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2022 तय करेगा 2024 की दिशा और दशा बीजेपी में ही मोदी के वैकल्पिक चेहरे को तलाशने और तराशने की सोच के साथ आरएसएस ने शुरू किया मंथन !

कलयुग की कलम

2022 तय करेगा 2024 की दिशा और दशा

बीजेपी में ही मोदी के वैकल्पिक चेहरे को तलाशने और तराशने की सोच के साथ आरएसएस ने शुरू किया मंथन !

देश को प्रधानमंत्रियों की लम्बी फेहरिस्त देने वाला उत्तरप्रदेश एकबार फिर देश को प्रधानमंत्री देने के लिए ताने बाने बुन रहा है । 2024 में होने वाले आम चुनाव में दिल्ली के लिए सेफ कॉरिडोर गुजरात की जगह उत्तरप्रदेश से बनाये जाने के लिए शह और मात की चौसर बिछाने की पूरी तैयारी कर ली गई है तथा उसके संकेत भी मिलने शुरू हो गए हैं । जैसे जैसे 2024 नजदीक आयेगा तस्वीरें साफ होने लगेंगी । बहुत कुछ तस्वीर तो 2022 में होने वाले उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव परिणाम साफ कर देंगे ।

दिल्ली इस बात को भांप और समझकर लखनऊ पर नकेल कसने में लग गई है मगर अभी तक के परिणाम बता रहे हैं कि दिल्ली उत्तरप्रदेश की सियासत में कहीं टिक नहीं पा रही है । लखनऊ के सामने दिल्ली का रंग फीका पड़ता दिखाई दे रहा है । आरएसएस का मानना है कि 2024 को लेकर जो भी राजनैतिक गलियारा दिल्ली के लिए उत्तरप्रदेश से निकले उसकी हर गली में उत्तरप्रदेश की अपनी सियासत और संघ की अपनी सोच हो । जबकि दिल्ली चाहती है कि उत्तरप्रदेश में संगठन उसी के कहे पर चले, मुख्यमंत्री का चेहरा भी वही तय करे और आखिरी के बचे चंद महीनों में सरकार भी उसी के ईशारे पर नाचे । इसके लिए जो बिसात बिछाई जा रही है उसमें दिल्ली कहीं फिट बैठती दिखाई नहीं दे रही है ।

जिसकी पहली झलक तब दिख गई जब गुजरात कैडर के नौकरशाह ए के शर्मा ने नरेन्द्र मोदी के भरोसे वी आर एस लेकर वजीर बनने की खातिर राजनीति में एंट्री की मगर योगी आदित्यनाथ ने उसे प्यादा बनाकर रख दिया । कहां तो मोदी ने अपने विश्वासपात्र ए के शर्मा को उत्तरप्रदेश की सरकार में डिप्टी सीएम बनने के लिए भेजा था मगर योगी ने उसे संगठन में उपाध्यक्ष बना दिया । इसके पहले भी 14 उपाध्यक्ष लाईन में लगे हुए हैं । सभी जानते हैं कि संगठन में उपाध्यक्ष की क्या औकात होती है ।

दूसरी झलक तब दिखी जब योगी आदित्यनाथ से नाराज चल रहे ब्राम्हण वोटरों को साधने के लिए जतिन प्रसाद को ब्राम्हण चेहरे के तौर पर भाजपा में शामिल किया गया । यहां भी योगी ने जतिन प्रसाद को दो टूक सन्देश दिया कि आप दिल्ली के ईशारे पर या हमारे साथ ! अगर हमारे साथ तो भूल जाइये कि आप ब्राम्हण चेहरा हैं, भूल जाइये आपको मंत्री बनना है । हम आपको आपके चेहरे के साथ आगे बढ़ाएंगे । फिलहाल घर घर योजना पर काम करिये ।

इन दोनों परिस्थितियों ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि दिल्ली जिस किसी भी प्यादे को वजीर बनाने की खातिर लखनऊ भेजेगा, वजीर की सोच लिए हुए वह शख्स योगी के दरबार में आते ही फिर से प्यादा बना दिया जायेगा ।

गत दिनों सीएम योगी आदित्यनाथ ने दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष जयप्रकाश नड्डा के साथ अलग – अलग मुलाकात की । उनमें योगी ने साफ तौर पर संकेत दे दिए कि सरकार यही रहेगी, मुख्यमंत्री भी वही रहेंगे, मंत्रिमंडल विस्तार भी उनकी सोच के अनुकूल ही होगा, किसी को भी पैरासूट से उतारने पर लोकतांत्रिक तरीके को दरकिनार कर न तो सरकार में शामिल किया जायेगा और न ही राज्य को इस तरह का संदेश दिया जायेगा ।

इससे स्पष्ट होता है कि जब 2022 का चुनाव योगी के चेहरे के आसरे ही लड़ा जाएगा । दूसरे राज्यों में भले ही बीजेपी ने बतौर मुख्यमंत्री किसी के चेहरे को सामने नहीं रखा हो और यूपी में भी नहीं रखने की मंशा हो तो भी यह जान लीजिये यदि भाजपा जीतती है तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ही होगा ।

योगी आदित्यनाथ ने युवा वाहिनी को जाग्रत कर आरएसएस को भी संदेश देने की कोशिश की है कि उत्तरप्रदेश में लोगों का आक्रोश योगी से ज़्यादा मोदी को लेकर है । लोगों का मानना है कि उनकी जिंदगी के साथ खिलवाड़ किया गया है । योगी अब ऐसी चीजों को डेव्हलप करने की कोशिश में लगे हैं कि सारा गुस्सा, सारे आरोप प्रत्यारोप दिल्ली की तरफ शिप्ट हो जायें । इसीलिए सरकार की आखिरी पारी खेलते हुए योगी लगातार यह मैसेज देने से नहीं चूक रहे कि राज्य में पार्टी उनका कहना नहीं मानती, संगठन उनका कहना नहीं मानता, 80 प्रतिशत कैबिनेट उनकी बात नहीं सुनता ।

इन सब परिस्थितियों पर गौर किया जाय तो यह निकलकर सामने आता है कि क्या योगी वाकई 2022 के विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहे हैं या फिर 2024 के आम चुनाव की ! और जब आरएसएस ने भी अपनी जमीन योगी को चौसर बिछाने और पांसे फेंकने के लिए मुक्त हस्त से दी है तो वह चौसर और पांसे 2022 के लिए फेंके जा रहे हैं या फिर 2024 के लिए !

आरएसएस मानता है कि संगठन की मजबूती बहुत जरूरी है मगर कार्यकर्ता रूठा हुआ है । बीजेपी का कार्यकर्ता भी बीजेपी से बहुत ज्यादा रूठा हुआ है । फिर भी आरएसएस के जहन में बहुत साफ है कि उत्तरप्रदेश का चुनाव हरहाल में जीतना है । आरएसएस के माथे पर हाल में सामने आए राममंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारियों द्वारा जमीन खरीदी घपले ने चिंता की लकीरें जरूर खींच दी है । उसे डर है कि अयोध्या इश्यू कहीं उनके खिलाफ ही न चला जाय ।

लाख टके का सवाल यह है कि क्या आस्थ वाकई इतना ध्रुवीकरण कर पायेगी क्योंकि जिन्होंने दिल्ली में जोरदार तरीके से इस मुद्दे को उठाया है वे न तो मुस्लिम हैं न ही यूपी के भीतर उनकी सियासत है । वह तो यूपी में सियासत कर रही पार्टी के नेताओं ने उस मुद्दे को लपक लिया है । मंदिर जमीन घोटाले को लेकर लखनऊ और दिल्ली के बीच जिस तरह की बेड़ियां – कड़ियां बनती चली गई और जब एक पुल बनाने की कोशिश की जाने लगी तो लखनऊ से तुरंत एक ही झटके में तीन संदेश निकलकर आये ।पहला मंत्रिमंडल विस्तार करेंगे। मगर इस पर जुलाई में सोचा जाएगा । लेकिन मंत्री कौन बनेगा, कैसे बनेगा इसमें आपकी जो दृष्टि है वह हमारी नहीं है । दूसरा जो भी व्यक्ति आएगा वह पार्टी और संगठन में जिस रूप में काम कर चुका होगा उसको तबज्जो देनी होगी । तीसरा जो बेसिक आधार रहा है बीजेपी और संघ परिवार का उसको दरकिनार नहीं किया जाएगा । इस नाम पर कि हम इन्वेस्टमेंट ले आयेंगे, डेव्हलपमेंट ले आयेंगे । अगर आपको गवर्नेंस चाहिए तो योगी के गवर्नेंस को समझिये ।

इन मैसेजेस ने चाहे – अनचाहे दिल्ली को यह भी संदेश दे दिया है कि यूपी चुनाव के दौरान आपकी भी नो एंट्री हो सकती है । ऐसी स्थिति बन सकती है कि जो चेहरे, पूरी कैबिनेट जिस तरीके से जहां भी चुनाव होते थे चाहे वह आसाम हो या बंगाल हो या फिर तमिलनाडु रहा हो नजर आते थे यूपी चुनाव में नजर न आवे ।

2024 के आम चुनाव के मद्देनजर आरएसएस यूपी के हर दरवाजे, हर कपाट को अपने तरीके से लगाने को तैयार है । आरएसएस इस पर भी चिंतन कर रही है कि यदि उत्तरप्रदेश के चुनावी नतीजे उसकी सोच के मुताबिक नहीं हुए तो फिर क्या होगा ? क्योंकि पिछले 7 सालों में उन मुद्दों, सरोकारों के साथ, जिन पर जनता सरकार से रूठी हुई है, आरएसएस खड़ी दिखाई नहीं दी है । उसने हमेशा खामोशी ही बरती है । जबकि अटल बिहारी बाजपेयी सरकार के दौर में आरएसएस और उसके अनुसांगिक संगठन जनता के साथ खड़े दिखाई देते थे लेकिन नरेन्द्र मोदी सरकार के दौर में किसी भी मंच पर, चाहे वह किसान मंच हो चाहे वह आदिवासी मंच हो, चाहे वह मध्यमवर्गीय मंच हो, चाहे वह बेरोजगारों का मंच हो या फिर चाहे वह इंड्रस्टी में काम करने वाले मजदूरों का मंच हो, दिखाई नहीं दिए ।

बीजेपी के साथ ही आरएसएस के संगठन भी दिल्ली के ईशारे के बिना कुछ भी करने का माद्दा खो चुके हैं ! तो फिर क्या आरएसएस उत्तरप्रदेश को एक ऐसी प्रयोगशाला में तब्दील करने की प्रक्रिया शुरू करने जा रही है जिससे योगी के माध्यम से दिल्ली (मोदी) के बल को धराशायी किया जा सके ।

वैसे भी बीजेपी का जो वर्चस्व 2015 – 16 तक था आज की तारीख में वो नहीं बचा है । 2014 के आम चुनाव के तत्काल बाद हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने हरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र में जीत हासिल की थी लेकिन आज की तारीख में वह केवल हरियाणा में सत्तानशी है वह भी अपने बलबूते नहीं । झारखंड और महाराष्ट्र में वह सत्ता से बाहर है । अपने ही साथी छिटककर दूर जा चुके हैं ।

आरएसएस इस बात पर भी चिंतन कर रहा है कि क्या वह अपने मूल उद्देश्यों से पथभ्रष्ट हो चुकी भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक शुचिता का पाठ पढ़ा सकेगा वह भी इस दौर में जब आरएसएस स्कूल से निकले नेता बिल्कुल खामोश हैं फिर चाहे वो कैबिनेट मिनिस्टर हों या स्टेट मिनिस्टर हों या फिर बीजेपी में पोस्ट होल्डर हों ।

2024 के आम चुनाव को ध्यान में रखकर उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए जिस तरह की बिसात बिछाई जा रही है उसमें संयोगवश नरेन्द्र मोदी के धुर विरोधी या यूं कहें नरेन्द्र मोदी जिसे अपना धुर विरोधी मानते हैं उन संजय जोशी की एंट्री हो जाय तो आश्चर्य नहीं होगा । कारण आरएसएस का भी यह मानना है कि उत्तरप्रदेश में संगठन और ब्राम्हणों को सम्हालने और साधने के लिए संजय जोशी की एंट्री क्यों न करा दी जाय !

सारे समीकरण यह बताने के लिए काफी हैं कि सारी कवायद 2022 में होने वाले उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के गलियारे चलकर 2024 के आम चुनाव को लेकर की जा रही है ।

यक्ष प्रश्न यही है कि क्या वाकई आज की तारीख में यूपी में योगी आदित्यनाथ का वैकल्पिक चेहरा कोई भी हो सकता है या फिर कोई नहीं ? इसी तरह 2024 तक आते – आते नरेन्द्र मोदी के वैकल्पिक चेहरे के तौर पर बीजेपी में कोई भी चेहरा नहीं है या फिर कोई भी चेहरा हो सकता है । आरएसएस भी इसी नब्ज़ को पकड़ कर चल रही है ।

 

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता

स्वतंत्र पत्रकार

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