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एक नेता, एक पार्टी, एक विचारधारा किसी भी देश की अस्मिता को क्षतविक्षत करने का पहला कदम होती है । अति राष्ट्रवाद गणतंत्र का संहारक होता है ।

कलयुग की कलम

एक नेता, एक पार्टी, एक विचारधारा किसी भी देश की अस्मिता को क्षतविक्षत करने का पहला कदम होती है । अति राष्ट्रवाद गणतंत्र का संहारक होता है ।

माईनस की दहाई छूने को बेताब जीडीपी के बीच नाच रही सरकार

घर का चूल्हा जलाये रखने कोख़ बेचने मजबूर हो रही मातृशक्ति

घोर राष्ट्रवाद के नारे से पैदा हुए रिपब्लिकन फासिस्ट पार्टी के नेता तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी ने अपनी वाक्यपटुता की लफ्फाज़ी से एक देश एक पार्टी, एक नेता वाले एक सूत्रीय मूलमंत्र पर चलते हुए इटली पर एकछत्र राज किया । मगर जब मुसोलिनी ने जनता के सवाल पूछने के अधिकार पर ही प्रतिबंध लगा दिया । विरोधियों की आवाज को दबाने के लिए हत्यायें कराई जाने लगीं, उन्हें जेलों में ठूंसा जाने लगा तो त्रस्त आवाम ने 75 साल पहले 28 अप्रैल 1945 को बेनिटो मुसोलिनी और उसकी प्रेमिका क्लेरिटा पिटाची को गोली से उड़ा दिया । लारेटो चौक पर पड़े उनके शवों की जो दुर्गति जनता ने की उसने विभस्तता की सारी सीमायें लांघ कर रख दी थीं ।

बेनिटो मुसोलिनी और उसकी प्रेमिका क्लेरिटा पिटाची के भयावह अंत और उसकी लाश के साथ की गई अमानवीयता की पराकाष्ठा से, “जनता को इतना निचोड़ दो कि वह जीवित रहने को ही विकास समझने लगे” मूलमंत्र पर चलने वाला, मुसोलिनी का राजनैतिक दोस्त जर्मनी का तानाशाह एडोल्फ़ हिटलर इतना ज़्यादा भयभीत हो गया कि उसने अपने विश्वासपात्रों को आदेश दिया था कि किसी भी सूरत में उसकी लाश जनता और शत्रुओं के हाथ नहीं लगनी चाहिए । हरहाल में उसकी लाश को जला दिया जाय ।

एक नेता, एक पार्टी, एक विचारधारा किसी भी देश की अस्मिता को क्षतविक्षत करने का पहला कदम होती है । अति राष्ट्रवाद गणतंत्र का संहारक होता है । जिसके सबसे बड़े जीते जागते हुए उदाहरण हैं बेनिटो मुसोलिनी और एडोल्फ़ हिटलर ।

पुनर्जन्म और इतिहास के रिपीटीशन पर विश्वास करने वालों को सतर्क रहने की जरूरत होती है । राष्ट्रहित, राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर एक नेता, एक पार्टी, एक विचारधारा को थोपने के लिए सैकड़ों बार झूठ पर झूठ परोसा जाय और इस तिलिस्म को तोड़ने वालों की अभिव्यक्ति की आजादी को गुलामीयत की जंजीरों में जकड़ने के इरादे सरकार ज़ाहिर करने लगे तो इसे गणतंत्र के लिए खतरे की घंटी ही समझा जाना चाहिए ।

विश्व गुरु बनने के लगभग आऊटर पर खड़े देश की जनता के आर्थिक हालात इतने बद से बदतर हो जायें कि घर का चूल्हा चौका चलाने के लिए महिलाओं को सेरोगेट मां बनने मजबूर होना पड़े जिसमें अविवाहित युवतियों की भी भागीदारी कोख़ को किराए पर देने की हो तो इस ख़बर पर खांटी राष्ट्रवादियों का चिंतित होना स्वाभाविक है ।

विगत पांच साल से देश की आर्थिक विकास दर (जीडीपी) साल दर साल गोते लगाती जा रही है और जिम्मेदार भारत – पाकिस्तान, मन्दिर – मस्जिद, हिन्दू – मुस्लिम का ही पहाड़ा पढ़कर आवाम को भरमाने में व्यस्त और मस्त हैं ।

2016 – 17 में जहां जीडीपी 8.26% थी वहीं 2017 – 18 में गिरकर 7.04% पर आ गई । इतना ही नहीं 2018 – 19 में भी गोता लगाना चालू रहा और वह 4.2% पर पहुंच गई । सरकार के गिरते चरित्र से कम्पटीशन करते हुए जीडीपी ने एक बार फिर डुबकी लगाई और 2019 – 20 में 4.2% की तलहटी को छू लिया ।

2020 – 21 में भारत की आर्थिक विकास दर तो अपने 10 पड़ोसी देशों से भी बदतर हो गई है । खासतौर पर उन देशों से जिन्हें देश की तथाकथित राष्ट्रवादी पार्टी और उसके लीडरान 365 दिन चौबीसों घंटे बिना पानी पिये कोसते रहते हैं ।

बंगलादेश 3.8%, चीन 1.9%, वियतनाम 1.6%, नेपाल 0%, पाकिस्तान -0.4%, इंडोनेशिया -1.5%, श्रीलंका -4.6%, अफगानिस्तान -5%, मलेशिया -6%, थाईलैंड -7.1% आर्थिक विकास दर है जबकि गत 7 साल से नरेन्द्र मोदी की उंगली पकड़कर बुलेट ट्रेन की रफ्तार से दौड़ रहे भारत ने पिछले 41 सालों का रिकॉर्ड ध्वस्त करते हुए आर्थिक विकास दर (जीडीपी) को माईनस -7.3% के शिखर को छू लिया है ।

2014 और 2019 में दो करोड़ नौकरी, हर नागरिक के खाते में 15 लाख रुपये, किसान की आमदनी दुगनी, 100 दिनों में महंगाई ख़त्म कर देने का दिवास्वप्न दिखाकर सत्ता पर काबिज़ हुई नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार के सात सालीय दौर में बेरोजगारी ने तीन दशकों का रिकॉर्ड तोड़कर उच्चतम स्तर को छू लिया है । स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे ज़्यादा बैंक फ्राड इन्हीं 7 सालों में हुए हैं । किसान गत 6 महीने से तीन किसान विरोधी कृषि बिलों को रदद् कराने की मांग को लेकर सड़क पर पड़े हुए हैं । मंहगाई भी पिछले ग्यारह सालों में सबसे ज़्यादा है ।

देशवासियों ने तो इस बात का काल्पनिक सपना भी नहीं देखा होगा कि पेट्रोल – डीजल की कीमतें शतायु हो जायेंगी और रसोई के तेल के भाव डबल सेंचुरी लगा लेंगे । आज लगभग 23 करोड़ देशवासी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने विवश हैं । चीन देश के सरहद के भीतर घुसकर जवानों की हत्या कर जाता है । सवाल पूछने वालों पर देशद्रोही, समाजविरोधी का ठप्पा लगाकर जेलों में डाल दिया जाता है । कोविड 19 की महामारी से पार पाने के सरकारी कुप्रबंधन ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश के मुंह पर कालिख़ पोत दी है और सरकार दरबारी मीडिया के साथ बेशर्मी की चादर ओढ़े उत्सव मना रही है ।

 

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता

स्वतंत्र पत्रकार

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