संजय गांधी की तस्वीरें लटका ली थीं। ऐसे लोगों ने अपनी राजनीतिक पहचान तब तक जाहिर नहीं होने दी थी, जब तक कि लोकसभा के चुनाव नहीं हो गए थे और जनता पार्टी की सरकार नहीं बन गई थी। इस तरह के तमाम लोगों ने भी आपातकाल को उसकी 45वीं बरसी पर याद करते हुए सोशल मीडिया पर बड़ी शान से बताया कि वे भी आपातकाल विरोधी संघर्ष में शामिल थे। बहरहाल, उन लोगों के संघर्ष को सलाम, जो तानाशाही हुकूमत के सामने झुके या टूटे बगैर जेल में रहे या वास्तविक तौर पर भूमिगत रहते हुए लोकतंत्र को बचाने के संघर्ष में जुटे रहे और जिसकी वजह से उनके परिजनों ने तरह-तरह की दुश्वारियों का सामना किया। (अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।) जो आज दूसरों को ‘एंटी नेशनल’बता रहे हैं, कभी वे भी ‘देशद्रोही’हुआ करते थे । एंटी-नेशनल, भारत विरोधी जैसे शब्द आपातकाल के सत्ताधारियों की शब्दावली का हिस्सा थे. आज कोई और सत्ता में है और अपने आलोचकों को देश का दुश्मन बताते हुए इसी भाषा का इस्तेमाल कर रहा है. इन दिनों ‘राष्ट्र-विरोधी’ यानी एंटी-नेशनल हर जगह हैं, और हर दिन भाजपा का एक प्रवक्ता या किसी व्यावसायिक चैनल के एंकर भारत इनकी पहचान कराता पाया जाता है. लेकिन वे भी ‘राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों’ की असली हद और इतिहास के बारे में आपको कुछ नहीं बताते हैं- क्योंकि यह शब्द इस देश में एक बार पहले भी चर्चा में रह चुका है. आपातकाल के दौर में इस शब्द का इस्तेमाल सरकार का विरोध करनेवाले कार्यकर्ताओं, ख़ासतौर पर विदेशी चंदा पानेवालों, बुद्धिजीवियों और नई दिल्ली में सत्ता के दुरुपयोग का पर्दाफ़ाश करनेवाले प्रेस पर निशाना साधने के लिए किया जाता था. यह एक अलग इतिहास है, जिसके बारे में हमें नहीं पढ़ाया जाता है. यह धमकियों और आक्षेपों का इतिहास है जो हमें एक सवाल की ओर लेकर जाता है. ‘एंटी-नेशनल’ होने का आरोप हमें आरोप लगाए जाए जानेवाले के बारे में ज्यादा बताता है या उनके बारे में बताता है, जो यह आरोप लगाते हैं? एक नेता, जिन्हें ‘एंटी-नेशनल’ और ‘विदेशी एजेंट’ शब्द से प्यार है, वे हैं सुब्रमण्यम स्वामी. वे राज्यसभा के सांसद हैं और 1974 से- जिस साल पूरे उत्तर भारत में जेपी आंदोलन के बढ़ते हुए विरोध प्रदर्शनों की धमक दिखाई दी थी- अब तक संसद के भीतर और बाहर रहे हैं. 1974 को एक ऐसे साल के तौर पर भी याद किया जा सकता है जब हम ‘विदेशी हाथ’ पद को राष्ट्रीय बहस के भीतर खूब इस्तेमाल होता देखते हैं. अगर इंदिरा गांधी की बातों पर यक़ीन करें, तो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के पीछे विदेशी खुफ़िया एजेंसियों, खासतौर पर सीआईए का हाथ था, जिसका वामपंथी सरकारों को अस्थिर करने का इतिहास था, जैसा कि इसने चिली और ईरान में किया था (तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन भी कुख्यात तरीके से इंदिरा गांधी के प्रति शत्रुतापूर्ण भाव रखते थे और ऐसा बांग्लादेश युद्ध से पहले से था) 25 जून, 1975 को जयप्रकाश नारायण (जेपी) का विरोध आंदोलन दिल्ली तक पहुंच गया जिसका मकसद चुनी हुई राष्ट्रीय सरकार को गद्दी से उतार फेंकना था. उस सुबह, प्रधानमंत्री ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे को सूचना दी कि भारतीय एजेंसियों को विरोध आंदोलन और सीआईए के बीच रिश्तों का पता चला है. उसी रात आपातकाल का ऐलान कर दिया गया. इसके साथ ही हजारों विपक्षी कार्यकर्ताओं, जिनमें वाम और दक्षिण दोनों धड़े के लोग शामिल थे, को हिरासत में ले लिया गया; कई भूमिगत हो गए. कुछ लोग आपातकाल के खिलाफ़ प्रतिरोध को संगठित करने के लिए भारत में ही रुक गए; कुछ विदेश भाग गए. ‘सच के तस्कर’ – इसके बाद के चार दशकों में संघ ने (वाम के उलट) भारत के भीतर अपने प्रतिरोध का एक रंगीन मिथक रचा है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) आपातकाल के विरोध में उतने का दावा करता है और यह प्रचार करता है कि इसके सदस्यों ने गिरफ्तारियां दी थीं. लेकिन ऐसे दावों के लिए ठोस साक्ष्यों का अभाव है, क्योंकि अखबारों को हड़तालों और जुलूसों की खबर करने से रोक दिया गया था. दूसरी तरफ ऐसे दावे भी हैं, जो संघ की ऐसी किसी भूमिका को सिरे से नकार देते हैं. खुद सुब्रमण्यम स्वामी ने वर्ष 2000 में लिखा था कि ‘भाजपा/आरएसएस के ज्यादातर नेताओं ने आपातकाल के ख़िलाफ़ संघर्ष के साथ विश्वासघात किया था.’ और ‘राष्ट्र का दमन करनेवालों के लिए काम करने की पेशकश की थी.’ स्वामी ने अटल बिहारी वाजपेयी और आरएसएस प्रमुख बालासाहेब देवरस का नाम लेकर कहा था कि इन्होंने जेल से इंदिरा गांधी को माफीनामा लिखा था. स्वामी ने विदेश में रहकर संघर्ष चलाया और जेल जाने से बचे रहे.उनके अपने शब्दों में अनिवासी भारतीय ‘विपक्ष को बदनाम करने के लिए तत्कालीन सरकार द्वारा चलाए जा रहे अभियान से डरे हुए थे’ और उन्हें विपक्ष की आवाज़ों की जरूरत थी ताकि वे यह समझ सकें कि आख़िर भारत में चल क्या रहा है? दिसंबर, 1975 में स्वामी लंदन पहुंचे और केन्या, यूनाइटेड किंगडम और उत्तर अमेरिका में फैले कार्यकर्ताओं के उस नेटवर्क का हिस्सा बन गए, जो विदेशी सरकारों, विचारकों, पत्रकारों के साथ मिलकर भारत में सत्ता के अपहरण का पर्दाफ़ाश करने का अभियान चला रहा था. लंदन में संघ के और निर्वासित मकरंद देसाई के शब्दों में, ‘वे सच के तस्कर थे.’ आपातकाल के खि़लाफ़ उनका सबसे अच्छा हथियार नकारात्मक प्रेस था. शुरुआत में द न्यूयॉर्क टाइम्स और लंदन के द टाइम्स  ने जेपी को जेल से रिहा करनेवाले विज्ञापनों को छापा था, जिस पर दर्जनों पश्चिमी बुद्धिजीवियों और मुख्य तौर पर वामपंथी रुझान रखनेवाली सार्वजनिक हस्तियों के दस्तख़त थे. हालांकि, संपादकीय प्रस्तुतियों में अभी भी अक्सर प्रधानमंत्री के प्रति नरमी दिखाई दे रही थी. आपातकाल के दो महीने पूरे होने पर अमेरिका के चार प्रमुख पत्रकार, जिनमें न्यूयॉर्क टाइम्स और द न्यूयॉर्कर  के  भी पत्रकार शामिल थे, एनबीसी के कार्यक्रम ‘मीट द प्रेस’ के लिए प्रधानमंत्री का इंटरव्यू लेने और सहानुभूति के साथ उनका पक्ष सुनने के लिए भारत आए. उसी सप्ताह आईं सुर्खियां ‘अब श्रीमती गांधी अर्थव्यवस्था को अपने हिसाब से चला सकती हैं’ (मिसेज़ गांधी कैन नाउ डू व्हाट शी वॉन्ट्स विद द इकोनॉमी) की तर्ज पर थीं. इसकी तुलना छह महीने बाद न्यूयॉर्क टाइम्स की सुर्खियों से की जा सकती है, जब विदेशों में आपातकाल के ख़िलाफ़ माहौल तैयार होने लगा था. 5 फरवरी, 1976 ‘भारत : बढ़ रहा है दमन’ (इंडिया : मोर रिप्रेशन) 30 अप्रैल, 1976 भारत में धुंधलाती आशा’ (फेडिंग होप इन इंडिया) 2 जून, 1976 ‘राइट्स लीग ने संयुक्त राष्ट्र को कहा : भारत अधिकारों को कुचल रहा है’ (राइट्स लीग टेल्स द यू.एन : इंडिया ट्रैम्पल्स ऑन फ्रीडम) –

[28/06, 6:37 pm] ADV. Badgaiyan: आपातकाल विरोधी आंदोलन से आरएसएस की ग़द्दरी – आरएसएस की त्रासदी यह है कि भारत में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था अभी तक क़ायम है। यही उसकी विवशता है। हालांकि वह नग्न तानाशाही का कट्टर हिमायती है परंतु उसे अपनी इस असलियत को छुपाने के लिए मुखौटे लगाने पड़ते हैं । भारत में आपातकाल घोषणा की 44वीं वर्षगांठ : आपातकाल विरोधी आंदोलन से आरएसएस की ग़द्दारी4वीं वर्षगांठ : आपातकाल विरोधी आंदोलन से आरएसएस की ग़द्दारी

भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (Prime Minister Indira Gandhi) ने 25-26 जून, 1975 को देश में आंतरिक आपातकाल घोषित किया था। यह 19 महीने तक लागू रहा। इस दौर को भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति में काले दिनों के रूप में याद किया जाता है। इंदिरा गांधी का दावा था कि जयप्रकाश नारायण ने सशस्त्र बलों से कहा था कि कांग्रेस शासकों के ‘अवैध’ आदेशों को नहीं मानें (Jaiprakash Narayan’s call to the armed forces to disobey the ‘illegal’ orders of Congress rulers)। इसने देश में अराजकता की स्थिति उत्पन्न कर दी और भारतीय गणतंत्र का अस्तित्व खतरे में पड़ गया था। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल घोषित (Emergency under article 352 of the Constitution) करने के अतिरिक्त कोर्इ विकल्प नहीं रह गया था ।आरएसएस का दावा (RSS claims) है कि उसने इंदिरा गंधी द्वारा घोषित आपातकाल  का बहादुरी के साथ मुकाबला किया और भारी दमन का सामना किया। बहरहाल, उस दौर के अनेक कथानक हैं, जो आरएसएस के इन दावों को झुठलाते हैं। यहां हम ऐसे दो दृष्टांतों का उल्लेख कर रहे हैं। इनमें से एक वरिष्ठ भारतीय पत्रकार और विचारक प्रभाश जोशी हैं और दूसरे, पूर्व खुफिया ब्यूरो (आईबी) प्रमुख टीवी राजेश्वर हैं, जिनके द्वारा बतार्इ घटनाओं का जिक्र हम यहां करेंगे। आपातकाल जिस समय घोषित किया गया था

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