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कागभुशुण्डि गरुण से बोले, आओ कर लें दो दो चोंचें। चलो किसी मंदिर में चलकर प्रतिमा का सिंदूर खरोचें।।

कलयुग की कलम

कागभुशुण्डि गरुण से बोले,

                 आओ कर लें दो दो चोंचें।

चलो किसी मंदिर में चलकर

                 प्रतिमा का सिंदूर खरोचें।।

आसमान पर थूकने वालो मत भूलो पलटकर थूक तुम्हारे ही मुँह गिरेगा* अब गिर रहा है

आज पूरे देश में पेट्रोल की कीमतें तकरीबन शतक लगा चुकी हैं । डीजल की कीमतें भी शतक लगाने के लिए पूरा जोर लगा रही हैं । तब कभी विपक्ष में रहे भारतीय जनता पार्टी के उन नेताओं के विधवा विलापी छाती पीटो कथन आज जनमानस के दिमाग को झकझोर रहे हैं । जब मनमोहन सिंह सरकार के समय पेट्रोल – डीजल के दाम 60 पार कर रहे थे । क्योंकि आज देश की बागडोर भारतीय जनता पार्टी के हाथ ही है । इतना ही नहीं देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर खुद नरेन्द्र दामोदरदास मोदी विराजमान हैं ।

जिस प्रकार से पेट्रोल के दाम बढ़ा दिये ये दिल्ली सरकार की शासन चलाने की नाकामी का जीता जागता सबूत है

नरेन्द्र दामोदरदास मोदी

एक वर्ष में 11 बार पेट्रोल – डीजल की कीमतें बढ़ी है । स्वाभाविक है डीजल – पेट्रोल की कीमत जब बढ़ती है तो दैनन्दिनी उपभोग की जो वस्तुएं हैं उनकी भी कीमतें स्वाभाविक रूप से बढ़ती हैं । उसका खामियाजा सर्वाधिक यदि किसी को भुगतना पड़ता है तो जो मध्यम वर्गीय परिवार के लोग हैं उन्हें भुगतना पड़ता है, जो गरीब हैं

राजनाथसिंह

बार – बार करीबन 17 – 18 बार प्रधानमंत्री कार्यालय ने पेट्रोल – डीजल के दाम क्यों बढ़ाये हैं

स्मृति ईरानी

हम चेलेंज करते हैं सरकार को कि पूरी तरह से रिफाइंड पेट्रोल दिल्ली में 34 रुपये से मिल सकता है । मुंबई में 36 रुपये से मिल सकता है । तो उसके दुगने दाम क्यों है

प्रकाश जावड़ेकर

पेट्रोल का दाम जिस तरह से बढ़ाया है । ये पूरी तरह से मंहगाई बढ़ाने वाला कदम है । ये सरकार आप लोगों को धोखा दे रही है

शहनवाज हुसैन

सरकार है मग़रूर यह आवाम कह रही है

जालिमों के जुल्म को खामोश सह रही है

अब तो गांधी के बन्दर भी कहने लगे गए हैं कि बॉयलर मुर्गे को बाज की तरह पेश करने वालों को किनारे कर न जाने किस घड़ी में हमने भी क्या खूब शेर पाला था जो पहले पेट्रोल और डीजल पर पलता था फिर शेर की भूख बढ़ी और एक एक कर एयर इंडिया, रेलवे, एलआईसी, रोजगार खाने लगा । अब तो शेर आदमखोर हो गया है और वो पालने वाले को ही खाने लगा है ।

ज़ुल्म से बुरी खामोशी होती है । खामोशी तोड़ पूछना लाजिमी होगा जब बम ब्लास्ट करने वाले आतंकी हैं तब एम्बुलेंस और ऑक्सीजन सिलेंडर छुपाकर लोगों की सांसें रोकने वाले आतंकी क्यों नहीं हैं ?* *मोदी सरकार की नज़र में मानव जीवन की रिस्क से ज़्यादा महत्वपूर्ण उद्योगपतियों की फाइनेंशियल रिस्क क्यों है ? क्या मोदी सरकार अब नदियों के साथ समुद्रों में भी लाशें बहाने की तैयारी में है ।

लगातार आ रही भयावह तस्वीरें मानवता का सीना छलनी कर रही हैं । नदियों में बहाई जा लाशों को कुत्ते, कौए, मछलियां नोचकर खा रहे हैं । लगता तो यही है कि संवेदनाओं की मौत हो चुकी है । देश मर चुका है । मग़र लाशों का फलता फूलता व्यापार करने वालों को तो क़फ़न के खरीददार चाहिए । उन्हें तो चंद बिकाऊ मीडिया हाऊस और कुछ बिके हुए पत्रकारों की दरकार है । उनकी सोच तो यह है कि मरने वालों पर अफ़सोस कैसा उन्हें तो मौतों पर उत्सव तैयार चाहिए । देश मरता है कल तो मर जाये आज हमको तो चुनाव बरकरार चाहिए ।

कुंभ और दंभ के साथ प्रजा के लिए सख्त लॉकडाउन और इलेक्ट्रिक वोटिंग मशीन को इलेक्शन विक्ट्री मशीन में तब्दील कर राजनीति को वन नेशन वन पार्टी बनाने की दिशा में चुनाव जीतने के लिए चुनावी रैलियों में लाखों का रैला जुगाड़ने में व्यस्त मरने मारने पर उतारू राजा की नजर में शिक्षा – स्वास्थ्य से जरूरी है नया संसद भवन । भले ही प्रजा बिना हवा के प्राण तज रही है मगर मग़रूर राजा हवा में चौपायों की माफ़िक कुचालें भर रहा है । सही कहा है मूंगफली खाने वाला वमन में बादाम कैसे उगलेगा ।

 

अश्वनी बड़गैंया, अधिवक्ता

स्वतंत्र पत्रकार

 

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