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::::::::: रौशनी उलीच लो:::::::::::::

कलयुग की कलम

:::::::::: रौशनी उलीच लो:::::::::::::

खुश रहना भी सीखना पड़ता है

सोचता हूं कोई ऐसा भला कैसे करता है ?

तूफां तो सभी के जिंदगी में है

इससे बच निकलना ही बंदगी है ।

अजी अंधेरे कमरे में सूरज की रौशनी

भला कैसे आएगी ?

खुद बाहर निकल कर अपने लिए रौशनी उलीच लो ,

ये दुःख तकलीफ़ एक दिन भग

जाएगी ।

उस वक्त दिल कहेगा

सब कुछ तो कर सकता हूं मैं

यूं ही बेवजह रोता रहता था

शान से जी सकता हूं मैं ।

।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

डॉ.मन्तोष भट्टाचार्य

जबलपुर (म.प्र)

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