मध्यप्रदेश

दवाईयों में एमआरपी के नाम पर लुट रहे मरीज

कलयुग की कलम

दवाईयों में एमआरपी के नाम पर लुट रहे मरीज

प्राइवेट अस्पतालों में मर्ज के अनुसार तय होनी चाहिए फीस

ग्राहक का चेहरा देख कर तय होता है दाम

सतना, (ओपी तीसरे)। दवा के रैपर पर अंकित एमआरपी से कम में दवा खरीदकर आप शायद दवा विक्रेता को रहमदिल समझ रहे होंगे। लेकिन बिल्कुल नहीं है। यह एक बड़ा खेल है, जो दवा निर्माताओं से लेकर खुदरा व्यापारी तक खेल रहे हैं। दस हजार रुपए के एमआरपी की दवा की जितनी दुकानें उतनी कीमत है। यह तीन हजार से लेकर नौ हजार रुपए तक में बिक रही है। प्रदेश भर में शहर से लेकर गांव तक दवाई के नाम पर मनमानी वसूली मेडिकल स्टोरो में हो रही है और सरकारें हाथ पे हाथ धरे बैठी हैं। दवा कंपनियां कैंसर जैसे असाध्य रोगों के पीड़ितों को भी नहीं बख्श रही हैं। आलम यह है कि दवा की वास्तविक कीमत से 15 से 20 गुना अधिक एमआरपी अंकित रहती है। कितना भी मोलभाव या आरजू-मिन्नत कर लें, मरीज हर दम घाटे में ही रहता है। क्योंकि उसे इस खेल के बारे में पता ही नहीं होता।
केन्द्र सरकार ने शेडयूल एच-वन की दवाओं के दाम को तय करने की कोशिश भी की, लेकिन बाजार में अब भी दवाएं मनमाने दामों पर बिक रही हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि शेडयूल एच-वन के अंतर्गत महज 350 दवाओं के दामों को कंट्रोल किया गया हैं। अभी भी सैकड़ों दवाएं इस नीति के दायरे से बाहर हैं। यही वजह है कि दवाओं के दाम में भारी अंतर है। कहीं दवाओं के प्रिंट रेट और ग्राहकों से ली जा रही कीमत में अंतर है, तो कहीं मुंह मांगे दाम। यही नहीं एक ही साल्ट और एक ही डोज की 2 अलग-अलग ब्रांड की दवाओं की कीमत में दोगुना-तिगुना अंतर है। हालात यह है कि दवाओं के दाम निर्माता कंपनियों के शेयर के आधार पर तय हो रहे हैं।
मैहर से समाजसेवी विष्णुनाथ पांडेय ने इस मामले में जब सतना मेडिकल स्टोर में जाकर बात की, तो यह हकीकत सामने आई। कई दवाओं का अधिकतम खुदरा मूल्य तय नहीं होने का फायदा निर्माता से लेकर फुटकर विक्रेता भी उठा रहे हैं। स्थिति यह है कि उदाहरण स्वरूप अगर 500 रुपये की दवा पर 2750 रुपए एमआरपी लिखा गया है। यह दवा सतना व आस पास के डॉक्टर को जहां 500 रुपये में मिली, वहीं आम आदमी से इसके हजार रुपए से दो हजार रुपए तक वसूले जा रहे हैं।
एक ही साल्ट, लेकिन कीमत में जमीन आसमान का अंतर
बाजार में बिक रही अगर एक साल्ट की बात करें, तो सेफ्टम और सेरोक्सिम 500 एमजी के कीमत में भारी अंतर है। सेफ्टम की एक गोली जहां 86 रुपये की है, वहीं सेरोक्सिम की एक गोली की कीमत केवल 25 रुपये है। स्टॉरवेस और अटोरवा दोनों बड़े ब्रैंड्स की दवाएं हैं। एक ब्रैंड की दवा के 40 एमजी की डोज की कीमत जहां 257 रुपये है, तो दूसरे की 306 रुपये है। दवाओं के यह दाम निर्माता कंपनियों की रसूख के आधार पर तय होते हैं।
मरीजों की मजबूरी को बनाते हैं हथियार
रिटेलर भी मरीजों की मजबूरी का फायदा उठाते हैं। रिटलेर मरीज को प्रिंट रेट से 20 से 25 फीसदी कम दाम में दवाएं देकर मरीजों को फायदा देने का दम्भ भरते हैं। जबकि हकीकत यह है कि इतने कम दाम देने के बावजूद रिटेलर दवा खरीदी की कीमत से कई गुना मुनाफा कमाते हैं। उदाहरण के लिए यूरिन संबंधी बीमारी की 9 रुपए की दवा सिडनेफिल पर प्रिंट 149 रुपए होता है। रिटेलर इसे 100 रुपए से 120 रुपए में मरीजों को देते हैं। ऐसे ही हड्डियों को मजबूत करने वाली 7 रुपए की दवा कैल्शियम कार्बोनेट का प्रिंट रेट 120 रुपए, डायबिटीज की 7 रुपए की दवा ग्लिमप्राइड का प्रिंट रेट 97 रुपए, हृदय रोग में इस्तेमाल होने वाली 11 रुपए की एटोरवस्टेटिन दवा का प्रिंटरेट 131 रुपए है।
कैसे होती है गड़बड़ी ?
दरअसल नियम के मुताबिक प्रिंट रेट का सीधा अर्थ यह है कि रिटेलर उस दवा को प्रिंट रेट पर या उसके आस पास किसी भी दाम में बेच सकता है। ऐसे में कोई दवा 2500 रुपए में तैयार होती है, तो वितरक इसे चार फीसदी मुनाफा जोड़कर खरीदेगा। वहीं खुदरा विक्रेता इसमें अपना आठ फीसदी जोड़ेगा, जिससे दवा की कीमत करीब 3500 हो जाती है। लेकिन कंपनी करीब 10000 रुपए प्रिंट करती है। ऐसे में खुदरा विक्रेता इस दवा को दस हजार रुपए तक किसी भी कीमत में बेच सकता है।
कुछ दवाओं के नाम और प्रिंटरेट
वीनॉट प्लस 400 एमजी एमआरपी 2020 विक्रय मूल्य 600, केस्पोकेयर एमआरपी 9990 विक्रय मूल्य 2900, कीमोकॉर्ब 450 एमजी एमआरपी 2433 विक्रय मूल्य 1050, जोल्डोनेट प्लस एमआरपी 2550 विक्रय मूल्य 350, लेनेनजियोल एमआरपी 2820 विक्रय मूल्य 750।
मरीजों के साथ हो रही इस लूट के हैरतअंगेज मामले में सवाल उठाते हुए मैहर के समाजसेवी विष्णुनाथ पांडेय ने यहां के जन प्रतिनिधियों सहित मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति से संगीन किस्म के कथित मामले को संज्ञान में लेते हुए ठोस कदम उठाए जाने की अपील की है। साथ ही सभी सांसदों-विधायकों से लोकसभा व विधानसभा पटल पर इस सवाल रखने की नसीहत भी दी है। ताकि गरीब, मजबूर आम जनमनास को दवाई के ऊंचे दामों से राहत मिल सके।
दवा की कीमतों पर नियंत्रण नहीं होने और विक्रेताओं की इस मनमानी को लेकर विष्णुनाथ पांडेय ने दावा किया है कि खुदरा विक्रेता 30 गुना तक मुनाफा वसूल रहे हैं। उन्होंने देश के महामहिम राष्ट्रपति व प्रधानमत्री से नई दवा नीति बनाने की भी मांग की है। ताकि आम नागरिकों से होने वाली लूट को रोका जा सके। उन्होंने कहा कि अपने भारत के अंदर हजारों तरह की अलग-अलग दवाईयां जिन्हें 100 से लेकर 2100 प्रतिशत से अधिक दामों में बेचा जा रहा है। उन्होंने देश भर में दवाओं की अधिकतम कीमत तय कर दिए जाने की अपनी बात भी रखी। साथ ही यह भी कहा कि अगर सभी छोटे-बड़े प्राइवेट अस्पतालों में फीस मर्ज के हिसाब से तय कर दी जाए, तो चिकित्सा खर्च में 85 से 90 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। इससे आम जनमानास को मुसीबत के समय बहुत बड़ी राहत मिल सकेगी और उसकी आर्थिक स्थिति पर भी बड़ा सुधार होगा।

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