मध्यप्रदेश

आह गाली – वाह गाली ( अशोक शुक्ला वरिष्ठ पत्रका)

कलयुग की कलम

आह गाली – वाह गाली

तनिक सोचिए कि यदि अपने यहां धारा 294 के तहत गाली देना दंडनीय अपराध न होता तो इस कोरोना काल मे तंग और बेहाल मजदूरी करने वाला धक्का परेड आम आदमी क्या कर रहा होता ? जाहिर है कि वह कहीं किसी चौराहे पर खड़ा होकर एक तरफ से उन सबको गरिया रहा होता जो इस संकट की घड़ी में चुनावी महाभारत में लगे हुए थे और अब बेमियादी लाक डाउन लगाकर जनसेवा के मैदान से गायब हैं। संभवतः कथित तौर पर देश चलाने वाले लोगों को भी इस बात का अंदाजा था कि एक दिन अव्यवस्था से खिन्न होकर आम आदमी गाली-गलौज पर उतार आएगा। लिहाजा हुक्मरानों (नेताओं) ने खुद को गालियों से बचाने की गरज से बहुउपयोगी गाली के लेन-देन पर रोक लगा दी और इसे गैरकानूनी ठहरा दिया। यद्यपि बावजूद इसके आम आदमी ने गाली देना बंद नहीं किया है और मौका देखकर वह आज भी हुक्मरानों को गरिया लेता है। दरअसल गाली हम भारतीयों के जीवन में कुछ इस तरह से रची-बसी है कि लोग चाहकर भी खुद को इससे अलग नहीं कर पाते। अतः जब तब लोग कुछ खास मौको पर बेशकीमती गालियों का आदान-प्रदान करते हुए मिल ही जाते हैं। कभी देश में होली के हुड़दंग भरे त्यौहार में सुंदर-असुंदर गालियों का धारा प्रवाह आदान-प्रदान आम बात हुआ करती थी। अलावा इसके ग्रामीण इलाकों में तो आज भी डिस्को डांस के बीच गारी गीत गाए जाते हैं। यहां अब भी परंपरागत तरीके से वधू पक्ष की महिलाएं गारी गीत गाकर वर पक्ष का स्वागत करती हुई मिल जाती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि गाली की सरल और सहज प्रकृति ने सभी को अपने से जोड़ रखा है और इसीलिए न चाहते हुए भी कम्बख्त गाली कभी न कभार गाहे-बगाहे लोगों की जुबां पर आ ही जाती है। मेरे एक चिकित्सक मित्र ने गाली को एक नैच्युरल एक्टिविटी बतलाते हुए कहा कि जिस तरह से रो लेने से मन का दुख कम हो जाता है, ठीक उसी तरह से भरपेट तरीके से गरिया लेने से भी काफी हद तक क्रोध शांत हो जाता है। आगे चिकित्सक मित्र कहते हैं कि इसकी सहज और स्वाभाविक प्रकृति का ही यह कमाल है कि कम पढा-लिखा आदमी भी आनन-फानन मे सैकड़ों गालियों की रचना कर लेता है। चिकित्सक मित्र के मुताबिक गाली दूर संवेदी भी है। आप कहीं से भी किसी को भी गरिया सकते हैं। गत वर्ष कोरोना संक्रमण के लिए काफी हद तक जिम्मेदार माने जा रहे जिनपिंग को यहां के लोग अपने घर से गरियाए पड़े थे। यद्यपि लोग चाहें तो थोड़ा जोखिम लेकर खुल्लम-खुल्ला भी किसी को गाली दे सकते हैं अथवा फिर आम भारतीय बहू की भांति सास को मन ही मन गरियाने का तरीका भी अपना सकते हैं। वैसे भी मन ही मन गाली देना सबसे बढिया और एक बेहद सुरक्षित तरीका है। सूत्रों की मानें तो साल भर पहले मंत्री न बन पाने से खफा कई विधायक मन ही मन शिवराज और आलाकमान को गरिया रह थे और तब ज्योतिरादित्य सिंधिया से लेकर दिग्गीराजा तक गाली की चपेट मे थे। अब यह दीगर बात है कि प्रत्यक्ष में यह सब दिख नहीं रहा था। लेकिन बावजूद इसके देने वाला तो बदस्तूर गाली देता ही रहा था। फिलहाल बंगाल चुनावों में शुरू हुआ गाली गलौज का सिलसिला अभी भी जारी है। कहीं-कहीं यह हिंसा मे भी तब्दील होता हुआ दिख रहा है। इसलिए मै कहता हूं कि कुछ न कर पाने की स्थित में कम से कम आम आदमी को गाली देने का अधिकार तो मिल ही जाना चाहिए। आगे मोदी जी जानें . . .

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