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सारा मुल्क पंसारी की दुकान नज़र आता है, ज़मीन से लेकर ज़मीर तक सब बिक रहा है

कलयुग की कलम

सारा मुल्क पंसारी की दुकान नज़र आता है, ज़मीन से लेकर ज़मीर तक सब बिक रहा है

भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी का प्रस्ताव था कि किसी भी जज को रिटायर होने और उन्हें नया पद दिए जाने के बीच कम से कम दो साल का कूलिंग ऑफ पीरियड होना चाहिए । ऐसा नहीं हुआ तो सरकारों को न्यायपालिका को प्रभावित करने का मौका मिल जायेगा और निष्पक्ष न्यायपालिका महज एक सपना बन कर रह जायेगी ।

जस्टिस अरुण मिश्रा की राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग अध्यक्ष पद पर की गई ताजपोशी की आलोचना मुख्यतया तीन पहलुओं पर की जा रही है । पहला – सुप्रीम कोर्ट के ऐसे रिटायर जज जिन्होंने बड़े संवैधानिक मामलों की सुनवाई में सरकार का साथ दिया है । दूसरा – कुछ ऐसे फैसले किये जिन्हें मानवाधिकार विरोधी कहा गया है । तीसरा – यह न्यायपालिका और राजनीति के गठजोड़ का मामला है ।

आपातकाल के बाद सत्ता गवां चुकी इंदिरा गांधी को पुनः सत्ता का रास्ता प्रशस्त करने वाली भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में 40 साल पुराना इतिहास दुहराया गया जब 22 फरवरी 2020 को दिल्ली में आयोजित इंटरनेशनल ज्युडिशियल कांफ्रेंस में उपस्थित 20 देशों के जजों के बीच सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अरुण मिश्रा ने सार्वजनिक मंच से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ में क़सीदे पढ़ते हुए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत दार्शनिक बताते हुए सदाबहार ज्ञानी कहा था । जिसकी न्यायिक जगत के साथ ही सार्वजनिक रूप से ठीक उसी तरह न्यायपालिका पर से जनता का भरोसा उठने जैसी आलोचनाओं का दौर चला जैसा 40 साल पहले सत्ता गवां चुकी इंदिरा गांधी को 1980 में जोरदार वापिसी के 15 जनवरी को मिलने वाले एक संदेश को लेकर चला था । इंदिरा गांधी को भेजे गए बधाई संदेश में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस प्रफुल्लचंद्र नटवरलाल भगवती ने लिखा था “मैं चुनावों में शानदार जीत और प्रधानमंत्री के तौर पर आपकी सफल वापिसी के लिए आपको हार्दिक बधाई देता हूं । मुझे यकीन है कि अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति, दूरदृष्टि,प्रशासनिक क्षमता और कमजोरों की तकलीफ समझने वाले हृदय के साथ आप इस राष्ट्र को अपने लक्ष्य तक ले जाएगी” ।

2 सितंबर 2020 को सुप्रीम कोर्ट से रिटायर्ड हुए जस्टिस अरुण मिश्रा को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बनाने की पटकथा तो संभवतः 22 फरवरी 2020 को ही लिख गई थी जब उन्होंने दिल्ली में आयोजित इंटरनेशनल ज्युडिशियल कांफ्रेंस में सार्वजनिक मंच से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ में क़सीदे पढ़ते हुए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत दार्शनिक बताते हुए सदाबहार ज्ञानी कहा था ।

तभी तो 2 दिसम्बर 2020 को पूर्व सीजेआई एच एल दत्तू के बतौर अध्यक्ष राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का कार्यकाल समाप्त होने के बाद 6 माह तक अध्यक्षीय पद खाली पड़ा रहा और चयन समिति में शामिल विपक्षी नेता मल्लिकार्जुन खड़गे की लिखित आपत्ति के बाद भी अरुण मिश्रा को मानवाधिकार आयोग का अध्यक्षीय ताज पहना दिया गया । चयन समिति में अन्य चार सदस्य थे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, राज्यसभा उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह तथा लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ।

अरुण मिश्रा को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की अध्यक्षीय कुर्सी सौंपे जाते ही कई मानवाधिकार संगठनों और रविकिरण जैन, मल्लिका साराभाई, अपूर्वानंद, आकार पटेल, हर्ष मंदर, निवेदिता मेनन, बेला भाटिया, मेघा पाटकर, अरुणा राय, गौहर रजा समेत तमाम चिंतक शख्सियतों ने सरकार की आलोचना करते हुए साझा प्रेस बयान जारी कर कहा है कि “सरकार का ये फैसला साफ़तौर पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्वायत्तता के खिलाफ है । इसके अध्यक्ष के तौर पर मानवाधिकार मामलों पर काम कर चुके किसी पूर्व सीजेआई की नियुक्ति की जानी चाहिए थी । मोदी सरकार की ये नियुक्ति दिखाती है कि नियुक्तियों में योग्यता नहीं बल्कि सत्ता से करीबी मायने रखती है । जनता जानना चाहती है कि जस्टिस मिश्रा को किस आधार पर नियुक्त किया गया है । ये साफ़ है कि उन्हें पी एम मोदी के प्रति निष्ठा दिखाने का ईनाम दिया गया है ।

पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ने निंदा करते हुए कहा है कि मोदी सरकार का रिकार्ड वकीलों, कार्यकर्ताओं, एक्टिविस्ट्स को जेल में डालने का है । जस्टिस अरुण मिश्रा का मानवाधिकारों को लेकर काम करने का कोई रिकॉर्ड नहीं है । जस्टिस मिश्रा ने पी एम मोदी की सार्वजनिक तारीफ़ करने तक का कम्प्रोमाइज किया हुआ है । इनसे आमजन के पक्ष में फैसले दिए जाने की उम्मीद नहीं की जा सकती । मोदी सरकार द्वारा मानवाधिकारों के खिलाफ काम करने वालों को आयोग का सदस्य बनाकर ह्यूमन राइट्स कमीशन को एंटी ह्यूमन राइट्स कमीशन में तब्दील किया जा रहा है ।

जस्टिस अरुण मिश्र बतौर सुप्रीम कोर्ट जज आलोचनाओं के चक्रव्यूह में फंसते ही रहे हैं । 2018 में सुप्रीम कोर्ट के चार सीनियर जजों जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी लोकुर, जस्टिस कुरियन जोजफ, जस्टिस चेलमेश्वर ने जिस प्रेस कांफ्रेंस में सीजेआई दीपक मिश्रा पर राजनीतिक महत्व सहित महत्त्वपूर्ण मामलों को खासमखास कनिष्ठ जजों को सौंपे जाने का आरोप लगाया था उसके केंद्र बिंदु में सुप्रीम कोर्ट में जजों की वरिष्ठता सूची में 10वें पॉयदान पर खड़े जस्टिस अरुण मिश्रा भी थे ।

जस्टिस बी एच लोया हत्या मामला, जस्टिस रंजन गोगोई पर सुप्रीम कोर्ट की महिला कर्मी द्वारा लगाया गया यौन उत्पीड़न आरोपित मामला, खुद दिए गए फैसले को चुनौती देने वाली याचिका की खुद सुनवाई करने का मामला, चर्चित हरेन पांड्या हत्याकांड जजमेंट, बहुचर्चित सहारा बिरला दस्तावेज मामला, मेडिकल कॉलेज घूस कांड मामला, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण पर कोर्ट की अवमानना मामले पर लगाया गया जुर्माना सहित अदानी ग्रुप के लगभग आधा दर्जन मामलों की सुनवाई और दिए गए फैसले न्यायपालिका की गरिमा को धूमिल करते नजर आए ।

जस्टिस अरुण मिश्रा द्वारा किये गए ऐतिहासिक कार्यो की भी लम्बी फेहरिस्त है । जिसमें एडवोकेट्स एक्ट 1961 के तहत विदेश से हासिल की गई कानून की डिग्री को भारत में मान्यता के दिशा निर्देश बनाना, 2000 में कानून के संध्याकालीन कालेजों को बंद करने का प्रस्ताव बार काउंसिल ऑफ इंडिया के सामने रखना, अखिल भारतीय अधिवक्ता कल्याण योजना की शुरुआत, राजस्थान हाईकोर्ट में विधि संग्रहालय की शुरुआत, बेटियों को बेटों के बराबर पैतृक संपत्ति में बराबरी का हक दिया जाना शामिल है । इसके साथ ही बतौर अधिवक्ता अरुण मिश्रा ने सबसे कम उम्र में बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन की कुर्सी सम्हाली थी । पंचवर्षीय लॉ कोर्स शुरू करने का श्रेय भी अरुण मिश्रा के खाते में जाता है ।

सुप्रीम कोर्ट के जजों का राजनीतिक लगाव कोई नया नहीं है न ही रिटायरमेंट के बाद उन्हें महत्वपूर्ण पदों पर नवाजा जाना ।

1973 में सुप्रीम कोर्ट से इस्तीफा देकर जस्टिस के एस हेगड़े जनता पार्टी की टिकिट पर चुनाव लड़कर लोकसभा पहुंचे तथा 1977 से 1980 तक स्पीकर रहे । 1970 में सीजेआई पद से रिटायर हुए जस्टिस एम. हिदायतुल्लाह को 1979 में उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार चुना गया । जनवरी 1983 में सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त हुए जस्टिस बहरुल इस्लाम को जून 1983 में राज्यसभा में मनोनीत किया गया । मुख्य न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट जस्टिस पी सदाशिवमA को रिटायरमेंट के बाद 2014 में केरल का गवर्नर बनाया गया । इसी तरह 2019 में सीजेआई पद से रिटायर हुए जस्टिस रंजन गोगोई को राज्यसभा की सांसदी से नवाजा गया ।

 

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता

स्वतंत्र पत्रकार

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