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2024 के 2022 और 2023 की बलि देने पर किया जा रहा है चिंतन और मंथन

कलयुग की कलम

2024 के 2022 और 2023 की बलि देने पर किया जा रहा है चिंतन और मंथन

2024 में लोकसभा के चुनाव होने हैं । नरेन्द्र मोदी की करिश्माई अगुवाई में 2014 और 2019 में देश की सत्ता पर काबिज़ हुई भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व ने 2024 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सत्ता पर कब्जा बरकरार रखने की संभावनाएं तलाशना शुरू कर दिया है ।

2014 और 2019 का मोदी तिलिस्म पूरी तरह टूट चुका है । देश को सम्हालने में नरेन्द्र मोदी बुरी तरह नाकामयाब हो चुके हैं । देश के आंतरिक हालात बाद से बदतर होते जा रहे हैं । बेरोजगारी, मंहगाई आसमान छू रहे हैं । देश की आर्थिक स्थिति पिछली अर्धशताब्दी में सबसे ज्यादा खराब है । रही सही कसर कोविड 19 की महामारी से निपटने की बदइंतजामियों ने पूरी कर दी है । अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने जिस तरह की भद्द मोदी के पिछले 3 वर्षों के दौरान पीटी है उसने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत के मुंह पर कालिख़ ही पोत दी है ।

पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व भले ही कठपुतलियों के हाथों हो फिर भी अंदरखाने हलचल शुरू हो गई है । नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व को चुनौती देने की चौसर बिछाई जाने लगी है । ऐसा नहीं है कि पार्टी में नरेन्द्र मोदी के विकल्प नहीं है । एक नहीं दर्जन भर प्रतिभावान विकल्प मौजूद हैं । मगर सब शतरंजी चाल को देख समझ रहे हैं ।

पिछले एक साल से उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को देखा और परखा जा रहा है । भारतीय जनता पार्टी की पित्रात्मक संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी अब मोदी के अहंकार से ऊबकर पीछा छुड़ाने के लिए योगी आदित्यनाथ को 2024 का चेहरा बनाने पर चिंतन और मंथन कर रही है ।

जनता को भृमित कर चुनाव जीतने के सारे तीर नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी चला चुकी है । छद्म राष्ट्रवाद अपना दम तोड़ रहा है । पिछले सात सालों से चालू धारावाहिक मन की बात से आम आदमी ऊब चुका है । चुनाव के पूर्व जवानों की हत्याओं से लेकर साम्प्रदायिक हत्याओं तक की अंदरुनी कहानी ने भारतीय जनता पार्टी की घिनौनी राष्ट्रवादिता की हकीकत आमजन के सामने उजागर करके रख दिया है ।

महाराष्ट्र में सत्ता गवांने के बाद जैसे – तैसे बिहार में इज्ज़त बची थी मगर पश्चिम बंगाल में हुई पार्टी की हार ने पार्टी को गहरे सदमे में डुबो दिया है । केन्द्रीय नेतृत्व जिस तरह राज्यपाल को मोहरा बनाकर ममता सरकार को अस्थिर करने की साजिशें रच रहा है उससे पार्टी की छबि दाग़दार ही हो रही है ।

नरेन्द्र मोदी, अमित शाह से लेकर पार्टी नेतृत्व और पितृ संगठन आरएसएस को भी एहसास होने लगा है कि 2024 का चुनाव नरेन्द्र मोदी के होते जा रहे बदनुमे चेहरे की दम पर किसी भी सूरतेहाल में नहीं जीता जा सकता है । नैया पार लगाने के लिए नए खेवनहार के साथ ही नए जन लुभावने नारों की दरकार है ।

2022 में उत्तरप्रदेश और 2023 में मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव होने हैं । स्वाभाविक है कि उत्तरप्रदेश के चुनाव मुख्यमंत्री रहते योगी आदित्यनाथ ने नेतृत्व में तथा मध्यप्रदेश का चुनाव मुख्यमंत्री रहते शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में लड़ा जाएगा ।

और अगर इन्होंने अपने अपने प्रदेश में पार्टी को फिर से सत्ता में वापिसी कराई तो निश्चित तौर पर दोनों राष्ट्रीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी की दरकती तस्वीर के स्थान पर अपनी तस्वीर लगाने का दावा पेश करेंगे ।

अगर ऐसा होता है तो पितृ संस्था आरएसएस योगी आदित्यनाथ और शिवराज में से किसी एक को आगे बढ़ा सकती है । ज्यादा संभावना योगी आदित्यनाथ को सपोर्ट करने की है ।

इस संभावित खतरे को ध्यान में रखकर ही मोदी शाह की जोड़ी उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के वर्तमानी मुख्यमंत्रियों की जगह ऐसे प्यादे फिट करने की कोशिश कर रही है जिससे 2024 के चुनाव में मोदी को चुनौती देने वाले साँप भी मर जायें और लाठी भी न टूटे ।

फिलहाल नेतृत्व परिवर्तन के लिए मोदी शाह को उत्तरप्रदेश से ज्यादा आसान मध्यप्रदेश है । जहां शिवराज को लेकर अंदरूनी खाने जबरदस्त विरोध है । सिंधिया और उनके पिछलग्गुओं को जिस तरह की हार्स ट्रेडिंग कर सत्ता हथियायी गई थी तभी मुख्यमंत्री को लेकर शिवराज को चुनौती दे दी गई थी । दमोह विधानसभा चुनाव की पराजय ने शिवराज नेतृत्व को चुनौती दे रहे विरोधियों को संजीवनी बूटी का काम किया है ।

प्रदेश की राजनीति में दाखिल होने के लिए छटपटा रहे प्रहलाद पटैल, मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए लगभग आऊटर पर खड़े कैलाश विजयवर्गीय, मुख्यमंत्री की कुर्सी का कौर हाथ से छिन जाने से व्यथित नरोत्तम मिश्रा और बिल्ली के भाग्य से छींका टूट जाने से प्रदेश अध्यक्ष बने विष्णुदत्त शर्मा की चौकड़ी ने शिवराज पर सत्ताई सांसों का संकट खड़ा कर दिया है ।

जिस तरह के राजनीतिक हालात मध्यप्रदेश की भाजपा में बनते दिख रहे हैं उससे इतना तो साफ़ नज़र आता है कि 2023 का विधानसभा चुनाव शिवराज के मुख्यमंत्री रहते तो नहीं ही लड़ा जायेगा । देखना दिलचस्प होगा कि ऊंट किस करवट बैठेगा ।

 

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता

स्वतंत्र पत्रकार

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