मध्यप्रदेश

. जब अधिमान्य पत्रकारों को लगी मिर्ची !

कलयुग की कलम

. . . जब अधिमान्य पत्रकारों को लगी मिर्ची !

*सतना, (ओपी तीसरे)। गैर अधिमान्य पत्रकारों ने प्रदेश सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान के एक कथित फैसले पर उंगली क्या उठा दी कि यहां के अधिमान्य पत्रकारों को मिर्ची लग गई। विदित हो कि मुख्यमंत्री ने अपने एक फैसले में अधिमान्य पत्रकारों को थोड़ा महत्व दिया था, जिसे यहां के गैर अधिमान्य पत्रकारों ने उनके कथित फैसले को अनुचित ठहराने की कोशिश की थी। अब ये अधिमान्य पत्रकार सरकार के कथित फैसले पर बहसबाजी न करने की नसीहत दे रहे हैं। अब इनका इस मामले में कहना यह है कि नियम कायदे में रहकर चलना अधिमान्य पत्रकारों की मजबूरी है। क्योंकि उनके मन में अधिमान्यता समाप्त होने का डर हर पल बना रहता है। जबकि गैर अधिमान्य पत्रकार स्वतंत्र व निर्भीक होते हैं और सच लिखने का माद्दा भी रखते हैं। इस हैसियत से देखा जाए तो अधिमान्य पत्रकारों की अपेक्षा गैर अधिमान्य पत्रकारों की स्थिति बेहतर होती है। अधिमान्य पत्रकारों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि यदि वह किसी समाचार पत्र संस्थान से जुड़ा है, तो वह अपने मालिकान से शासन द्वारा निर्धारित मजीठिया वेतन का लाभ चाहते हुए भी नहीं ले पाता। क्योंकि उसे संस्थान से बाहर का रास्ता दिखा दिए जाने का भय रहता है। जबकि गैर अधिमान्य पत्रकारों के साथ ऐसी स्थिति नहीं होती। वह तो अपने अधिकारों के लिए खुलकर लड़ भी सकता है। और रहा सवाल सुविधा का, तो अधिमान्य पत्रकारों को शासन से कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं मिलती। सिर्फ रेलवे में सुविधा थी, वह भी बंद कर दी गई। इसलिए अधिमान्यता के लिए परेशान होने की जरूरत नहीं है। सच तो यह है कि आप स्वतंत्र और सही पत्रकार हैं।

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