मध्यप्रदेश

कोरोना के नाम पर लूटा हुआ धन आत्म प्रताड़ना ही देगा : राजगुरु

कलयुग की कलम

👇🏿कोरोना के नाम पर लूटा हुआ धन आत्म प्रताड़ना ही देगा : राजगुरु

सतना। जिसने भी इस महामारी काल में असहायों का धन लूटा है, मानव जीवन की शुद्ध चादर में दाग-धब्बे लगाएं हैं उन्हें भी चैन से बैठ पाना कठिन है। मानवता की कराह को अनसुनी करके खाया हुआ धन किसी को पचेगा नहीं, वह आत्मधिक्कार व आत्मग्लानि के साथ अनेक कष्टकारक प्रताड़नाओं के रूप में फुटकर बाहर ही आएगा और आ भी रहा है। तभी तो शास्त्रों में कष्ट साध्य रोग संचित पापों का परिणाम ही माने जाते हैं।यह तथ्य आज का शरीर शास्त्र और मनोविज्ञान शास्त्र अक्षरशः सिद्ध कर रहा है। येन-केन-प्रकारेण अर्जित किया हुआ धन, मन को ऐसी कटीली झाड़ियों में उलझा देता है, जहां केवल शोक संताप ही दृष्टिगोचर होता है। ऐसा व्यक्ति शरीर से रुग्ण और मन से विक्षुब्ध होकर जीवित रहते नरक भोगता है। इनके भीतर ही भीतर इतने घाव लगे होते हैं जिसके कारण कराह और तड़प के साथ उन्हें देखा जा सकता है।

“दुष्कर्मों के दंड से प्रायश्चित ही छुड़ा सकेगा”

ईश्वर से क्षमा मांगना उचित है। इससे आत्मशोधन को बल मिलता है। पर इतने भर से काम नहीं चलेगा।मानव को हमने दुष्कर्मों से जितनी क्षति पहुंचाई है उसकी पूर्ति तभी होगी जब हम उतने ही वजन के सत्कर्म करके समाज को लाभ पहुंचाएं। तभी आत्मग्लानि एवं आत्मप्रताड़ना से छुटकारा मिल सकता है। अन्यथा कर्मफल का विधान भोगना ही होगा। धर्म कृत्यों से पाप नाश के जो महात्म्य शास्त्रों में बताए गए हैं उनका तात्पर्य इतना ही है कि मनोभूमि का शोधन होने से भविष्य में बन सकने वाले पापों की संभावना का नाश हो जाय। इसीलिए कठोर न्याय व्यवस्था में ऐसा ही विधान है कि किए गए पाप परिणामों की आग में जल मरने से जिन्हें बचना हो वे समाज की उत्कृष्टता बढ़ाने की सेवा सहायता में संलग्न हो जाएं और लदे हुए भार से छुटकारा प्राप्त कर शांति एवं पवित्रता की स्थिति उत्पन्न कर लें। इसी में भलाई है वर्ना आगे और कठिन लड़ाई है।

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